चांद तक पहुंच गए लेकिन जाति व्यवस्था अब भी कायम: मैनुअल स्कैवेंजिंग पर बॉम्बे हाईकोर्ट सख्त, महाराष्ट्र की भेदभावपूर्ण नीति रद्द
Amir Ahmad
4 Sept 2026 11:05 AM IST

बॉम्बे हाईकोर्ट ने मैनुअल स्कैवेंजिंग की प्रथा जारी रहने पर महाराष्ट्र सरकार को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा कि 21वीं सदी में भारत चांद के दूसरे छोर तक पहुंचने का गौरव हासिल कर रहा है, लेकिन जाति व्यवस्था जैसी सामाजिक बुराई अब भी समाज में मौजूद है। हाईकोर्ट ने कहा कि यही व्यवस्था आज भी कुछ लोगों को मानव गरिमा से नीचे का काम करने के लिए मजबूर करती है।
जस्टिस भारती डांगरे और जस्टिस मंजूषा देशपांडे की खंडपीठ ने मैनुअल स्कैवेंजिंग से जुड़े मामलों की सुनवाई करते हुए महाराष्ट्र सरकार की 2019 और 2025 की सरकारी संकल्पों में शामिल उस प्रावधान को रद्द किया, जिसके तहत निजी संस्थाओं, सोसायटियों और ठेकेदारों द्वारा नियुक्त सफाईकर्मियों की मौत होने पर मुआवजे की जिम्मेदारी उन निजी संस्थाओं पर डाली गई।
कोर्ट ने कहा कि इस प्रावधान के कारण निजी क्षेत्र में काम करने वाले सफाईकर्मियों और राज्य या स्थानीय निकायों के लिए काम करने वाले सफाईकर्मियों के बीच भेदभाव होता है। यह संविधान के अनुच्छेद 14 में दिए गए समानता के मौलिक अधिकार के खिलाफ है।
खंडपीठ ने कहा,
“21वीं सदी में हम चांद के दूसरे छोर तक पहुंचने का गौरव करते हैं लेकिन हमारे सामने यह कड़वी हकीकत है कि जाति व्यवस्था की सामाजिक बुराई आज भी हमारे देश में कायम है।”
कोर्ट ने कहा कि संविधान सभी नागरिकों को कानून के समक्ष समानता और कानून का समान संरक्षण देता है, लेकिन संविधान अपनाने के 75 साल बाद भी देश उस सामाजिक बुराई से पूरी तरह मुक्त नहीं हो पाया, जिसने सदियों से समाज को प्रभावित किया।
अदालत ने कहा कि मैनुअल स्कैवेंजिंग ऐसी ही एक प्रथा है, जिसमें एक खास समुदाय के लोगों को पीढ़ियों से अमानवीय काम करने के लिए मजबूर किया जाता रहा है, जबकि सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों और कानूनों के जरिए इस प्रथा पर रोक लगाई जा चुकी है।
मामले में श्रमिक जनता संघ और दो अन्य लोगों की ओर से सीनियर एडवोकेट गायत्री सिंह ने दलीलें रखीं। उन्होंने कोर्ट को बताया कि सीवर या सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान जहरीली गैसों की चपेट में आकर सफाईकर्मियों की मौत होने पर उनके परिवारों को मुआवजे के लिए दर-दर भटकना पड़ता है।
उन्होंने बताया कि कई मामलों में स्थानीय प्रशासन या राज्य की अन्य संस्थाओं ने सरकारी संकल्प का हवाला देते हुए सहायता देने से इनकार किया और कहा कि मुआवजे का भुगतान संबंधित सोसायटी या ठेकेदार की जिम्मेदारी है।
सीनियर एडवोकेट ने यह भी बताया कि केंद्र सरकार की मानक संचालन प्रक्रिया में इस तरह के काम के लिए पंजीकृत एजेंसियों, ठेकेदारों और नियोक्ताओं के लिए पात्रता, जिम्मेदारियां और सुरक्षा उपाय निर्धारित हैं। इसमें मशीनों के इस्तेमाल, सुरक्षात्मक उपकरण, सुरक्षा साधनों, सावधानियों और आपात स्थिति से निपटने के उपायों का विस्तृत उल्लेख है।
हालांकि, कोर्ट ने पाया कि राज्य के अधिकारी इन मानकों और मैनुअल स्कैवेंजिंग तथा सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई से जुड़े अन्य कानूनों को प्रभावी ढंग से लागू करने में विफल रहे हैं।
महाराष्ट्र सरकार ने अपने हलफनामे में बताया कि हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के बाद मैनुअल स्कैवेंजिंग के दौरान हुई 81 मौतों की पहचान की गई और प्रत्येक मृतक के परिवार को 10 लाख रुपये का मुआवजा दिया गया। इस मद में राज्य सरकार ने कुल 8.10 करोड़ रुपये खर्च किए।
कोर्ट ने कहा कि मैनुअल स्कैवेंजिंग देश में लंबे समय से चली आ रही प्रथा है। इसे खत्म करने के उद्देश्य से केंद्र सरकार ने 1993 में सफाई कर्मचारियों के लिए विशेष आयोग का गठन किया। उसी वर्ष संसद ने मैनुअल स्कैवेंजर्स के रोजगार और सूखी शौचालय व्यवस्था पर रोक लगाने वाला कानून भी बनाया।
अदालत ने कहा कि बाद में 2013 का कानून लागू किया गया, जिसमें मैनुअल स्कैवेंजर्स को रोजगार देने पर रोक लगाने के साथ उनके आश्रितों के पुनर्वास का प्रावधान किया गया। इसके बावजूद राज्य सरकार और स्थानीय निकाय इस कानून तथा उससे जुड़े नियमों को उनकी वास्तविक भावना के अनुरूप लागू करने में विफल रहे हैं।
हाईकोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार के हलफनामे में दर्ज मौतों के आंकड़े खुद बताते हैं कि मैनुअल स्कैवेंजिंग की सामाजिक बुराई को पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सका। अदालत ने यह भी कहा कि इस संबंध में जारी कानूनों और सरकारी संकल्पों का क्रियान्वयन बेहद कमजोर रहा है।
महाराष्ट्र सरकार के 12 दिसंबर 2019 के सरकारी संकल्प और 30 अप्रैल 2025 के संशोधित संकल्प में निजी स्थानों पर होने वाले ऐसे कामों के लिए राज्य और स्थानीय निकायों को मुआवजा देने की जिम्मेदारी से बाहर रखा गया।
कोर्ट ने इस प्रावधान पर सवाल उठाते हुए कहा कि निजी सोसायटियों और ठेकेदारों द्वारा अक्सर बिना स्थानीय निकायों की अनुमति के, बिना प्रशिक्षण प्राप्त कर्मचारियों और बिना सुरक्षा उपकरणों के सीवर सफाई का काम कराया जाता है। ऐसी स्थिति में नगरपालिकाएं और नगर निगम अपनी जिम्मेदारी से पीछे नहीं हट सकते।
अदालत ने कहा कि राज्य सरकार की ऐसी नीति निजी क्षेत्र में काम करने वाले सफाईकर्मियों को सरकारी या अर्ध-सरकारी संस्थानों में काम करने वाले कर्मचारियों से अलग करती है, जबकि दोनों एक ही तरह का काम करते हैं।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 2013 का कानून नियोक्ता के आधार पर खतरनाक सफाई का काम करने वाले कर्मचारियों के बीच कोई भेदभाव नहीं करता। इसका उद्देश्य मैनुअल स्कैवेंजिंग जैसी अमानवीय प्रथा को पूरी तरह खत्म करना है और सम्मान के साथ जीवन जीने के अधिकार की रक्षा करना है।
हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि खतरनाक सफाई के दौरान किसी सफाईकर्मी की मौत होने पर उसके आश्रितों को तत्काल मुआवजा दिया जाए। बाद में राज्य संबंधित कार्यालय, प्रतिष्ठान या निजी व्यक्ति से यह राशि वसूल सकता है, जिसके लिए मृतक काम कर रहा था।
कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को छह महीने के भीतर खतरनाक सफाई के दौरान जान गंवाने वाले सभी लोगों की पहचान करने का भी निर्देश दिया। प्रत्येक ऐसे मृतक के आश्रितों को 30 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया गया।
इसके साथ ही राज्य सरकार और स्थानीय निकायों को मृत सफाईकर्मियों तथा मैनुअल स्कैवेंजर्स के आश्रितों के पुनर्वास के लिए आवश्यक कदम उठाने का निर्देश दिया गया। कोर्ट ने साफ किया कि पुनर्वास में सफाईकर्मी और मैनुअल स्कैवेंजर के बीच किसी तरह का भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए।
इन निर्देशों और टिप्पणियों के साथ बॉम्बे हाईकोर्ट ने याचिकाओं का निपटारा किया।


