किसी भी नागरिक को आतंकित नहीं किया जा सकता: सचिन वाजे के पुलिस विभाग में रसूख का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने जमानत देने पर स्पेशल कोर्ट की आलोचना की

  • किसी भी नागरिक को आतंकित नहीं किया जा सकता: सचिन वाजे के पुलिस विभाग में रसूख का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने जमानत देने पर स्पेशल कोर्ट की आलोचना की

    बॉम्बे हाईकोर्ट ने गुरुवार (5 नवंबर) को एंटीलिया बम धमकी मामले में विवादित पुलिस अधिकारी सचिन वाजे को विशेष अदालत से मिली जमानत रद्द की।

    हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस देश के किसी भी नागरिक को, चाहे वह आम व्यक्ति हो या उद्योगपति, आतंक के मामूली खतरे का भी सामना नहीं करना चाहिए।

    जस्टिस गिरीश कुलकर्णी और जस्टिस डॉ. नीला गोखले की खंडपीठ ने विशेष अदालत की उस टिप्पणी की आलोचना की, जिसमें कहा गया था कि घटना के बाद अंबानी परिवार के आतंकित होने का कोई सबूत रिकॉर्ड पर नहीं है।

    हाईकोर्ट ने कहा कि किसी धमकी का असर वही व्यक्ति समझ सकता है जिसे उसका सामना करना पड़ा हो।

    अदालत ने कहा,

    “इस देश का कोई भी नागरिक, विशेषकर इस मामले में देश और उसकी अर्थव्यवस्था में योगदान देने वाला प्रतिष्ठित उद्योगपति, आतंक के मामूली खतरे का भी सामना नहीं कर सकता। आतंक की धमकी झेलने वाला व्यक्ति ही उसके दुष्परिणामों की कल्पना कर सकता है। जमानत के संदर्भ में यदि ऐसी गतिविधियों से कानून के तहत सख्ती से नहीं निपटा गया, तो कानून का शासन ही खतरे में पड़ जाएगा। इसलिए वाजे को जमानत पर रिहा नहीं किया जा सकता। उसे जमानत देना व्यापक जनहित के खिलाफ होगा।”

    अपने 86 पन्नों के विस्तृत फैसले में खंडपीठ ने पुलिस विभाग में वाजे के प्रभाव और राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) के इस आरोप पर गौर किया कि वह अपनी 'सुपर कॉप' की छवि दोबारा स्थापित करना चाहता था।

    अदालत को बताया गया कि मार्च 2004 से जून 2020 तक करीब 16 साल निलंबित रहने के बाद वाजे अपनी पुरानी छवि वापस पाने और पुलिस विभाग में फिर से प्रभाव जमाने के लिए उत्सुक था।

    खंडपीठ ने कहा कि प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि वाजे ने एक सुनियोजित साजिश रची। इसके तहत मनसुख की कार को चोरी की दिखाया गया, उसकी नंबर प्लेट बदली गई, कार को अंबानी के आवास के बाहर खड़ा किया गया और उसमें विस्फोटक सामग्री रखी गई। कार में धमकी भरा पत्र भी छोड़ा गया।

    अदालत ने कहा कि विस्फोटकों से भरी कार मिलने के बाद रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री से संकेत मिलता है कि वाजे ने टेलीग्राम चैनल पर आतंकी संगठन के नाम से संदेश जारी कर इस घटना की जिम्मेदारी उस संगठन पर डालने की कोशिश की। हालांकि, संबंधित संगठन ने तुरंत एक अन्य संदेश जारी कर घटना से खुद को अलग कर लिया।

    खंडपीठ के अनुसार आतंकी संगठन के नाम का इस्तेमाल करने का उद्देश्य आम लोगों के मन में बम धमाके का डर पैदा करना था। इसके बाद कथित सुपर कॉप अमीर उद्योगपतियों को सुरक्षा देने के नाम पर सामने आता और धीरे-धीरे उनसे पैसे वसूलता।

    अदालत ने कहा कि यह पूरी योजना भले ही किसी फिल्मी कहानी जैसी लगे, लेकिन इससे जुड़े आरोप गंभीर अपराधों की ओर संकेत करते हैं।

    खंडपीठ ने प्रथम दृष्टया कहा कि वाजे पुलिस विभाग के उच्च पद पर नहीं था फिर भी वह ऐसे आपराधिक कृत्यों में शामिल होने में सक्षम था। इसके लिए उसने अनजान जूनियर पुलिस अधिकारियों की मदद ली। उसका रिकॉर्ड भी एक सामान्य सरकारी कर्मचारी से काफी अलग था।

    अदालत ने कहा कि सहायक पुलिस निरीक्षक होने के बावजूद वाजे के पास महंगी लग्जरी कारें थीं। वह उन मामलों की जांच भी अपने पास लेने में प्रभावशाली था, जिनमें उसकी सीधी भूमिका थी जबकि मामले अलग-अलग पुलिस थानों में दर्ज है।

    खंडपीठ ने कहा कि पुलिस तंत्र में उसके रसूख को कम करके नहीं आंका जा सकता। वरिष्ठ अधिकारियों से उसके संबंध भी प्रभावशाली लोगों के साथ उसकी नजदीकी दर्शाते हैं।

    NIA की ओर से यह भी आरोप लगाया गया कि वाजे खुले तौर पर जबरन वसूली का रैकेट चला रहा था और होटल तथा बार मालिकों को झूठी छापेमारी की धमकी देकर ब्लैकमेल करता था। अदालत ने कहा कि इस तरह की गतिविधियां गवाहों को प्रभावित करने की उसकी क्षमता के बारे में भी महत्वपूर्ण संकेत देती हैं।

    खंडपीठ ने कहा कि वाजे के प्रभाव, आर्थिक संपन्नता और पुलिस विभाग में उसकी पहुंच को देखते हुए उसे जमानत पर रिहा करने से मुकदमे पर प्रतिकूल असर पड़ने की आशंका है। यह आशंका केवल सबूतों और गवाहों से छेड़छाड़ तक सीमित नहीं है, बल्कि रिकॉर्ड पर मौजूद अन्य परिस्थितियां भी इस ओर संकेत करती हैं।

    अदालत ने कहा कि वर्दी पहनने वाले व्यक्ति से, जिसका कर्तव्य नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना है, ऐसी गतिविधियों में शामिल होने की अपेक्षा नहीं की जा सकती।

    वाजे के खिलाफ लगाए गए आरोपों को प्रथम दृष्टया ठोस सामग्री और साक्ष्य का समर्थन प्राप्त है। व्यापक जनहित, राज्य और राष्ट्र के हित को देखते हुए न्याय की प्रक्रिया को बाधित या दूषित नहीं होने दिया जा सकता।

    खंडपीठ ने वाजे पर लगाए गए आरोपों पर विचार करते हुए कहा कि मनसुख हिरन की कार का इस्तेमाल करना, फर्जी नंबर प्लेट लगवाना, जिलेटिन की छड़ें हासिल करना, उन्हें कार में रखना और फिर कार को मुंबई में अंबानी के आवास के पास खड़ा करना प्रथम दृष्टया गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम यानी यूएपीए की धारा 15 के तहत आने वाली गतिविधियों से सीधा संबंध रखता है।

    अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष की सामग्री यूएपीए की धारा 43डी(5) के तहत निर्धारित कानूनी कसौटी पर खरी उतरती है। इस प्रावधान के तहत यदि आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोप प्रथम दृष्टया सही मानने के उचित आधार हों, तो जमानत नहीं दी जा सकती।

    खंडपीठ ने कहा,

    “हमारा विचार है कि अभियोजन पक्ष की मौजूदा सामग्री निर्धारित सीमा को पार करती है और धारा 43डी(5) के तहत जमानत पर लगी वैधानिक रोक पूरी तरह लागू होती है। प्रथम दृष्टया पूरे अभियोजन मामले को देखने पर वाजे के खिलाफ लगाए गए आरोपों में UAPA की धारा 15 के तहत आतंकवादी कृत्य के विभिन्न तत्व दिखाई देते हैं। रिकॉर्ड पर ऐसी सामग्री है, जो देश की एकता, अखंडता और सुरक्षा, जिसमें आर्थिक सुरक्षा भी शामिल है, को खतरा पहुंचाने या लोगों के एक वर्ग में आतंक पैदा करने के इरादे की ओर संकेत करती है।”

    अदालत ने यह भी कहा कि NIAके अनुसार इस घटना का निशाना एक प्रमुख उद्योगपति परिवार था जिसका देश के आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान है।

    खंडपीठ ने जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान विशेष अदालत के रवैये पर गहरी चिंता जताई। हाईकोर्ट ने कहा कि विशेष अदालत ने मामले की गंभीरता के बावजूद बेहद लापरवाही से कार्यवाही की और जमानत देने के आदेश में ऐसी टिप्पणियां कीं, जिनका कोई तार्किक या कानूनी आधार नहीं था।

    अदालत ने कहा कि विशेष जज की टिप्पणियां न्यायिक तर्क के बुनियादी सिद्धांतों से मेल नहीं खातीं। विशेष अदालत ने जमानत तय करने के स्थापित सिद्धांतों और मानकों पर विचार नहीं किया। उसके आदेश में कई विरोधाभास भी हैं जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

    हाईकोर्ट ने विशेष अदालत की इस टिप्पणी को भी कानूनी रूप से गलत बताया कि आरोप तय करने के लिए संतुष्टि का स्तर जमानत देने की तुलना में कम होता है।

    खंडपीठ ने कहा कि यह और भी गंभीर है क्योंकि विशेष अदालत खुद वाजे के खिलाफ आरोपों में प्रथम दृष्टया आधार मौजूद होने की बात स्वीकार कर चुकी थी।

    हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि विशेष अदालत ने उसके पहले के आदेश को गलत तरीके से पढ़ा।

    हाईकोर्ट ने पहले वाजे को नए सिरे से जमानत याचिका दाखिल करने की अनुमति दी थी, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं था कि विशेष अदालत अभियोजन पक्ष की सामग्री पर विचार किए बिना जमानत दे सकती थी। उस आदेश में स्पष्ट था कि नई जमानत याचिका का फैसला गुण-दोष और कानून के अनुसार किया जाना चाहिए।

    खंडपीठ ने कहा कि विशेष अदालत का यह दृष्टिकोण गंभीर कानूनी त्रुटि है और उसका आदेश रद्द किए जाने योग्य है।

    इन टिप्पणियों के साथ बॉम्बे हाईकोर्ट ने विशेष अदालत द्वारा सचिन वाजे को दी गई जमानत रद्द करते हुए आदेश निरस्त किया।

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