एकल मां को पूर्ण अभिभावक मानना दान नहीं, संवैधानिक निष्ठा: बॉम्बे हाइकोर्ट ने दिया बच्ची के स्कूल अभिलेख से पिता का नाम हटाने का आदेश

Amir Ahmad

19 Feb 2026 2:40 PM IST

  • एकल मां को पूर्ण अभिभावक मानना दान नहीं, संवैधानिक निष्ठा: बॉम्बे हाइकोर्ट ने दिया बच्ची के स्कूल अभिलेख से पिता का नाम हटाने का आदेश

    बॉम्बे हाईकोर्ट की औरंगाबाद पीठ ने महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि किसी एकल मां को बच्चे की नागरिक पहचान के लिए पूर्ण अभिभावक के रूप में मान्यता देना कोई दान नहीं, बल्कि संविधान के प्रति निष्ठा है। अदालत ने नाबालिग बच्ची के स्कूल रिकॉर्ड से उसके पिता का नाम हटाने और उसकी जाति मराठा के स्थान पर मां की जाति महार (अनुसूचित जाति) दर्ज करने का आदेश दिया।

    जस्टिस विभा कंकणवाडी और जस्टिस हितेन वेणगावकर की खंडपीठ ने कहा कि जो मां अपने बच्चे का अकेले पालन-पोषण कर रही है, उसके अधिकारों को विधिवत मान्यता मिलनी चाहिए।

    2 फरवरी को सुनाए गए निर्णय में अदालत ने कहा,

    “एकल मां को बच्चे की नागरिक पहचान के लिए पूर्ण अभिभावक के रूप में मान्यता देना दया का कार्य नहीं, बल्कि संवैधानिक निष्ठा है। यह पितृसत्तात्मक बाध्यता से संवैधानिक चयन की ओर वंश को नियति मानने से गरिमा को अधिकार मानने की ओर बढ़ने का प्रतीक है। जो समाज स्वयं को विकसित बताता है वह यह आग्रह नहीं कर सकता कि बच्चे की सार्वजनिक पहचान ऐसे पिता से जुड़ी रहे, जो उसके जीवन में अनुपस्थित है, जबकि पूरा दायित्व निभाने वाली मां प्रशासनिक रूप से गौण बनी रहे।”

    खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि जहां मां ही एकमात्र संरक्षक और पालनकर्ता है, वहां स्कूल रिकॉर्ड में पिता के नाम के स्थान पर मां का नाम और उपनाम दर्ज करना किसी सार्वजनिक उद्देश्य के विपरीत नहीं है बल्कि यह तथ्यात्मक सटीकता, बाल कल्याण और राज्य की नीति के अनुरूप है जिसमें सरकारी दस्तावेजों में मां का नाम अनिवार्य किया गया।

    अदालत ने कहा कि अनुच्छेद 21 केवल अस्तित्व की नहीं बल्कि गरिमापूर्ण जीवन की रक्षा करता है। गरिमा में यह अधिकार भी शामिल है कि बच्चे की पहचान किसी अनुपस्थित अभिभावक से जबरन न जोड़ी जाए, जब उसका कोई कल्याणकारी उद्देश्य न हो और उससे सामाजिक हानि की आशंका हो।

    खंडपीठ ने कहा,

    “स्कूल का रिकॉर्ड निजी कागज नहीं बल्कि सार्वजनिक दस्तावेज है, जो बच्चे के साथ वर्षों तक चलता है। यदि बच्ची का वास्तविक संरक्षकत्व मातृक है तो अभिलेख में पितृक पहचान थोपना प्रशासनिक तटस्थता नहीं कहा जा सकता।”

    अनुच्छेद 14 का उल्लेख करते हुए जस्टिस वेणगावकर ने कहा कि यह मान लेना कि पहचान केवल पिता से प्रवाहित होगी, कोई तटस्थ प्रशासनिक व्यवस्था नहीं, बल्कि पितृसत्तात्मक ढांचे से उपजी सामाजिक धारणा है। आज के भारत में, विशेषकर एकल मातृत्व के मामलों में इस धारणा पर जोर देना महिलाओं और उनके बच्चों पर संरचनात्मक बोझ डालता है। यह समानता के सिद्धांत का उल्लंघन है।

    जाति परिवर्तन के प्रश्न पर अदालत ने माना कि स्कूल स्वयं जाति निर्धारण करने वाली संस्था नहीं है और जाति प्रमाणपत्र के दुरुपयोग की आशंका भी रहती है। फिर भी खंडपीठ ने कहा कि राज्य किसी कठोर और पितृसत्तात्मक नियम के आधार पर उस बच्ची को, जो पूरी तरह अपनी अनुसूचित जाति की मां के संरक्षण में पली-बढ़ी है और पिता से पूर्णतः अलग है पिता की जाति ढोने के लिए बाध्य नहीं कर सकता।

    अदालत ने कहा,

    “नाबालिग को उसके शैक्षणिक अभिलेखों में ऐसे व्यक्ति की जाति ढोने के लिए विवश करना, जिसने स्वयं को पूरी तरह अलग कर लिया है, सामाजिक वास्तविकता और निष्पक्षता के विपरीत होगा। मां की जाति के आधार पर स्कूल रिकॉर्ड में संशोधन स्पष्ट त्रुटि के परिमार्जन की श्रेणी में आता है।”

    प्रकरण के तथ्य

    यह आदेश 12 वर्षीय बालिका और उसकी मां द्वारा संयुक्त रूप से दायर याचिका पर पारित हुआ। याचिका में बच्ची के स्कूल रिकॉर्ड और जन्म प्रमाणपत्र से पिता का नाम व उपनाम हटाकर मां का नाम, उपनाम और जाति दर्ज करने की मांग की गई।

    मां के अनुसार बच्ची का जन्म बलात्कार की घटना के बाद हुआ। DNA टेस्ट के बाद आरोपी व्यक्ति को जैविक पिता के रूप में चिह्नित किया गया। बाद में एक समझौते में आरोपी ने स्पष्ट किया कि वह बच्ची के जीवन में कोई भूमिका नहीं निभाएगा और मां ही उसका पालन-पोषण करेगी। इसके बावजूद जन्म प्रमाणपत्र और स्कूल रिकॉर्ड में नियमित प्रविष्टि के कारण पिता का नाम दर्ज हो गया।

    जब मां ने इसे बदलने का अनुरोध किया तो स्कूल प्रशासन ने इनकार किया, जिसके बाद मां और बेटी को हाइकोर्ट की शरण लेनी पड़ी।

    अदालत ने कहा कि संवैधानिक प्रावधान अनुच्छेद 14, 15 और 21 तथा नीति निदेशक तत्व केवल अलंकारिक शब्द नहीं, बल्कि मार्गदर्शक सिद्धांत हैं।

    “जब राज्य के अधीन प्राधिकारी अधीनस्थ नियमों के आधार पर किसी नाबालिग की गरिमा और भविष्य से जुड़े अधिकारों से इनकार करते हैं तब संवैधानिक न्यायालय को हस्तक्षेप करना ही होगा।”

    इन टिप्पणियों के साथ खंडपीठ ने संबंधित प्राधिकारियों को बच्ची के स्कूल अभिलेखों में आवश्यक संशोधन करने का निर्देश दिया।

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