मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम को मुकदमे का हथियार नहीं बनाया जा सकता: बॉम्बे हाइकोर्ट ने पिता की मानसिक जांच की मांग ठुकराई
Amir Ahmad
27 Feb 2026 1:07 PM IST

बॉम्बे हाईकोर्ट ने हाल ही में स्पष्ट किया कि मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम 2017 की धारा 105 का उपयोग किसी पक्षकार के विरुद्ध मुकदमेबाजी में रणनीतिक हथियार के रूप में नहीं किया जा सकता। अदालत ने एक याचिका खारिज करते हुए कहा कि यह प्रावधान मानसिक रूप से बीमार व्यक्तियों के अधिकारों की रक्षा के लिए है न कि प्रतिद्वंद्वी पक्ष को परेशान करने के लिए।
सिंगल जज जस्टिस फरहान दुबाश ने 17 फरवरी को पारित आदेश में कहा कि यदि किसी व्यक्ति की मानसिक स्थिति को उसके विरोधी द्वारा चुनौती दिए जाने मात्र पर न्यायालय मानसिक स्वास्थ्य पुनरावलोकन बोर्ड को संदर्भित करने लगे, तो यह व्यवस्था अधिकारों की रक्षा के बजाय मुकदमेबाजी का हथियार बन जाएगी।
अदालत ने कहा कि अधिनियम के अध्याय 13 में धारा 100 से 104 तक विभिन्न एजेंसियों पर यह दायित्व डाला गया कि यदि कोई व्यक्ति मानसिक बीमारी से ग्रस्त प्रतीत हो तो उसे तत्काल उपचार के लिए मानसिक स्वास्थ्य संस्थान भेजा जाए। इसी प्रकार धारा 105 न्यायालय पर दायित्व डालती है कि यदि उसके समक्ष मानसिक बीमारी का प्रमाण प्रस्तुत हो तो वह आवश्यक कदम उठाए।
जस्टिस दुबाश ने कहा,
“इन प्रावधानों का सामूहिक उद्देश्य मानसिक बीमारी से ग्रस्त व्यक्तियों के अधिकारों की रक्षा करना है, न कि ऐसा तंत्र तैयार करना जिसे कोई पक्षकार मुकदमे में लाभ पाने के लिए हथियार की तरह इस्तेमाल कर सके।”
मामले में एक पुत्र ने अपने पिता की मानसिक स्थिति पर प्रश्न उठाते हुए मेडिकल सर्टिफिकेट प्रस्तुत किया और धारा 105 के तहत उन्हें मानसिक स्वास्थ्य पुनरावलोकन बोर्ड के समक्ष भेजने की मांग की थी। पुत्र ने हाइकोर्ट में पैतृक संपत्ति के बंटवारे का मुकदमा भी दायर कर रखा और उसी संदर्भ में पिता की मानसिक स्थिति को आधार बनाया।
अदालत ने मेडिकल सर्टिफिकेट का अवलोकन करते हुए पाया कि उसमें केवल यह उल्लेख था कि पिता मधुमेह के मरीज हैं और इंसुलिन लेने के बाद कभी-कभी रक्त शर्करा स्तर कम होने से भ्रम, अस्थायी भूलने की बीमारी या पसीना आने जैसे लक्षण दिखाई देते हैं। अदालत ने कहा कि ये लक्षण सामान्यतः अस्थायी होते हैं और रक्त शर्करा सामान्य होने पर समाप्त हो जाते हैं।
जस्टिस दुबाश ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा,
“यदि इस प्रकार की याचिकाओं को स्वीकार किया जाए तो बेईमान मुकदमेबाजों को अधिनियम की धाराओं को उत्पीड़न के औजार के रूप में इस्तेमाल करने का रास्ता मिल जाएगा। इससे ऐसी स्थिति पैदा हो सकती है, जहां हर विवादित पक्ष एक-दूसरे के खिलाफ धारा 105 का सहारा लेने लगे, जो विधायी मंशा के विपरीत और न्याय व्यवस्था के लिए हानिकारक होगा।”
अदालत ने अधिनियम की प्रस्तावना का उल्लेख करते हुए कहा कि यह कानून मानसिक बीमारी से ग्रस्त व्यक्तियों की सुरक्षा, उपचार और पुनर्वास के लिए अधिकार-आधारित ढांचा प्रदान करता है।
अदालत ने कहा,
“धारा 105 एक ढाल है, तलवार नहीं।"
अंततः हाइकोर्ट ने यह पाते हुए कि पुत्र का आवेदन अपने पिता के अधिकारों की रक्षा के उद्देश्य से नहीं बल्कि लंबित मुकदमे में लाभ लेने की रणनीति के तहत दायर किया गया अंतरिम आवेदन खारिज किया।

