जंगली जानवरों से नुकसान पर केवल चुनिंदा प्रजातियों को मुआवजा देना असमानता, अनुच्छेद 14 का उल्लंघन: बॉम्बे हाईकोर्ट

Amir Ahmad

28 April 2026 3:48 PM IST

  • जंगली जानवरों से नुकसान पर केवल चुनिंदा प्रजातियों को मुआवजा देना असमानता, अनुच्छेद 14 का उल्लंघन: बॉम्बे हाईकोर्ट

    बॉम्बे हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि फसलों और पेड़ों को जंगली जानवरों से हुए नुकसान पर मुआवजा केवल कुछ निर्धारित प्रजातियों तक सीमित रखना और अन्य प्रजातियों, जैसे पक्षियों, को उससे बाहर रखना संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है।

    अदालत ने कहा कि ऐसी वर्गीकरण व्यवस्था मनमानी है और इसका किसानों को नुकसान की भरपाई करने के उद्देश्य से कोई तार्किक संबंध नहीं है।

    जस्टिस उर्मिला जोशी-फलके और जस्टिस निवेदिता पी. मेहता की खंडपीठ किसान द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी।

    याचिकाकर्ता ने तोतों द्वारा उसके अनार के पेड़ों को पहुंचाए गए नुकसान के लिए मुआवजे की मांग की थी। हालांकि प्रशासन ने यह कहते हुए दावा खारिज किया कि सरकारी संकल्पों में तोते जैसे पक्षियों को मुआवजा योग्य जंगली प्राणियों की सूची में शामिल नहीं किया गया।

    अदालत ने रिकॉर्ड की जांच करते हुए पाया कि याचिकाकर्ता का खेत वन्यजीव अभयारण्य के पास स्थित है और स्थल निरीक्षण में यह पुष्टि हुई कि लगभग 50 से 55 प्रतिशत फल उत्पादन तोतों द्वारा नष्ट किया गया।

    हाईकोर्ट ने यह भी नोट किया कि तोते वन्यजीव संरक्षण कानून की अनुसूची-दो में शामिल हैं और विधिक रूप से “जंगली जानवर” की परिभाषा में आते हैं।

    इसके बाद अदालत ने सरकारी संकल्पों की उस व्यवस्था की समीक्षा की, जिसमें जंगली सूअर, हिरण, बंदर, हाथी जैसे कुछ जानवरों से नुकसान पर मुआवजे का प्रावधान है, लेकिन पक्षियों को बाहर रखा गया है।

    अदालत ने कहा कि जब योजना का उद्देश्य जंगली जानवरों से हुए नुकसान की भरपाई करना है तब कुछ प्रजातियों को बाहर रखना उसी उद्देश्य को विफल करता है।

    हाईकोर्ट ने कहा,

    “जब कानून तोते जैसे पक्षियों को जंगली जानवर मानता है तब केवल सरकारी संकल्प में नाम न होने के आधार पर मुआवजा न देना उचित नहीं ठहराया जा सकता।”

    अदालत ने आगे कहा कि एक श्रेणी के जंगली जानवरों से हुए नुकसान पर मुआवजा देना और दूसरी श्रेणी को बाहर रखना समानता के सिद्धांत के विरुद्ध है तथा यह अनुच्छेद 14 का स्पष्ट उल्लंघन है।

    हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि सरकारी संकल्प प्रशासनिक प्रकृति के होते हैं और वे किसी वैधानिक प्रावधान या संवैधानिक सिद्धांत से ऊपर नहीं हो सकते।

    अदालत ने कहा कि जब कानून नागरिकों से वन्यजीव संरक्षण की अपेक्षा करता है तब यह भी सुनिश्चित करना होगा कि संरक्षित वन्यजीवों के कारण हुए नुकसान का भार नागरिकों पर अकेले न डाला जाए।

    इन्हीं टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को मुआवजा देने का निर्देश दिया और कहा कि फलदार पेड़ों को हुए नुकसान को मुआवजा योग्य मानते हुए भुगतान किया जाए, भले ही पक्षियों के लिए अलग से स्पष्ट प्रावधान न हो।

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