बॉम्बे हाईकोर्ट का अहम फैसला: रजिस्टर्ड नहीं होने पर भी पार्टनरशिप फर्म को मिल सकता है किरायेदारी का वैधानिक अधिकार

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    बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा कि ऐसी अनरजिस्टर्ड पार्टनरशिप फर्म, जो 1 फरवरी 1973 को किसी परिसर में लाइसेंसी के तौर पर कब्जे में थी, बॉम्बे रेंट कंट्रोल एक्ट, 1947 की धारा 15-ए के तहत मिलने वाले किरायेदारी के वैधानिक संरक्षण का लाभ उठा सकती है।

    कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 15-ए के तहत मिलने वाला अधिकार संविदात्मक नहीं, बल्कि वैधानिक अधिकार है। इसलिए इंडियन पार्टनरशिप एक्ट, 1932 की धारा 69(2) में अनरजिस्टर्ड फर्म पर लगाई गई रोक इस वैधानिक अधिकार को लागू कराने के रास्ते में बाधा नहीं बनती।

    जस्टिस अरुण आर. पेडनेकर ऑल इंडिया ट्रैवल सर्विसेज की ओर से दाखिल सिविल रिवीजन एप्लीकेशन पर सुनवाई कर रहे थे। फर्म ने संबंधित परिसर में किरायेदारी घोषित करने और वहां उसके कब्जे में हस्तक्षेप पर रोक लगाने की मांग को लेकर मुकदमा दायर किया। निचली अदालत और अपीलीय अदालत ने फर्म का दावा खारिज किया।

    मामले के अनुसार ऑल इंडिया ट्रैवल सर्विसेज ने 30 मई 1966 को संबंधित परिसर के लिए लीव एंड लाइसेंस एग्रीमेंट किया था। उस समय फर्म रजिस्टर्ड नहीं थी। फर्म लगातार परिसर पर कब्जे में रही और बाद में 3 अक्टूबर 1973 को पार्टनरशिप फर्म के तौर पर रजिस्टर्ड हुई।

    निचली अदालत और अपीलीय अदालत ने यह माना कि हालांकि याचिकाकर्ता 1966 से लीव एंड लाइसेंस एग्रीमेंट के तहत परिसर के कब्जे में था लेकिन वह किरायेदारी घोषित कराने का हकदार नहीं है, क्योंकि संबंधित अधिसूचित तारीख 1 फरवरी 1973 को फर्म रजिस्टर्ड नहीं थी।

    इसी निष्कर्ष को बॉम्बे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने इंडियन पार्टनरशिप एक्ट की धारा 69(2) और बॉम्बे रेंट कंट्रोल एक्ट की धारा 15-ए के बीच कानूनी अंतर पर विचार किया।

    कोर्ट ने कहा कि पार्टनरशिप एक्ट की धारा 69(2) अनरजिस्टर्ड फर्म को किसी तीसरे पक्ष के खिलाफ ऐसे अधिकार को लागू करने के लिए मुकदमा दायर करने से रोकती है, जो किसी अनुबंध से पैदा हुआ हो। यानी यह रोक संविदा से उत्पन्न अधिकारों को लागू कराने से संबंधित है।

    इसके विपरीत बॉम्बे रेंट कंट्रोल एक्ट की धारा 15-ए उन लोगों को वैधानिक संरक्षण देती है, जो 1 फरवरी 1973 को संबंधित परिसर में लाइसेंसी के तौर पर कब्जे में थे। इस प्रावधान के तहत ऐसे व्यक्ति को मकान मालिक का किरायेदार माना जाता है।

    जस्टिस अरुण आर. पेडनेकर ने कहा कि धारा 15-ए के तहत मिलने वाला अधिकार महज संविदात्मक अधिकार नहीं है, जिसे पार्टनरशिप फर्म किसी अनुबंध के आधार पर लागू कराने की कोशिश कर रही हो। यह कानून से मिला वैधानिक अधिकार है।

    कोर्ट ने कहा कि पार्टनरशिप एक्ट या बॉम्बे रेंट कंट्रोल एक्ट में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जो अनरजिस्टर्ड पार्टनरशिप फर्म को धारा 15-ए के तहत उपलब्ध वैधानिक अधिकार का लाभार्थी बनने से रोकता हो।

    हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि मामले में फर्म जिस अधिकार को लागू कराने की मांग कर रही है, वह पार्टनरशिप एग्रीमेंट या किसी अन्य अनुबंध से पैदा हुआ अधिकार नहीं है, बल्कि बॉम्बे रेंट एक्ट की धारा 15-ए के तहत मिला वैधानिक अधिकार है। इसलिए पार्टनरशिप एक्ट की धारा 69(2) की रोक इस मामले में लागू नहीं होती।

    कोर्ट ने कहा कि 1 फरवरी 1973 को फर्म अनरजिस्टर्ड होने के बावजूद यदि वह उस तारीख को परिसर में लाइसेंसी के तौर पर कब्जे में थी तो वह धारा 15-ए के तहत मिलने वाले वैधानिक संरक्षण का लाभ ले सकती है।

    इसी आधार पर हाईकोर्ट ने निचली अदालत और अपीलीय अदालत के उस निष्कर्ष को गलत ठहराया, जिसमें कहा गया कि पार्टनरशिप एक्ट की धारा 69(2) के कारण फर्म बॉम्बे रेंट कंट्रोल एक्ट की धारा 15-ए का लाभ नहीं उठा सकती।

    हाईकोर्ट ने दोनों निचली अदालतों द्वारा पारित फैसलों और आदेशों को रद्द किया। कोर्ट ने यह भी कहा कि पार्टनरशिप फर्म 1 फरवरी 1973 को अनरजिस्टर्ड होने के बावजूद बॉम्बे रेंट कंट्रोल एक्ट की धारा 15-ए के तहत उपलब्ध वैधानिक संरक्षण की हकदार है।

    मामले में प्रतिवादी की ओर से हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाने की मांग भी की गई। कोर्ट ने इस मांग को अस्वीकार कर दिया। कोर्ट ने इसके पीछे यह तथ्य भी ध्यान में रखा कि आवेदक यानी किरायेदार पहले से ही संबंधित संपत्ति के कब्जे में है।

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