नाबालिग पीड़िता की पीड़ा से आंख नहीं मूंद सकता कोर्ट: बॉम्बे हाइकोर्ट ने 83 वर्षीय बलात्कार दोषी की सज़ा घटाने से इनकार किया

Amir Ahmad

7 Feb 2026 4:57 PM IST

  • नाबालिग पीड़िता की पीड़ा से आंख नहीं मूंद सकता कोर्ट: बॉम्बे हाइकोर्ट ने 83 वर्षीय बलात्कार दोषी की सज़ा घटाने से इनकार किया

    बॉम्बे हाइकोर्ट (गोवा बेंच) ने एक अहम फैसले में 83 वर्षीय व्यक्ति की सज़ा कम करने से इनकार करते हुए स्पष्ट कहा कि ऐसे जघन्य अपराधों में आरोपी की उम्र को सहानुभूति का आधार नहीं बनाया जा सकता। हाइकोर्ट ने कहा कि अदालत पीड़िता की उम्र और उसके साथ हुए अत्याचार की अनदेखी करते हुए नेल्सन की आंख नहीं फेर सकती।

    जस्टिस श्रीराम वी. शिरसाट की एकल पीठ ने 63 पन्नों के विस्तृत आदेश में 2012 के मामले में 9 वर्षीय बच्ची के यौन शोषण के दोषी मार्टिन सोआरेस की 10 साल की कठोर कारावास की सज़ा को बरकरार रखा। कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट द्वारा की गई दोषसिद्धि पूरी तरह ठोस, विश्वसनीय और संदेह से परे साक्ष्यों पर आधारित है।

    मामले की पृष्ठभूमि

    अभियोजन के अनुसार अप्रैल, 2012 में पीड़िता आरोपी के घर गई, जो उसका पड़ोसी था ताकि उसकी बेटी से मिल सके। बच्ची की गवाही के अनुसार आरोपी उसे घर के पिछले दरवाज़े से जबरन बाथरूम में ले गया, जहां उसने उसके कपड़े उतार दिए। इसके बाद आरोपी ने उसके निजी अंग में उंगली डाली, उसके होंठों और निजी अंग को चूमा।

    इस मामले में चिल्ड्रन कोर्ट ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धाराओं 341, 354, 375(b), 376(2)(i) तथा गोवा चिल्ड्रन एक्ट 2003 के तहत दोषी ठहराते हुए 10 साल की सज़ा सुनाई थी।

    बचाव पक्ष की दलीलें और सरकारी पक्ष का जवाब

    हाइकोर्ट में आरोपी की ओर से यह तर्क दिया गया कि उसे झूठा फंसाया गया और मेडिकल जांच में निजी अंगों पर कोई चोट नहीं पाई गई, जिससे यौन शोषण की पुष्टि नहीं होती। इसके अलावा FIR दर्ज करने में देरी और आरोपी की बेटी की गवाही न होने को भी अभियोजन के लिए घातक बताया गया।

    वहीं अतिरिक्त लोक अभियोजक ने दलील दी कि पीड़िता की गवाही अपने आप में विश्वसनीय और पर्याप्त है। उन्होंने यह भी कहा कि आरोपी की उम्र को सज़ा कम करने का आधार नहीं बनाया जा सकता।

    हाइकोर्ट की टिप्पणी

    जस्टिस शिरसाट ने कहा कि पीड़िता की गवाही स्वाभाविक स्पष्ट और भरोसेमंद है तथा इसमें किसी तरह की सिखावट के संकेत नहीं मिलते। कोर्ट ने यह भी माना कि निजी अंगों पर चोट न मिलने का तर्क महत्वपूर्ण नहीं है क्योंकि डॉक्टर ने गवाही दी थी कि समय बीतने के कारण चोट भर चुकी हो सकती है।

    FIR में देरी के मुद्दे पर कोर्ट ने कहा,

    “यौन उत्पीड़न के मामलों में FIR में देरी को अन्य अपराधों की तरह नहीं देखा जा सकता। ऐसे मामलों में पीड़िता और उसके परिवार को कई सामाजिक और मानसिक दबावों से गुजरना पड़ता है।”

    आरोपी की बेटी की गवाही न होने पर कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले तखाजी हिराजी बनाम ठाकोर कुबेरसिंह का हवाला देते हुए कहा कि जब पर्याप्त साक्ष्य पहले से मौजूद हों तब अतिरिक्त गवाहों की गैर-मौजूदगी से मामला कमजोर नहीं होता।

    सज़ा में राहत से इनकार

    आरोपी की उम्र, आपराधिक इतिहास न होने और ट्रायल के दौरान जमानत पर रहने के बावजूद हाइकोर्ट ने सज़ा में किसी भी तरह की नरमी से इनकार कर दिया।

    कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा,

    “यह कोर्ट आरोपी की 83 वर्ष की उम्र को ऐसे अपराध में सज़ा घटाने का आधार नहीं मान सकता, क्योंकि कोर्ट पीड़िता की उम्र और उसके साथ हुई पीड़ा की अनदेखी नहीं कर सकता।”

    इस संदर्भ में, कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले सुमेर सिंह बनाम सूरजभान सिंह (2014) का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि उचित सज़ा नहीं दी जाती तो सज़ा निर्धारण की मूल भावना ही समाप्त हो जाती है और दया का इंद्रधनुष न्याय पर हावी नहीं हो सकता।

    अंततः हाइकोर्ट ने अपील खारिज करते हुए 10 साल की सज़ा बरकरार रखी और फैसले पर रोक लगाने की आरोपी की मांग भी ठुकरा दी। आरोपी मार्टिन सोआरेस को तुरंत आत्मसमर्पण कर सज़ा काटने का आदेश दिया गया।

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