IPC की धारा 498A जैसे वैवाहिक मामलों में यांत्रिक तरीके से LOC जारी नहीं की जा सकती: आंध्र प्रदेश हाइकोर्ट

Amir Ahmad

19 Feb 2026 1:22 PM IST

  • IPC की धारा 498A जैसे वैवाहिक मामलों में यांत्रिक तरीके से LOC जारी नहीं की जा सकती: आंध्र प्रदेश हाइकोर्ट

    आंध्र प्रदेश हाइकोर्ट ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498ए (भारतीय न्याय संहिता की धारा 85) के तहत दर्ज वैवाहिक क्रूरता के मामलों में लुक-आउट सर्कुलर (LOC) जारी करने की प्रवृत्ति पर कड़ी आपत्ति जताई। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में एलओसी केवल अपवाद स्वरूप और विशेष परिस्थितियों में ही जारी की जा सकती है न कि यांत्रिक तरीके से।

    जस्टिस के. श्रीनिवास रेड्डी की एकलपीठ ने आरोपी के खिलाफ जारी LOC को निरस्त करते हुए कहा कि पुलिस को यह देखना आवश्यक है कि क्या आरोपी जांच में सहयोग कर रहा है या गिरफ्तारी से बच रहा है। बिना इन पहलुओं की जांच किए प्रत्येक IPC की धारा 498ए मामले में LOC खोल देना उचित नहीं है।

    अदालत ने गृह मंत्रालय द्वारा वर्ष 2017 में जारी दिशा-निर्देशों का उल्लेख करते हुए कहा कि LOC केवल असाधारण परिस्थितियों में जारी की जा सकती है, जैसे कि जब किसी व्यक्ति का विदेश जाना देश की संप्रभुता, सुरक्षा, सामरिक या आर्थिक हितों के लिए हानिकारक हो, या वह आतंकवाद अथवा राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में संलिप्त हो।

    अदालत ने कहा,

    “हाल के समय में LOC की धारा 498A के प्रत्येक मामले में बिना यह देखे कि आरोपी जांच में सहयोग कर रहा है या नहीं, पुलिस द्वारा यांत्रिक ढंग से एलओसी जारी करना आम हो गया। LOC केवल गंभीर अपराधों, वित्तीय अनियमितताओं या समाज के विरुद्ध अपराधों में ही खोली जानी चाहिए।”

    मौजूदा मामले में याचिकाकर्ता दुबई में विद्युत तकनीशियन के रूप में कार्यरत था। उसकी पत्नी ने तलाक और भरण-पोषण का मामला दायर किया तथा IPC की धारा 85 और दहेज निषेध अधिनियम की धाराओं 3 और 4 के तहत भी मामला दर्ज कराया। याचिकाकर्ता को जमानत मिल चुकी थी।

    याचिकाकर्ता ने बताया कि जब वह अवकाश लेकर विशाखापत्तनम हवाई अड्डे पर उतरा तो हवाई अड्डा पुलिस ने LOC के आधार पर उसे रोक लिया। बाद में प्रतिभूति देने पर उसे छोड़ा गया। उसने तर्क दिया कि वह नियमित रूप से अदालत में उपस्थित हो रहा है और जांच में पूरा सहयोग कर रहा है। LOC के कारण वह विदेश नहीं जा पा रहा है और उसकी नौकरी पर संकट है।

    राज्य की ओर से कहा गया कि यदि LOC रद्द कर दी गई तो आरोपी न्यायिक प्रक्रिया से बच सकता है।

    अदालत ने कहा कि IPC की धारा 498ए के तहत दर्ज अपराध इतना गंभीर नहीं है कि मात्र FIR दर्ज होते ही एलओसी जारी कर दी जाए। अदालत ने यह भी कहा कि LOC व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को प्रभावित करती है और ऐसे मामलों को संविधान के अनुच्छेद 21 की कसौटी पर परखा जाना चाहिए।

    अंततः हाइकोर्ट ने पाया कि इस मामले में LOC जारी करना उचित नहीं था और याचिका स्वीकार करते हुए LOC को निरस्त कर दिया।

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