आधार कार्ड में दर्ज उम्र अंतिम प्रमाण नहीं: आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट के आधार पर बढ़ाया दुर्घटना मुआवजा

  • आधार कार्ड में दर्ज उम्र अंतिम प्रमाण नहीं: आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट के आधार पर बढ़ाया दुर्घटना मुआवजा

    आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि आधार कार्ड में दर्ज उम्र को अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने सड़क दुर्घटना में मृत व्यक्ति के परिजनों को मुआवजा देने की गणना के लिए पोस्टमार्टम रिपोर्ट में दर्ज उम्र पर भरोसा किया।

    कोर्ट ने मुआवजे की राशि 7.33 लाख रुपये से बढ़ाकर 11.27 लाख रुपये की। कोर्ट ने कहा कि मृतक की आधार कार्ड में दर्ज उम्र 48 वर्ष थी, जबकि पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार उसकी वास्तविक उम्र 45 वर्ष थी। इसलिए मुआवजे की गणना में 14 का मल्टीप्लायर लागू किया जाना चाहिए।

    पोस्टमार्टम रिपोर्ट और अन्य संबंधित दस्तावेजों से मृतक की उम्र 45 वर्ष साबित होने पर कोर्ट ने मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (ट्रिब्यूनल) द्वारा आधार कार्ड में दर्ज 48 वर्ष की उम्र स्वीकार करने का फैसला खारिज किया।

    मुआवजे का दोबारा आकलन करते हुए कोर्ट ने मृतक की मासिक आय भी 4,500 रुपये से बढ़ाकर 6,500 रुपये की। कोर्ट ने कहा कि असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले लोगों के पास अपनी कमाई साबित करने के लिए जरूरी दस्तावेज हमेशा उपलब्ध नहीं होते।

    जस्टिस तुहिन कुमार गेडेला की सिंगल जज बेंच ने मुआवजा बढ़ाने की मांग करने वाले मृतक के परिवार की अपील आंशिक रूप से स्वीकार की और बीमा कंपनी की ओर से मुआवजे के आदेश को चुनौती देने वाली अपील खारिज की।

    कोर्ट ने कहा,

    “मुआवजे के मुद्दे पर दावेदारों के वकील ने बताया कि रिकॉर्ड पर मौजूद दस्तावेजों के अनुसार मृतक की उम्र 45 वर्ष थी, जबकि ट्रिब्यूनल ने आधार कार्ड में दर्ज 48 वर्ष की उम्र को गलत तरीके से ध्यान में रखा। यह कानून का स्थापित सिद्धांत है कि आधार कार्ड में दर्ज उम्र अंतिम प्रमाण नहीं है। ट्रिब्यूनल ने रिकॉर्ड पर मौजूद दस्तावेजों पर ध्यान नहीं दिया। पोस्टमार्टम प्रमाणपत्र और अन्य संबंधित रिपोर्टों के आधार पर उम्र 45 वर्ष है। ट्रिब्यूनल को 45 वर्ष को सही उम्र मानते हुए मुआवजे की गणना के लिए 14 का मल्टीप्लायर लागू करना चाहिए था।

    दूसरी ओर बीमा कंपनी के वकील ने जोरदार दलील दी कि दावेदारों द्वारा कोई अन्य प्रमाण पेश नहीं किए जाने के कारण ट्रिब्यूनल ने आधार कार्ड में दर्ज उम्र को अंतिम प्रमाण मानकर सही किया। कोर्ट इस दलील को स्वीकार करना कठिन पाता है, क्योंकि यह स्थापित कानून है कि आधार कार्ड में दर्ज जन्मतिथि अंतिम प्रमाण नहीं है और उसे निर्णायक नहीं माना जा सकता। कोर्ट की राय है कि मृतक की उम्र 48 वर्ष के बजाय 45 वर्ष मानी जानी चाहिए।

    यह मामला एक घातक सड़क दुर्घटना से जुड़ा था। मृतक गुडिपाला क्रॉस रोड के पास चित्तूर-वेल्लोर रोड पर मोटरसाइकिल चला रहा था, तभी तेज और लापरवाही से चलाई जा रही एक टवेरा कार अनियंत्रित होकर उसकी मोटरसाइकिल से टकरा गई। दुर्घटना में घायल होने के कुछ समय बाद उसकी मौत हो गई। कार चालक के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज किया गया और बाद में चार्जशीट दाखिल की गई। कार का बीमा चोलामंडलम एमएस जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड के पास था।

    दुर्घटना के बाद मृतक की पत्नी और दो बच्चों ने मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण के समक्ष मुआवजे की मांग की। ट्रिब्यूनल ने चालक और बीमा कंपनी को संयुक्त रूप से और अलग-अलग जिम्मेदार ठहराते हुए 7,33,400 रुपये का मुआवजा दिया। मुआवजे की राशि से असंतुष्ट होकर दावेदारों ने इसे बढ़ाने के लिए अपील की, जबकि बीमा कंपनी ने पुरस्कार को चुनौती देते हुए अलग अपील दाखिल की।

    हाईकोर्ट में दावेदारों ने कहा कि ट्रिब्यूनल ने मृतक की आधार कार्ड में दर्ज 48 वर्ष की उम्र पर गलत तरीके से भरोसा किया, जबकि पोस्टमार्टम प्रमाणपत्र और अन्य दस्तावेजों में उसकी उम्र 45 वर्ष थी। उन्होंने कहा कि मुआवजे की गणना में मल्टीप्लायर लागू करते समय मृतक की सही उम्र को ध्यान में रखा जाना चाहिए।

    दावेदारों ने यह भी बताया कि मृतक पेंटर के रूप में काम करता था और कृषि गतिविधियों में भी शामिल था। पेंटिंग से वह प्रति माह 15,000 रुपये और कृषि कार्यों से 25,000 रुपये कमाता था। इस तरह उसकी कुल मासिक आय 40,000 रुपये थी।

    बीमा कंपनी ने इसके जवाब में कहा कि उम्र का कोई अन्य प्रमाण नहीं होने के कारण ट्रिब्यूनल ने आधार कार्ड पर सही भरोसा किया था। कंपनी ने यह भी दलील दी कि कंसोर्टियम के लिए दिए गए एक लाख रुपये को लागू कानूनी स्थिति के अनुसार घटाकर 40,000 रुपये किया जाना चाहिए।

    दावेदारों की उम्र संबंधी दलील स्वीकार करते हुए कोर्ट ने मृतक की उम्र 45 वर्ष मानने और मुआवजे की गणना में 14 का मल्टीप्लायर लागू करने का फैसला किया।

    आय के मुद्दे पर बेंच ने कहा कि दावेदार मृतक की 40,000 रुपये मासिक आय का दावा साबित करने के लिए भरोसेमंद दस्तावेज पेश नहीं कर सके। इसी कारण ट्रिब्यूनल ने उसकी मासिक आय 4,500 रुपये निर्धारित की थी।

    हालांकि, कोर्ट ने कहा कि दस्तावेजी प्रमाण नहीं होने का मतलब यह नहीं है कि आय का आकलन बहुत कम किया जाए, खासकर जब मृतक असंगठित क्षेत्र में काम करता हो। मृतक के काम की प्रकृति और मौजूदा आर्थिक परिस्थितियों को देखते हुए कोर्ट ने उसकी मासिक आय 6,500 रुपये निर्धारित की। कोर्ट ने यह भी कहा कि ट्रिब्यूनल ने 4,500 रुपये की आय तय करने का पर्याप्त आधार नहीं बताया।

    संशोधित आकलन के आधार पर कोर्ट ने भविष्य की संभावनाओं के लिए 30 प्रतिशत राशि जोड़ी, व्यक्तिगत और जीवन-यापन के खर्चों के लिए एक-तिहाई कटौती की और 14 का मल्टीप्लायर लागू किया। इस तरह निर्भरता के नुकसान की राशि 9,46,400 रुपये निर्धारित की गई।

    कोर्ट ने समय-समय पर वृद्धि के बाद कंसोर्टियम के लिए 1,45,200 रुपये और अंतिम संस्कार के खर्च तथा संपत्ति के नुकसान के लिए कुल 36,300 रुपये निर्धारित किए। इससे कुल मुआवजा 11,27,900 रुपये हो गया।

    बेंच ने चालक और बीमा कंपनी को निर्देश दिया कि फैसले की प्रति प्राप्त होने के आठ सप्ताह के भीतर बढ़ी हुई मुआवजा राशि 7.5 प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ ट्रिब्यूनल में जमा करें। पहले से जमा किसी भी राशि को इसमें से घटाया जाएगा। दावेदार अपने निर्धारित हिस्से के अनुसार राशि निकाल सकते हैं।

    इस तरह कोर्ट ने मृतक के परिवार की अपील आंशिक रूप से स्वीकार कर ली और बीमा कंपनी की अपील खारिज की।

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