घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत मेंटेनेंस में बदलाव की अर्जी पर सुनवाई का अधिकार फैमिली कोर्ट को नहीं: बॉम्बे हाईकोर्ट
Amir Ahmad
4 Nov 2026 12:59 PM IST

बॉम्बे हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि फैमिली कोर्ट घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 की धारा 25(2) के तहत दायर उस आवेदन पर फैसला नहीं कर सकती, जिसमें मजिस्ट्रेट द्वारा पहले दिए गए मेंटेनेंस और किराए के आदेश में बदलाव की मांग की गई हो।
कोर्ट ने कहा कि अधिनियम की धारा 26 के तहत सिविल और फैमिली कोर्ट को धारा 18 से 22 के अंतर्गत राहत देने का अधिकार जरूर मिलता है, लेकिन इससे उन्हें धारा 25(2) के तहत संशोधन आवेदन पर सुनवाई का अधिकार नहीं मिल जाता।
जस्टिस गौरी गोडसे पत्नी की ओर से सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 की धारा 24 के तहत दायर आवेदन पर सुनवाई कर रही थीं। पत्नी ने अपने पति की ओर से घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 25(2) के तहत अंधेरी स्थित मजिस्ट्रेट कोर्ट में दायर आवेदन को फैमिली कोर्ट में स्थानांतरित करने की मांग की थी।
पत्नी ने घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत कार्यवाही शुरू की थी, जिसमें उसे और उसकी बेटी को मेंटेनेंस देने का आदेश दिया गया। बाद में सेशन कोर्ट ने मेंटेनेंस की राशि बढ़ा दी।
इसके बाद पति ने परिस्थितियों में बदलाव का हवाला देते हुए मजिस्ट्रेट के समक्ष धारा 25(2) के तहत आवेदन दायर किया और मेंटेनेंस तथा किराए की राशि में संशोधन की मांग की।
पत्नी ने इस आवेदन को फैमिली कोर्ट में स्थानांतरित करने की मांग की, जहां तलाक की कार्यवाही, वैवाहिक अधिकारों की बहाली से संबंधित याचिका और मेंटेनेंस के लिए उसका जवाबी दावा लंबित था।
पत्नी की दलील थी कि दोनों अदालतों में चल रही कार्यवाही के साक्ष्य एक-दूसरे से जुड़े होंगे। हाईकोर्ट द्वारा तय समय-सीमा के भीतर दोनों अदालतों में पेश होना उसके लिए काफी मुश्किल होगा। उसने यह भी तर्क दिया कि घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 26 फैमिली कोर्ट को इस अधिनियम के तहत राहत देने का अधिकार देती है, इसलिए संशोधन आवेदन भी वहां स्थानांतरित किया जा सकता है।
हाईकोर्ट ने पहले असुविधा के आधार पर कार्यवाही स्थानांतरित करने की मांग पर विचार किया। कोर्ट ने पाया कि दोनों अदालतें पत्नी के निवास स्थान से अधिक दूर नहीं हैं। दोनों मामलों के लिए समय-सीमा संबंधी निर्देश पक्षकारों को सुनने के बाद ही दिए गए।
कोर्ट ने यह भी कहा कि फैमिली कोर्ट में लंबित कार्यवाही और मजिस्ट्रेट के समक्ष मेंटेनेंस में बदलाव की अर्जी में अलग-अलग पहलुओं पर विचार किया जाना है। इसलिए केवल असुविधा के आधार पर मामला स्थानांतरित करना उचित नहीं होगा।
अधिकार क्षेत्र के सवाल पर कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 24 के तहत किसी मामले को केवल ऐसी अदालत में स्थानांतरित किया जा सकता है, जिसके पास उस मामले की सुनवाई करने या उसका निपटारा करने का अधिकार हो।
इसके बाद कोर्ट ने फैमिली कोर्ट अधिनियम, 1984 की धारा 7 और 8 पर विचार किया। कोर्ट ने कहा कि विधायिका ने इन प्रावधानों में संशोधन करके फैमिली कोर्ट को घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत मजिस्ट्रेट को प्राप्त विशेष अधिकार नहीं दिए।
हाईकोर्ट ने कहा कि घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 26 एक सक्षमकारी और पूरक प्रावधान है। इसके तहत पीड़ित पक्ष या प्रतिवादी सिविल अथवा फैमिली कोर्ट में लंबित कार्यवाही के दौरान धारा 18 से 22 के तहत राहत मांग सकता है। हालांकि, इस प्रावधान का अर्थ यह नहीं है कि धारा 25 के तहत आवेदन पर सुनवाई करने के लिए फैमिली कोर्ट को घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 2(आई) के तहत मजिस्ट्रेट का अधिकार मिल जाता है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 26 की व्याख्या इस तरह नहीं की जा सकती कि फैमिली कोर्ट को धारा 25 के तहत आवेदन पर सुनवाई और फैसला करने वाला सक्षम मजिस्ट्रेट मान लिया जाए।
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि जब घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 25 के तहत आवेदन पर फैसला करने का अधिकार फैमिली कोर्ट को विशेष रूप से नहीं दिया गया, तो सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 24 के तहत मामले को वहां स्थानांतरित करने की शक्ति का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने पत्नी की ट्रांसफर अर्जी खारिज की।

