RTE के तहत पड़ोस के स्कूल में एडमिशन के लिए निवास का प्रमाण अनिवार्य, औपचारिकता नहीं: बॉम्बे हाईकोर्ट
Amir Ahmad
26 Jun 2026 5:40 PM IST

बॉम्बे हाईकोर्ट ने शिक्षा का अधिकार अधिकार (RTE Act) के तहत पड़ोस के स्कूल आरक्षण श्रेणी में प्रवेश से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि निवास का प्रमाण केवल औपचारिकता नहीं बल्कि पात्रता की अनिवार्य शर्त है। यदि इसका संतोषजनक प्रमाण नहीं दिया जाता तो इससे वास्तव में पात्र और जरूरतमंद बच्चे का अधिकार प्रभावित हो सकता है।
एक्टिंग चीफ जस्टिस रवींद्र घुगे और जस्टिस गौतम अंखड़ की खंडपीठ ने नाबालिग छात्र की ओर से दायर याचिका खारिज की। याचिका में पुणे के प्राइवेट स्कूल को शैक्षणिक सत्र 2026-27 के लिए RTE Act की धारा 12(1)(सी) के तहत प्रवेश देने का निर्देश देने की मांग की गई।
धारा 12(1)(सी) के तहत निजी गैर-सहायता प्राप्त विद्यालयों में एडमिशन स्तर की कम से कम 25 प्रतिशत सीटें आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग और वंचित समूह के उन बच्चों के लिए आरक्षित हैं, जो विद्यालय के निर्धारित पड़ोस क्षेत्र में रहते हैं।
मामले में छात्र के पिता ने एडमिशन आवेदन में जो पता दर्ज किया, वह उनके मतदाता पहचान पत्र, आधार कार्ड और अन्य दस्तावेजों में दर्ज पते से मेल नहीं खाता था। उनका कहना था कि परिवार किराए के मकान में रहता है।
विद्यालय प्रशासन ने ऑनलाइन सत्यापन के दौरान आवेदन में दिए गए पते और डिजिटल मानचित्र के विवरण में अंतर पाया। बाद में हाईकोर्ट के निर्देश पर हुए भौतिक सत्यापन में भी यह सामने आया कि आवेदन में दर्ज पता और वास्तविक निवास अलग-अलग हैं तथा छात्र का वास्तविक निवास संबंधित विद्यालय के पड़ोस क्षेत्र में नहीं है।
इन तथ्यों के आधार पर हाईकोर्ट ने कहा,
“निवास संबंधी शर्त कोई औपचारिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि आरक्षित श्रेणी में प्रवेश के लिए यह एक अनिवार्य पात्रता शर्त है। यदि पर्याप्त प्रमाण के बिना इस शर्त को नजरअंदाज किया जाए तो इससे कानून की मंशा विफल होगी और किसी ऐसे जरूरतमंद बच्चे का प्रवेश प्रभावित हो सकता है, जो वास्तव में पड़ोस की शर्त पूरी करता हो।”
याचिकाकर्ता के पिता ने दलील दी कि उनका निवास विद्यालय से लगभग 950 मीटर की दूरी पर है और विद्यालय ने डिजिटल मानचित्र में हुई कथित त्रुटि के आधार पर प्रवेश देने से इनकार किया।
हालांकि, हाईकोर्ट ने शिक्षा विभाग की जांच रिपोर्ट का हवाला देते हुए पाया कि आवेदन में जिस मकान का पता दिया गया, उसकी पहली मंजिल पर केवल एक चारपाई थी, जबकि भूतल पर छात्र की दादी एक छोटा भोजनालय चलाती थीं। अदालत ने कहा कि ऐसा कोई विश्वसनीय साक्ष्य नहीं है, जिससे यह साबित हो कि छात्र और उसका परिवार नियमित रूप से वहीं निवास करता है।
अदालत ने यह भी कहा कि तीन सदस्यों का परिवार केवल चारपाई वाले ऐसे छोटे परिसर में रहता है, यह स्वीकार करना कठिन है। याचिकाकर्ता ने बिजली बिल, पानी का बिल, गैस कनेक्शन, बैंक पत्राचार, राशन कार्ड या अन्य कोई समकालीन दस्तावेज भी प्रस्तुत नहीं किया, जिससे वास्तविक निवास साबित हो सके।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि वास्तविक निवास साबित करने का दायित्व पूरी तरह याचिकाकर्ता पर है। केवल यह कहना कि ऑनलाइन पते में तकनीकी त्रुटि थी, पर्याप्त नहीं माना जा सकता।
इन टिप्पणियों के साथ बॉम्बे हाईकोर्ट ने याचिका खारिज की।

