संशोधित हिंदू उत्तराधिकार कानून के तहत बेटी को बराबरी का हक: आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने बदली प्रारंभिक डिक्री

Amir Ahmad

8 May 2026 12:14 PM IST

  • संशोधित हिंदू उत्तराधिकार कानून के तहत बेटी को बराबरी का हक: आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने बदली प्रारंभिक डिक्री

    आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि संशोधित हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 6 के तहत बेटी को पैतृक संपत्ति में बेटे के बराबर अधिकार प्राप्त है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि विभाजन वाद में अंतिम डिक्री की कार्यवाही लंबित है और संपत्ति का वास्तविक बंटवारा नहीं हुआ है, तो प्रारंभिक डिक्री में संशोधन किया जा सकता है।

    जस्टिस रवि नाथ तिलहरी और जस्टिस बालाजी मेडामल्ली की खंडपीठ ने कहा कि वर्ष 2005 में संशोधित धारा 6 के अनुसार बेटी भी सहभाजक संपत्ति में बेटे के समान अधिकार रखती है।

    मामले में प्रतिवादियों ने दलील दी थी कि चूंकि पिता की मृत्यु वर्ष 1956 से पहले हो गई, इसलिए संशोधित धारा 6 लागू नहीं होगी। हालांकि हाइकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया।

    अदालत ने विनीता शर्मा बनाम राकेश शर्मा फैसला का हवाला देते हुए कहा कि बेटी को सहभाजक संपत्ति में बेटे के बराबर हिस्सा मिलेगा और पिता की मृत्यु की तारीख इस अधिकार को प्रभावित नहीं करती। कोर्ट ने कहा कि जरूरी यह है कि बेटी 9 सितंबर 2005 को जीवित हो, जो इस मामले में थी।

    खंडपीठ ने कहा कि विभाजन के मुकदमों में एक से अधिक प्रारंभिक डिक्री पारित करने पर कोई कानूनी रोक नहीं है। यदि प्रारंभिक डिक्री के बाद कानून या परिस्थितियों में बदलाव आता है, जिससे पक्षकारों के हिस्से प्रभावित होते हैं तो अंतिम डिक्री से पहले अदालत हिस्सों में संशोधन कर सकती है।

    अदालत ने कहा कि संपत्ति का विभाजन तब तक पूरा नहीं माना जाता, जब तक अंतिम डिक्री पारित होकर संपत्ति का वास्तविक सीमांकन और बंटवारा न हो जाए। इसलिए अंतिम डिक्री की कार्यवाही लंबित रहने तक अदालत पक्षकारों के अधिकारों का पुनर्निर्धारण कर सकती है।

    मामला वर्ष 1988 में दायर विभाजन वाद से जुड़ा था, जिसमें विधवा और बेटी ने पैतृक संपत्ति में हिस्सेदारी की मांग की थी। ट्रायल कोर्ट ने विधवा को हिस्सा दिया था, लेकिन बेटी का दावा खारिज कर दिया था।

    इसके खिलाफ अपील पर हाइकोर्ट ने पहले विधवा, बेटी और बेटे को संपत्ति में बराबर हिस्सेदारी दी थी। बाद में अंतिम डिक्री की कार्यवाही लंबित रहने के दौरान बेटी के हिस्से को बढ़ाने की मांग की गई।

    हाईकोर्ट ने आवेदन स्वीकार करते हुए प्रारंभिक डिक्री में संशोधन किया और बेटे तथा बेटी दोनों को पिता की आधी हिस्सेदारी में बराबर-बराबर एक-चौथाई हिस्सा देने का निर्देश दिया।

    कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को संशोधित प्रारंभिक डिक्री के अनुसार आगे की कार्यवाही छह महीने के भीतर पूरी करने का निर्देश भी दिया।

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