महज अवैध गिरफ्तारी का आरोप पुलिस पर अवमानना की कार्रवाई का आधार नहीं: बॉम्बे हाईकोर्ट
Amir Ahmad
29 July 2026 12:29 PM IST

बॉम्बे हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल यह आरोप लगा देने से कि किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी अरनेश कुमार बनाम बिहार राज्य, जोगिंदर कुमार बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य मामलों में सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी दिशा-निर्देशों के उल्लंघन में हुई है पुलिस अधिकारियों के खिलाफ अदालत की अवमानना की कार्रवाई शुरू नहीं की जा सकती।
जस्टिस सुमन श्याम और जस्टिस अद्वैत सेठना की खंडपीठ ने सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (IT Act) के एक मामले में मुंबई पुलिस के अधिकारियों के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही शुरू करने से इनकार करते हुए याचिका खारिज की।
याचिकाकर्ता बिनोद अग्रवाल ने अक्टूबर 2018 में हुई अपनी गिरफ्तारी को चुनौती देते हुए कहा था कि मुंबई पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का उल्लंघन किया। उन्होंने दावा किया कि आरोपपत्र दाखिल होने तक उन्हें 65 दिनों से अधिक समय तक हिरासत में रखा गया।
अदालत ने कहा कि बिनोद अग्रवाल को IT Act की धारा 43 और धारा 66सी के तहत दर्ज मामले में गिरफ्तार किया गया। दोनों पक्षों की ओर से एक-दूसरे के खिलाफ शिकायतें भी दर्ज थीं। बाद में जून 2019 में आपसी समझौते के बाद हाईकोर्ट ने दोनों FIR रद्द की थीं।
इसके बावजूद बिनोद अग्रवाल ने मुंबई के सांताक्रूज थाने के पुलिस अधिकारियों के खिलाफ यह कहते हुए अवमानना की कार्रवाई की मांग की कि उनकी गिरफ्तारी सुप्रीम कोर्ट के अरनेश कुमार फैसले में निर्धारित दिशा-निर्देशों का खुला उल्लंघन थी।
हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में ऐसा कोई न्यायिक निष्कर्ष दर्ज नहीं है, जिससे अदालत की अवमानना अधिनियम की धारा 14 या धारा 15 के तहत कार्रवाई शुरू करने की आवश्यक शर्तें पूरी होती हों।
अदालत ने कहा,
"हमें गंभीर संदेह है कि इस मामले में आपराधिक अवमानना के आवश्यक तत्व किसी भी रूप में मौजूद हैं। इसलिए उपलब्ध तथ्यों के आधार पर प्रतिवादियों के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही शुरू करने का यह उपयुक्त मामला नहीं है।"
खंडपीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि दीवानी अवमानना और आपराधिक अवमानना दोनों अलग-अलग कानूनी अवधारणाएं हैं। इन्हें एक-दूसरे का पर्याय मानकर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
अदालत ने कहा,
"केवल गिरफ्तारी को अवैध बताने वाले आरोपों के आधार पर दीवानी या आपराधिक अवमानना का मामला नहीं बनता, जब तक कि ऐसी कार्रवाई शुरू करने के लिए आवश्यक कानूनी मानदंड अदालत की संतुष्टि के अनुसार स्थापित न हो जाएं। यही अवमानना की कार्यवाही का मूल आधार है, जो इस मामले में मौजूद नहीं है।"
इन टिप्पणियों के साथ बॉम्बे हाईकोर्ट ने बिनोद अग्रवाल की याचिका खारिज की।


