पोस्ट में PM Modi का नाम तक नहीं, पुलिस राजनीतिक अभिव्यक्ति को अपराध बना रही है: संग्राम पाटिल की बॉम्बे हाइकोर्ट में दलील

Amir Ahmad

10 Feb 2026 1:33 PM IST

  • पोस्ट में PM Modi का नाम तक नहीं, पुलिस राजनीतिक अभिव्यक्ति को अपराध बना रही है: संग्राम पाटिल की बॉम्बे हाइकोर्ट में दलील

    यूट्यूबर और यूके में रह रहे डॉक्टर संग्राम पाटिल के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले में बॉम्बे हाइकोर्ट में अहम मोड़ आया है।

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ कथित आपत्तिजनक और मानहानिकारक पोस्ट के आरोपों पर पाटिल ने साफ शब्दों में कहा कि उनके किसी भी पोस्ट में न तो प्रधानमंत्री का नाम है और न ही उनका कोई प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संदर्भ।

    पाटिल का आरोप है कि मुंबई पुलिस राजनीतिक अभिव्यक्ति को जबरन अपराध का रूप दे रही है।

    डॉ. संग्राम पाटिल ने जस्टिस अश्विन भोंबे की एकल पीठ के समक्ष FIR और उनके खिलाफ जारी लुकआउट सर्कुलर रद्द करने की मांग करते हुए याचिका दायर की। साथ ही उन्होंने यूके वापस लौटने की अनुमति भी मांगी।

    पाटिल के खिलाफ 18 दिसंबर, 2025 को बीजेपी मीडिया सेल प्रमुख निखिल भामरे की शिकायत पर FIR दर्ज की गई थी। यह FIR उनके फेसबुक पोस्ट को लेकर दर्ज हुई, जिन्हें अश्लील और मानहानिकारक बताया गया।

    पाटिल को इस FIR की जानकारी तब हुई जब इमिग्रेशन अधिकारियों ने लुकआउट सर्कुलर का हवाला देते हुए उन्हें यूके लौटने से रोक दिया।

    मुंबई पुलिस ने पहले हाइकोर्ट में दाखिल हलफनामे में दावा किया कि पाटिल के खिलाफ कार्रवाई मनमानी नहीं है बल्कि भारत की छवि, प्रधानमंत्री की गरिमा और राष्ट्रीय अखंडता की रक्षा के लिए जरूरी है। इसके जवाब में पाटिल ने अपने वकील भूषण यादव के जरिए प्रत्युत्तर दाखिल किया।

    अपने प्रत्युत्तर में पाटिल ने कहा,

    “मैं स्पष्ट रूप से इनकार करता हूं कि मेरी पोस्ट में भारत के प्रधानमंत्री का नाम लिया गया हो या ऐसा कोई संकेत हो जो केवल प्रधानमंत्री से ही जोड़ा जा सके। पुलिस पोस्ट के शब्दों में अपनी ओर से अर्थ निकाल रही है। आपराधिक मुकदमा किसी की निजी राजनीतिक व्याख्या या भावनाओं पर आधारित नहीं हो सकता।”

    उन्होंने आरोप लगाया कि यह पूरी कार्रवाई राजनीतिक असहमति को दबाने अवैध लुकआउट सर्कुलर को बाद में सही ठहराने और असहमति की आवाज को डराने का प्रयास है।

    पाटिल ने यह भी कहा कि पुलिस अब पहली बार अश्लीलता, राष्ट्रीय सुरक्षा, संप्रभुता, सार्वजनिक व्यवस्था और साजिश जैसे आरोप जोड़ने की कोशिश कर रही है, जबकि ये बातें FIR का हिस्सा ही नहीं हैं। उन्होंने कहा कि कानून के अनुसार FIR की कमियों को बाद में हलफनामों के जरिए नहीं भरा जा सकता।

    मुंबई पुलिस द्वारा लगाए गए दुश्मनी फैलाने, सार्वजनिक शांति भंग करने और झूठी व भड़काऊ जानकारी फैलाने के आरोपों को पाटिल ने पूरी तरह निराधार बताया।

    उनका कहना है कि राजनीतिक आलोचना चाहे कितनी भी तीखी क्यों न हो अपने आप में अपराध नहीं है। उन्होंने दलील दी कि किसी समुदायों के बीच दुश्मनी फैलाने के अपराध के लिए कम से कम दो स्पष्ट और पहचान योग्य समूहों का होना जरूरी है, जो इस मामले में कहीं नहीं दिखता।

    पाटिल ने स्वीकार किया कि पोस्ट उन्हीं के द्वारा किया गया था और इसके समर्थन में उन्होंने दस्तावेजी और मौखिक साक्ष्य भी दिए। इसके बावजूद पुलिस द्वारा उनके इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की मांग पर उन्होंने सवाल उठाया और इसे फिशिंग जांच बताया।

    पुलिस के इस तर्क पर कि विदेशी नागरिक होने के नाते पाटिल को भारत में किसी स्थानीय नेटवर्क या सहयोग से मदद मिली हो सकती है पाटिल ने सख्त इनकार किया।

    उन्होंने कहा कि न तो वे किसी साजिश का हिस्सा हैं और न ही किसी से फंड लेते या देते हैं। उनके अनुसार पुलिस जांच के दायरे को अनुचित रूप से बढ़ा रही है।

    पाटिल ने यह भी खारिज किया कि FIR की जानकारी मिलने के बाद उन्होंने कोई आपत्तिजनक पोस्ट किया। उन्होंने कहा कि पुलिस जिन पोस्ट का हवाला दे रही है, वह महज एक समाचार साझा करने और उस पर सामान्य टिप्पणी से जुड़ा था, जो FIR की जानकारी से पहले किया गया।

    उन्होंने यह भी कहा कि FIR में कथित पोस्ट को शब्दशः नहीं बताया गया, न यह स्पष्ट किया गया कि कौन-सा वाक्य अपराध बनता है और किस आधार पर संबंधित कानूनी धाराएं लगाई गई हैं। उनके अनुसार, अश्लील या अपमानजनक जैसे शब्दों के सहारे बिना ठोस सामग्री के किसी को अपराधी नहीं ठहराया जा सकता।

    इस मामले में अगली सुनवाई 17 फरवरी को होने की संभावना है।

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