साइबर ठगी में फंसे कारोबारी को राहत: बॉम्बे हाईकोर्ट ने HDFC बैंक को ₹38.04 लाख लौटाने का दिया आदेश
Amir Ahmad
10 April 2026 5:50 PM IST

बॉम्बे हाईकोर्ट ने साइबर धोखाधड़ी के मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए HDFC बैंक को निर्देश दिया कि वह पुणे के कारोबारी को 38.04 लाख रुपये वापस करे। अदालत ने कहा कि ग्राहक की कोई गलती नहीं पाई गई और वह “शून्य देयता” के सिद्धांत का लाभ पाने का हकदार है।
जस्टिस भारती डांगरे और जस्टिस मंजूषा देशपांडे की खंडपीठ ने यह आदेश देते हुए स्पष्ट किया कि धोखाधड़ी सिम स्वैपिंग/क्लोनिंग के जरिए की गई, जिसमें ग्राहक की कोई भूमिका नहीं थी।
मामले के अनुसार, 14 सितंबर 2021 को कारोबारी के खाते में तीन अज्ञात लोगों को लाभार्थी के रूप में जोड़ा गया और अगले ही दिन मात्र 41 मिनट के भीतर आठ लेनदेन कर 38.04 लाख रुपये निकाल लिए गए।
अदालत ने पाया कि पीड़ित को इन लेनदेन की जानकारी बाद में हुई। उसने तुरंत बैंक से संपर्क करने की कोशिश की और पुलिस में शिकायत भी दर्ज कराई।
बैंक ने यह दलील दी कि उसने एसएमएस और ओटीपी भेजे थे, लेकिन अदालत ने इसे स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड से यह साबित नहीं होता कि ग्राहक को समय पर कोई सूचना मिली थी।
खंडपीठ ने कहा,
“कहीं भी यह साबित नहीं होता कि याचिकाकर्ता लापरवाह था या उसने किसी के साथ पासवर्ड साझा किया। बैंक इस बात को साबित करने में विफल रहा है।”
अदालत ने यह भी माना कि सिम स्वैपिंग के कारण असली सिम “नो नेटवर्क” में चला गया और धोखेबाजों ने ग्राहक बनकर ओटीपी प्राप्त कर लेनदेन को अंजाम दिया।
साथ ही, जांच में यह भी सामने आया कि संदिग्ध लेनदेन का आईपी पता चेन्नई का था, जो ग्राहक के सामान्य उपयोग से अलग था। इससे यह स्पष्ट हुआ कि लेनदेन किसी अन्य व्यक्ति द्वारा किए गए।
अदालत ने भारतीय रिजर्व बैंक के 6 जुलाई, 2017 के दिशा-निर्देशों का हवाला देते हुए कहा कि यदि ग्राहक की कोई लापरवाही नहीं है और उसने समय पर सूचना दी है, तो उस पर कोई देयता नहीं बनती।
अदालत ने कहा,
“जब न तो बैंक की स्पष्ट गलती है और न ही ग्राहक की, तब भी नियमों के अनुसार ग्राहक को 'शून्य देयता' का लाभ मिलना चाहिए।”
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने बैंक को आठ सप्ताह के भीतर पूरी राशि लौटाने का आदेश दिया। यदि तय समय में भुगतान नहीं किया गया तो उस पर 8 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देना होगा।
यह फैसला साइबर ठगी के मामलों में ग्राहकों के अधिकारों को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

