तबादले से नाराज़ कर्मचारी द्वारा कार्यालय में पुलिस लाना और बाहरी अधिकारियों से शिकायत करना कदाचार: बॉम्बे हाईकोर्ट

Amir Ahmad

20 Jun 2026 12:44 PM IST

  • तबादले से नाराज़ कर्मचारी द्वारा कार्यालय में पुलिस लाना और बाहरी अधिकारियों से शिकायत करना कदाचार: बॉम्बे हाईकोर्ट

    बॉम्बे हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि किसी कर्मचारी को नियमित प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत स्थानांतरित किया जाता है और वह इसके विरोध में पुलिस के पास शिकायत कर कार्यालय में पुलिसकर्मियों को लेकर आता है, तो यह कदाचार की श्रेणी में आता है। अदालत ने यह भी कहा कि सेवा संबंधी विवादों को लेकर नियोक्ता के खिलाफ विभिन्न बाहरी और असंबंधित प्राधिकरणों के समक्ष गंभीर आरोप लगाना भी कदाचार माना जा सकता है।

    जस्टिस संदीप मार्ने ने 18 जून को दिए अपने आदेश में अभ्युदय सहकारी बैंक लिमिटेड की याचिका स्वीकार करते हुए ठाणे श्रम न्यायालय के 1 सितंबर 2023 के आदेश पर सवाल उठाए। श्रम न्यायालय ने बैंक द्वारा कर्मचारी स्मिता पाटिल के खिलाफ की गई विभागीय जांच को निष्पक्ष तो माना था, लेकिन जांच के निष्कर्षों को त्रुटिपूर्ण करार दिया था।

    मामले के अनुसार स्मिता पाटिल पहले पुणे शाखा में कार्यरत थीं। बाद में उनका तबादला मुंबई और फिर 17 मई 2012 को वाशी शाखा में कर दिया गया। उन्हें 18 मई 2012 को नई शाखा में कार्यभार ग्रहण करने का निर्देश दिया गया।

    हाईकोर्ट के अनुसार मुंबई शाखा से कार्यमुक्त होने के बाद पाटिल दो पुलिसकर्मियों को बैंक कार्यालय लेकर पहुंचीं और आरोप लगाया कि उनका मनमाने तरीके से तबादला कर उन्हें प्रताड़ित किया जा रहा है। पुलिसकर्मियों ने बैंक के मानव संसाधन प्रबंधक से तबादले के कारणों को लेकर पूछताछ की और फिर वहां से चले गए।

    इस पर अदालत ने कहा,

    "जब किसी बैंक अधिकारी से पुलिस पूछताछ करती है तो वह स्वाभाविक रूप से भय और दबाव महसूस करेगा। केवल तबादले की शिकायत लेकर पुलिस के पास जाना ही कदाचार है। यदि वह तबादले से असंतुष्ट थीं तो उन्हें बैंक के भीतर उपलब्ध वैधानिक और प्रशासनिक उपायों का सहारा लेना चाहिए। पुलिस को कार्यालय लाकर अधिकारियों से पूछताछ कराना निस्संदेह कदाचार है।"

    हाईकोर्ट ने कहा कि श्रम न्यायालय ने आरोप को गलत तरीके से समझा और ऐसा मान लिया कि मामला तबादला आदेश का पालन न करने से संबंधित है, जबकि आरोप का मूल आधार पुलिस को कार्यालय लाकर अधिकारियों से पूछताछ कराना था।

    अदालत ने कहा कि यह तथ्य कि पाटिल ने 18 मई को सुबह वाशी शाखा में रिपोर्ट की, उन्हें कदाचार के आरोप से मुक्त नहीं करता।

    जस्टिस मार्ने ने कहा,

    "आरोपपत्र में कहीं भी यह नहीं कहा गया कि उन्होंने तबादला आदेश मानने से इनकार किया। इसलिए श्रम न्यायालय द्वारा दिया गया निष्कर्ष पूरी तरह त्रुटिपूर्ण है।"

    अदालत ने श्रम न्यायालय की उस दलील को भी खारिज किया कि चूंकि बैंक अधिकारी के साथ कोई हिंसा, अभद्रता या अपशब्दों का प्रयोग नहीं हुआ, इसलिए कदाचार नहीं माना जा सकता।

    हाईकोर्ट ने कहा कि बैंक ने कभी हिंसा या अभद्र व्यवहार का आरोप लगाया ही नहीं। विवाद का मुद्दा केवल इतना था कि क्या तबादले की शिकायत लेकर पुलिस को कार्यालय बुलाना और अधिकारियों से पूछताछ कराना कदाचार है या नहीं।

    मामले में दूसरा आरोप यह था कि पाटिल ने बैंक के कामकाज और प्रबंधन को लेकर भारतीय रिजर्व बैंक, केंद्र सरकार, मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री तथा महाराष्ट्र राज्य मानवाधिकार आयोग सहित कई बाहरी संस्थाओं को शिकायतें भेजीं। इन शिकायतों में वेतन, आवास ऋण, प्रतिपूर्ति, यूनियन शुल्क कटौती और वरिष्ठ अधिकारियों के व्यवहार सहित कई मुद्दे उठाए गए।

    हाईकोर्ट ने कहा कि कर्मचारी को अपनी सेवा संबंधी शिकायतें संगठन के भीतर उठाने का पूरा अधिकार है, लेकिन बाहरी और असंबंधित संस्थाओं के समक्ष संस्थान के कामकाज को लेकर आरोप लगाना अलग बात है।

    अदालत ने कहा,

    "यदि शिकायतें केवल व्यक्तिगत सेवा संबंधी मुद्दों तक सीमित रहतीं और बैंक के उच्च अधिकारियों को भेजी जातीं तो इसे कदाचार नहीं माना जाता। लेकिन उन्होंने अपनी व्यक्तिगत शिकायतों की सीमा से आगे बढ़कर बाहरी प्राधिकरणों के समक्ष भी आरोप लगाए।"

    हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि यह अंतिम रूप से तय करना कि यह गंभीर कदाचार है या नहीं, अंतिम निर्णय के समय किया जाएगा। फिलहाल यह कहना उचित नहीं होगा कि ऐसे कृत्यों में किसी प्रकार का कदाचार नहीं था।

    इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने मामला पुनर्विचार के लिए श्रम न्यायालय को वापस भेज दिया और निर्देश दिया कि वह छह माह के भीतर अंतिम फैसला सुनाने का प्रयास करे।

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