गिरफ्तारी के नियमों की समीक्षा करे महाराष्ट्र पुलिस, सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन सुनिश्चित हो: बॉम्बे हाईकोर्ट
Amir Ahmad
12 Oct 2026 12:06 PM IST

बॉम्बे हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र के पुलिस महानिदेशक (DGP) को मौजूदा गिरफ्तारी संबंधी निर्देशों और प्रपत्रों की समीक्षा करने तथा उनमें जरूरी सुधार के लिए नए निर्देश जारी करने का आदेश दिया। हाईकोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के बाध्यकारी निर्देशों का पालन सुनिश्चित किया जाना चाहिए। केवल अपराध क्रमांक और संबंधित कानूनी धाराओं का उल्लेख कर देना या यह दर्ज कर देना कि आरोपी को गिरफ्तारी के आधार बता दिए गए हैं पर्याप्त नहीं है। दस्तावेज में ऐसे तथ्य होने चाहिए जो आरोपी को कथित अपराध से जोड़ते हों।
जस्टिस हितेन एस. वेणगावकर हत्या के एक मामले में आरोपी की गिरफ्तारी और उसके बाद हिरासत की वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रहे थे। याचिकाकर्ता का कहना था कि संविधान के अनुच्छेद 22(1) और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 47 के तहत गिरफ्तारी के वास्तविक और तथ्यात्मक आधार उसे लिखित रूप में नहीं बताए गए।
याचिकाकर्ता ने दलील दी कि गिरफ्तारी के नोटिस में केवल अपराध क्रमांक, लागू कानूनी धाराओं और संज्ञेय तथा गैर-जमानती अपराध की जांच के लिए गिरफ्तारी किए जाने का उल्लेख था। इसमें घटना का विवरण, आरोपी की कथित भूमिका या उसे अपराध से जोड़ने वाले तथ्यों की जानकारी नहीं दी गई।
राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि याचिकाकर्ता ने धारा 47 के तहत दिए गए नोटिस पर हस्ताक्षर किए, उसके भाई को गिरफ्तारी की सूचना दी गई थी और गिरफ्तारी से संबंधित दस्तावेजों तथा थाने की दैनिक डायरी से कानूनी प्रक्रिया के पालन की पुष्टि होती है।
हाईकोर्ट ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 22(1) और BNSS की धारा 47 गिरफ्तारी के आधारों की जानकारी देने की अनिवार्यता तय करते हैं। आरोपी को उन मूल तथ्यों से अवगत कराना जरूरी है, जिनके आधार पर उसे गिरफ्तार किया जा रहा है। हालांकि, इसके लिए पूरी केस डायरी, प्रत्येक गवाह का बयान या अभी जुटाए जाने वाले सभी साक्ष्य बताना आवश्यक नहीं है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि गिरफ्तारी मेमो, संयुक्त नोटिस या कोई अन्य दस्तावेज भी इस कानूनी आवश्यकता को पूरा कर सकता है बशर्ते उसमें जरूरी तथ्य मौजूद हों और उसे कानून के अनुसार संबंधित व्यक्ति को निर्धारित समय पर वास्तव में उपलब्ध कराया गया हो। केवल दस्तावेज का शीर्षक या उसका नाम निर्णायक नहीं है। यह देखना जरूरी है कि क्या जानकारी दी गई किसे दी गई और कब दी गई।
सुप्रीम कोर्ट के वर्ष 2026 के फैसले मिहिर राजेश शाह बनाम महाराष्ट्र राज्य का उल्लेख करते हुए हाईकोर्ट ने दोहराया कि गिरफ्तारी के लिखित आधार ऐसी भाषा में दिए जाने चाहिए, जिसे गिरफ्तार व्यक्ति समझ सके। यदि किसी असाधारण परिस्थिति में तत्काल लिखित जानकारी देना संभव न हो, तो गिरफ्तारी के समय मौखिक रूप से आधार समझाए जा सकते हैं लेकिन इसके बाद उचित समय के भीतर लिखित जानकारी देना जरूरी है। हर स्थिति में आरोपी को रिमांड के लिए अदालत में पेश किए जाने से कम से कम दो घंटे पहले लिखित आधार उपलब्ध कराए जाने चाहिए।
मामले में हाईकोर्ट ने पाया कि गिरफ्तारी के नोटिस में पुलिस थाने अपराध क्रमांक और कानूनी धाराओं का उल्लेख तो था लेकिन गोलीबारी की घटना का कोई विवरण नहीं था। मृतक की पहचान, याचिकाकर्ता की कथित भूमिका और उसे अपराध से जोड़ने वाले तथ्यों का भी उल्लेख नहीं किया गया।
अदालत ने कहा कि हर मामले में दस्तावेज के भीतर एक जैसे विवरण दर्ज करना अनिवार्य नहीं है। लेकिन इस मामले में इन सभी जानकारियों का अभाव महत्वपूर्ण है, क्योंकि दस्तावेज से आरोपी के खिलाफ कोई स्पष्ट और समझ में आने वाला तथ्यात्मक आरोप सामने नहीं आता। दस्तावेज केवल यह बताता है कि गिरफ्तारी किस मामले में की गई, लेकिन यह नहीं समझाता कि उस मामले में आरोपी को गिरफ्तार करने का आधार क्या था।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले जसकरण जीत सिंह देओल बनाम पंजाब राज्य (2026) का भी उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार, रिहाई के बाद गिरफ्तारी के लिखित आधार उपलब्ध कराने की स्थिति में, यदि आरोपी की हिरासत फिर भी मांगी जाती है, तो संबंधित आवेदन में पहले लिखित आधार न दिए जाने का कारण और अब हिरासत की आवश्यकता स्पष्ट करनी होगी। इस आवेदन पर तत्काल वरिष्ठ अधिकारी की पुष्टि भी जरूरी है।
इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने माना कि आरोपी की गिरफ्तारी और उसके परिणामस्वरूप जारी हिरासत कानूनी रूप से दोषपूर्ण थी। अदालत ने याचिकाकर्ता को रिहा करने का आदेश दिया।
हाईकोर्ट ने रिमांड आवेदनों पर सुनवाई करने वाले मजिस्ट्रेटों और अन्य अदालतों को भी निर्देश दिया कि वे गिरफ्तारी के आधारों की वास्तविक जानकारी दिए जाने की जांच करें। इसके लिए यह देखना होगा कि आरोपी को कौन-सा दस्तावेज दिया गया, उसकी भाषा क्या थी, उसे किस तारीख और समय पर दिया गया तथा इसकी पुष्टि करने वाली सामग्री क्या है।
अदालत ने कहा कि मजिस्ट्रेट के लिए यह सुनिश्चित करना अनिवार्य है कि दी गई जानकारी में आरोपी से संबंधित तथ्यात्मक आधार हों और वह हिरासत की मांग पर सार्थक जवाब दे सके। आरोपी के हस्ताक्षर या दस्तावेज में छपी हुई औपचारिक घोषणा प्रासंगिक हो सकती है, लेकिन इनके आधार पर अपने आप यह नहीं माना जा सकता कि कानूनी प्रक्रिया का पालन हो गया। दस्तावेज की वास्तविक सामग्री की जांच जरूरी है।
हाईकोर्ट ने रजिस्ट्रार (न्यायिक) को निर्देश दिया कि फैसले की प्रति महाराष्ट्र के पुलिस महानिदेशक और सभी प्रिंसिपल जिला एवं सेशंस जज को भेजी जाए, ताकि संबंधित अधिकारियों और अदालतों तक सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन सुनिश्चित करने के लिए जरूरी जानकारी पहुंचाई जा सके।

