सड़क पर दो लोगों का जोर-जोर से चिल्लाना संज्ञेय अपराध नहीं, बॉम्बे हाईकोर्ट ने FIR रद्द की
Amir Ahmad
11 Sept 2026 3:39 PM IST

बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि सार्वजनिक सड़क पर दो लोगों का एक-दूसरे से सिर्फ जोर-जोर से चिल्लाकर बात करना, अपने आप में महाराष्ट्र निषेध अधिनियम, 1949 की धारा 85(1) के तहत संज्ञेय अपराध नहीं बनता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल इस आरोप के आधार पर कि दोनों व्यक्ति शराब के नशे में एक-दूसरे पर चिल्ला रहे थे, उनके खिलाफ आपराधिक मामला नहीं चलाया जा सकता, जब तक अश्लीलता, अनैतिकता या आपत्तिजनक आचरण का कोई ठोस आरोप न हो।
जस्टिस मिलिंद एन. जाधव दो आरोपियों की उस अर्जी पर सुनवाई कर रहे थे, जिसमें पिंपरी पुलिस स्टेशन में महाराष्ट्र निषेध अधिनियम की धारा 85(1) के तहत दर्ज FIR रद्द करने की मांग की गई। FIR और आरोपपत्र में आरोप है कि दोनों आरोपी शराब के नशे में सार्वजनिक सड़क पर एक-दूसरे से जोर-जोर से चिल्ला रहे थे, जिससे सार्वजनिक शांति भंग हुई और आम लोगों को परेशानी हुई।
हाईकोर्ट ने आरोपों का परीक्षण करते हुए कहा कि अभियोजन का यह मामला भी नहीं था कि दोनों आरोपियों ने किसी तीसरे व्यक्ति पर चिल्लाकर सार्वजनिक शांति भंग की या आम लोगों के लिए कोई वास्तविक व्यवधान पैदा किया। अदालत ने कहा कि आरोपों को सीधे पढ़ने पर भी संज्ञेय अपराध के आवश्यक तत्व सामने नहीं आते।
जस्टिस जाधव ने कहा कि प्रथम दृष्टया आरोपों को देखने पर कोई संज्ञेय अपराध नहीं बनता। इसलिए हाईकोर्ट का हस्तक्षेप आवश्यक है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल शराब का सेवन कर लेना धारा 85 के तहत अपराध नहीं बन जाता। किसी व्यक्ति के व्यवहार को अनुचित या अव्यवस्थित मानने के लिए मामले के तथ्यों और परिस्थितियों से ऐसा आचरण सामने आना जरूरी है।
हाईकोर्ट ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 528 के तहत अपनी शक्तियों का भी उल्लेख किया। कोर्ट ने कहा कि इस प्रावधान के तहत हाईकोर्ट उन मामलों में हस्तक्षेप कर सकता है, जहां आपराधिक कार्यवाही दुर्भावना से शुरू की गई हो या आरोपी को परेशान करने के उद्देश्य से उसका इस्तेमाल किया जा रहा हो। ऐसी स्थिति में अनावश्यक कानूनी प्रक्रिया से होने वाली प्रताड़ना को रोका जाना जरूरी है।
अदालत ने सहमति के आधार पर आपराधिक मामलों को रद्द किए जाने से जुड़े मामलों में लगने वाली लागत पर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में लागत लगाना जरूरी हो सकता है, क्योंकि इससे सार्वजनिक संसाधनों की बर्बादी होती है और अदालत का बहुमूल्य समय ऐसे मामलों में खर्च होता है। साथ ही, इससे बेवजह मुकदमेबाजी करने की प्रवृत्ति पर रोक लगाने में भी मदद मिलती है।
कोर्ट ने कहा कि अगर ऐसे मामलों को सहमति के आधार पर रद्द किया जाता है तो उसमें खर्च हुआ न्यायिक समय पूरी तरह बर्बाद हो जाता है, जबकि इसी समय का इस्तेमाल वास्तविक मुकदमों की सुनवाई में किया जा सकता था। इस तरह के मामले न्याय व्यवस्था पर बोझ बढ़ाते हैं और लंबित मामलों की संख्या को और गंभीर बनाते हैं।
इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने दोनों आरोपियों की अर्जी मंजूर कर ली और उनके खिलाफ दर्ज FIR रद्द की। हालांकि, अदालत ने दोनों आवेदकों पर कुल 10 हजार रुपये की जुर्माना भी लगाया।


