POCSO Act: जब कानून न्यूनतम सजा तय करता है तो अदालत कम दंड नहीं दे सकती: बॉम्बे हाइकोर्ट
Amir Ahmad
18 Feb 2026 1:43 PM IST

बॉम्बे हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब कानून किसी अपराध के लिए अनिवार्य न्यूनतम सजा निर्धारित करती है तो अदालत के पास उससे कम सजा देने का कोई विवेकाधिकार नहीं होता।
ऐसी स्थिति में अपीलीय अदालत द्वारा न्यूनतम वैधानिक सजा देना सजा में वृद्धि नहीं बल्कि कानून के अनुरूप त्रुटि का सुधार है।
जस्टिस राजनिश आर. व्यास दो आपस में जुड़ी अपीलों पर सुनवाई कर रहे थे। स्पेशल जज (POCSO) ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376(2)(n) तथा लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 की धारा 5(एल) सहपठित धारा 6 के तहत दोषी ठहराते हुए सात वर्ष के कठोर कारावास की सजा दी थी। वहीं धारा 363 और 366-ए के आरोपों से बरी कर दिया।
आरोपी ने अपनी दोषसिद्धि को चुनौती दी जबकि पीड़िता ने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 372 के तहत अपील दायर कर न्यूनतम वैधानिक सजा लागू करने तथा बरी किए गए आरोपों को भी चुनौती दी।
हाइकोर्ट ने साक्ष्यों का मूल्यांकन करते हुए माना कि अभियोजन यह सिद्ध करने में सफल रहा कि पीड़िता POCSO Act की परिभाषा के अनुसार बालिका थी। अदालत ने कहा कि यदि सहमति मान भी ली जाए तब भी नाबालिग होने के कारण उसका कोई कानूनी महत्व नहीं है।
अदालत ने कहा कि सामान्यतः सजा में वृद्धि का अर्थ होता है विवेकाधीन दायरे के भीतर सजा को बढ़ाना जैसे न्यूनतम से अधिकतम तक बढ़ाना। लेकिन जहां कानून स्वयं यह निर्धारित करता है कि सजा एक निश्चित न्यूनतम से कम नहीं हो सकती, वहां अदालत के पास कम सजा देने का विकल्प ही नहीं है।
पीठ ने कहा,
“न्यूनतम वैधानिक सजा देने के परिणामस्वरूप सजा की अवधि बढ़ सकती है परंतु इसे सजा में वृद्धि नहीं कहा जा सकता। ऐसी स्थिति में CrPC की धारा 386 के तहत शक्तियों का प्रयोग करना न्यायहित में होगा।”
अदालत ने CrPC की धारा 28 और 354 का हवाला देते हुए कहा कि अदालत केवल वही सजा दे सकती है, जो कानून द्वारा अधिकृत हो। साथ ही POCSO Act की धारा 42 का उल्लेख करते हुए कहा गया कि यदि कोई कृत्य IPC और POCSO Act दोनों के तहत अपराध बनता है तो आरोपी को अधिक गंभीर दंड वाली धारा के अनुसार सजा दी जाएगी।
हाइकोर्ट ने आरोपी की दोषसिद्धि के विरुद्ध अपील खारिज की। साथ ही CrPC की धारा 386 के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए POCSO Act की धारा 6 के तहत बीस वर्ष का कठोर कारावास तथा IPC की धारा 376(2)(n) के तहत दस वर्ष का कठोर कारावास निर्धारित किया।
अदालत ने स्पष्ट किया कि यह सजा कानून द्वारा निर्धारित न्यूनतम दंड के अनुरूप है और इसे सजा में वृद्धि नहीं माना जा सकता बल्कि विधिक त्रुटि का आवश्यक सुधार है।

