वेतन को अफसरशाही की देरी का बंधक नहीं बनाया जा सकता: बॉम्बे हाइकोर्ट सख्त, 60 दिन की समयसीमा तय

Amir Ahmad

17 March 2026 4:14 PM IST

  • वेतन को अफसरशाही की देरी का बंधक नहीं बनाया जा सकता: बॉम्बे हाइकोर्ट सख्त, 60 दिन की समयसीमा तय

    बॉम्बे हाइकोर्ट ने शिक्षकों के वेतन में हो रही देरी पर कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि प्रशासनिक लापरवाही के कारण वेतन रोका नहीं जा सकता। अदालत ने शालार्थ प्रणाली से जुड़े मामलों में 60 दिनों की समयसीमा तय की।

    जस्टिस विभा कंकणवाड़ी और जस्टिस हितेन एस. वेनेगावकर की खंडपीठ सहायक शिक्षक विजय उत्तम चव्हाण की याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें उन्होंने शालार्थ प्रणाली में नाम शामिल कर वेतन जारी करने की मांग की थी।

    अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता की नियुक्ति और सहायता प्राप्त पद पर स्थानांतरण पहले ही सक्षम प्राधिकारी द्वारा स्वीकृत किया जा चुका है। ऐसे में शालार्थ प्रणाली में नाम जोड़ना केवल एक प्रशासनिक औपचारिकता है, जिसे अनावश्यक रूप से लंबित नहीं रखा जा सकता।

    हाइकोर्ट ने स्पष्ट किया कि क्षेत्रीय उप शिक्षा निदेशक की भूमिका केवल यह जांचने तक सीमित है कि नियुक्ति की स्वीकृति है या नहीं, पद स्वीकृत और अनुदानित है या नहीं, और प्रस्ताव पूर्ण है या नहीं। इसके बाद शिक्षक का नाम तुरंत शालार्थ प्रणाली में शामिल कर पहचान संख्या जारी की जानी चाहिए।

    अदालत ने कहा,

    “वेतन, शिक्षक द्वारा किए गए कार्य का वैध प्रतिफल है। इसे प्रशासनिक निष्क्रियता के कारण रोका नहीं जा सकता।”

    हाइकोर्ट ने यह भी चिंता जताई कि नियुक्ति, स्थानांतरण, पदोन्नति और शालार्थ से जुड़े प्रस्ताव महीनों या वर्षों तक लंबित रखे जाते हैं, जिससे शिक्षकों को न्याय पाने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ता है।

    इस पर कोर्ट ने अंतरिम दिशा-निर्देश जारी करते हुए कहा कि ऐसे किसी भी प्रस्ताव को 60 दिनों से अधिक लंबित नहीं रखा जाएगा।

    साथ ही शिक्षा विभाग को एक डिजिटल ट्रैकिंग प्रणाली विकसित करने का निर्देश दिया, जिससे प्रस्तावों की स्थिति पर नजर रखी जा सके।

    अदालत ने संबंधित अधिकारी को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता के 1 फरवरी, 2024 के प्रस्ताव पर चार सप्ताह के भीतर निर्णय लेकर यदि कोई कमी न हो तो उसका नाम शालार्थ प्रणाली में शामिल किया जाए।

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