सर रतन टाटा ट्रस्ट की बोर्ड बैठक पर रोक की मांग वाली याचिका वापस, बॉम्बे हाईकोर्ट ने जताई नाराज़गी

Amir Ahmad

13 May 2026 4:52 PM IST

  • सर रतन टाटा ट्रस्ट की बोर्ड बैठक पर रोक की मांग वाली याचिका वापस, बॉम्बे हाईकोर्ट ने जताई नाराज़गी

    बॉम्बे हाईकोर्ट ने सर रतन टाटा ट्रस्ट की 16 मई को प्रस्तावित महत्वपूर्ण बोर्ड बैठक पर रोक लगाने की मांग वाली याचिका को वापस लेने की अनुमति देते हुए निस्तारित किया। सुनवाई के दौरान अदालत ने याचिकाकर्ता के आचरण पर कड़ी नाराज़गी जताई और कहा कि मामला चौंकाने वाली स्थिति दर्शाता है।

    जस्टिस अद्वैत सेठना और जस्टिस संदेश पाटिल की अवकाशकालीन खंडपीठ इस मामले की सुनवाई कर रही थी।

    याचिकाकर्ता सुरेश पाटिलखेड़े ने अदालत से मांग की थी कि सर रतन टाटा ट्रस्ट की बोर्ड बैठक पर रोक लगाई जाए। उनका दावा था कि ट्रस्ट बोर्ड का गठन महाराष्ट्र सार्वजनिक न्यास अधिनियम के संशोधित प्रावधानों के विपरीत है।

    हालांकि, सुनवाई के दौरान अदालत को पता चला कि जिन शिकायतों और अभ्यावेदनों का हवाला देकर याचिका दायर की गई, वे स्वयं याचिकाकर्ता ने नहीं बल्कि किसी तीसरे पक्ष ने धर्मादाय आयुक्त के समक्ष दाखिल किए।

    इस पर अदालत ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा,

    “ये कार्यवाही एक बेहद चौंकाने वाली स्थिति को सामने लाती है। जिन अभ्यावेदनों के आधार पर इतनी तात्कालिकता दिखाई गई वे याचिकाकर्ता ने स्वयं दाखिल ही नहीं किए।”

    अदालत ने कहा कि यह महज गलती नहीं कही जा सकती।

    याचिकाकर्ता की ओर से सीनियर एडवोकेट टी. राजा ने दलील दी कि ट्रस्ट बोर्ड में छह ट्रस्टी हैं, जिनमें तीन स्थायी ट्रस्टी हैं। उनका कहना था कि यह संख्या कुल बोर्ड का 50 प्रतिशत है, जबकि संशोधित कानून के अनुसार स्थायी ट्रस्टियों की संख्या 25 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकती।

    उन्होंने कहा कि जब तक बोर्ड का पुनर्गठन नहीं होता, तब तक बैठक आयोजित नहीं की जानी चाहिए और बैठक में लिए गए निर्णय अवैध होंगे।

    हालांकि, अदालत इन दलीलों से संतुष्ट नहीं हुई।

    जस्टिस पाटिल ने पूछा,

    “आपकी याचिका की प्रार्थनाएं किस तरह सुनवाई योग्य हैं? ऐसा लगता है कि आप पहले से ही संभावित निर्णयों को चुनौती देना चाहते हैं।”

    ट्रस्ट के कुछ सदस्यों की ओर से सीनियर एडवोकेट अभिषेक मनु सिंघवी और जनक द्वारकादास ने भी याचिका का विरोध किया। उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता न तो ट्रस्ट के लाभार्थी हैं और न ही ट्रस्टी।

    सिंघवी ने अदालत को बताया कि राज्य सरकार पहले ही स्पष्ट कर चुकी है कि कानून में किया गया संशोधन भविष्य में लागू होगा, न कि पूर्व प्रभाव से।

    वहीं द्वारकादास ने कहा कि सितंबर 2025 से अब तक ट्रस्ट बोर्ड की कई बैठकें हो चुकी हैं लेकिन याचिकाकर्ता ने अब जाकर आपत्ति उठाई है।

    सुनवाई के दौरान अदालत ने याचिकाकर्ता के वकील को निर्देश लेने के लिए समय दिया। बाद में उन्होंने अदालत को बताया कि वे याचिका वापस लेना चाहते हैं।

    इस पर जस्टिस सेठना ने कहा,

    “किसी और द्वारा दिए गए अभ्यावेदन के आधार पर कोई तीसरा व्यक्ति अदालत आ जाए, इसे गलती नहीं कहा जा सकता।”

    इसके बाद अदालत ने याचिका वापस लेने की अनुमति देते हुए मामले का निस्तारण किया।

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