कम दंड और घटता भय कानून उल्लंघन की वजह: दंडात्मक प्रावधानों का सख्ती से पालन जरूरी- बॉम्बे हाइकोर्ट

Amir Ahmad

27 Feb 2026 3:30 PM IST

  • कम दंड और घटता भय कानून उल्लंघन की वजह: दंडात्मक प्रावधानों का सख्ती से पालन जरूरी- बॉम्बे हाइकोर्ट

    बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि देश में कानूनों के बार-बार उल्लंघन का एक प्रमुख कारण उनका कम निवारक प्रभाव और कानून का घटता भय है। अदालत ने स्पष्ट किया कि दंडात्मक प्रावधानों को केवल औपचारिकता के रूप में नहीं बल्कि प्रभावी ढंग से लागू किया जाना चाहिए।

    सिंगल बेंच जज जस्टिस जितेंद्र जैन ने 17 फरवरी को पारित आदेश में कहा कि दंडात्मक प्रावधानों का दोहरा उद्देश्य होता है पहला, दोषी को दंडित करना और दूसरा, दूसरों को कानून तोड़ने से रोकना।

    अदालत ने कहा,

    “दंडात्मक प्रावधानों का दोहरा प्रभाव होता है एक, अपराधी या चूक करने वाले को दंडित करना और दूसरा, उसे तथा अन्य लोगों को कानून तोड़ने से रोकने के लिए निवारक के रूप में कार्य करना। हमारे देश में कानून उल्लंघन की बढ़ती घटनाओं का कारण कानून का कम निवारक प्रभाव या भय का अभाव है। इसलिए दंडात्मक प्रावधानों को उचित मामलों में अधिक दृढ़ता से लागू किया जाना चाहिए।”

    जस्टिस जैन ने अमेरिकी विचारक बेंजामिन फ्रैंकलिन का उल्लेख करते हुए कहा,

    “अत्यधिक नरम कानूनों का पालन नहीं होता और अत्यधिक कठोर कानून लागू नहीं किए जाते। जब दंड कम होता है तो यह धारणा बनती है कि कोई भी कानून तोड़कर बच सकता है। हालांकि केवल दंड का भय ही पर्याप्त नहीं है; आदर्श समाज में कानून का पालन सिद्धांत के आधार पर होना चाहिए।”

    ये टिप्पणियां अदालत ने कर्मचारी राज्य बीमा निगम, पुणे द्वारा लगाए गए दंड को बरकरार रखते हुए कीं। निगम ने एक कारखाना इकाई पर 96,705 रुपये के विलंबित अंशदान के कारण 27,849 रुपये का दंड लगाया। यह अनियमितता तब सामने आई, जब निगम के अधिकारियों ने निरीक्षण के दौरान उपस्थिति और वेतन अभिलेखों में गड़बड़ी पाई।

    अदालत ने पाया कि संबंधित इकाई ने अंशदान के भुगतान में देरी की और बाद में किश्तों में राशि जमा की। इकाई ने दावा किया कि उसे मौखिक अनुमति दी गई किंतु इसका कोई प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया गया। देरी के कारण कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम की धारा 85-बी के तहत दंड लगाया गया।

    अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि यदि निरीक्षण नहीं किया जाता तो अभिलेखों में हेरफेर का पता नहीं चलता। जांच में पाया गया कि वर्ष 1997 का वेतन रजिस्टर वर्ष 2001 में तैयार किया गया और उसमें सात अंकों वाला दूरभाष क्रमांक अंकित था जो वर्ष 1999 में ही प्रचलन में आया।

    जस्टिस जैन ने कहा कि प्राधिकरण ने उदार दृष्टिकोण अपनाते हुए दंड की गणना निरीक्षण सूचना की तिथि से की, जबकि कानून के तहत अधिकतम दंड बकाया राशि तक लगाया जा सकता था।

    उन्होंने कहा,

    “96,705 रुपये के बकाया के मुकाबले 27,849 रुपये का दंड लगाया गया, जबकि प्रावधान अधिकतम बकाया राशि तक दंड की अनुमति देता है। इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि विवेक का प्रयोग अनुचित ढंग से किया गया।”

    अदालत ने कर्मचारी बीमा न्यायालय के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें दंड रद्द किया गया और कर्मचारी राज्य बीमा निगम, पुणे का मूल आदेश बहाल कर दिया। इस प्रकार निगम की प्रथम अपील स्वीकार कर ली गई।

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