सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भर्ती विज्ञापन में निर्धारित पात्रता या योग्यता की शर्तों में अस्पष्टता होने पर उसका अर्थ ऐसे उम्मीदवार के पक्ष में लगाया जाना चाहिए, जो प्रथम दृष्टया आवश्यक योग्यता रखता हो।

कोर्ट ने यह टिप्पणी करते हुए जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट का फैसला रद्द कर दिया, जिसमें भर्ती विज्ञापन में अनुभव संबंधी शर्तों की अस्पष्टता के बावजूद एक उम्मीदवार को लाइब्रेरियन के पद पर नियुक्ति के लिए अयोग्य ठहराया गया।

जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की खंडपीठ ने कहा,

“निर्धारित योग्यता में किसी भी तरह की अस्पष्टता या अनिश्चितता का लाभ उस उम्मीदवार को दिया जाना चाहिए, जो प्रथम दृष्टया आवश्यक योग्यता रखता हुआ दिखाई देता है।”

यह मामला जम्मू-कश्मीर के कानून विभाग में लाइब्रेरियन के पद के लिए प्रतीक्षा सूची में पहले स्थान पर रहे इरफान अहमद हकाक की अपील से संबंधित था। वर्ष 2014 के भर्ती विज्ञापन में इस पद के लिए स्नातक डिग्री, एम.लिब की डिग्री और तीन वर्ष का अनुभव अनिवार्य बताया गया। हकाक के पास M.LIS की डिग्री थी। उन्होंने यह पाठ्यक्रम करते समय सहायक लाइब्रेरियन के रूप में काम किया था और बाद में जूनियर प्रोफेशनल असिस्टेंट के पद पर भी कार्य किया।

भर्ती अधिकारियों ने शुरुआत में हकाक की नियुक्ति की सिफारिश की थी, लेकिन बाद में उनकी उम्मीदवारी खारिज कर दी। अधिकारियों ने M.LIS कोर्स के दौरान प्राप्त अनुभव को निर्धारित तीन वर्ष के अनुभव की शर्त पूरी करने के लिए मानने पर आपत्ति जताई।

हकाक ने केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण का रुख किया। अधिकरण ने अधिकारियों को उन्हें पद पर नियुक्त करने का प्रस्ताव देने का निर्देश दिया। हालांकि, हाईकोर्ट ने अधिकरण का आदेश पलटते हुए कहा कि निर्धारित अनुभव शैक्षणिक योग्यता हासिल करने के बाद ही प्राप्त किया जाना चाहिए। इस फैसले को हकाक ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।

सुप्रीम कोर्ट ने भर्ती विज्ञापन की भाषा पर गौर करते हुए कहा कि उसमें तीन वर्ष के अनुभव की शर्त तो रखी गई, लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया गया कि अनुभव केवल लाइब्रेरियन के रूप में होना चाहिए या लाइब्रेरी असिस्टेंट अथवा समान प्रकृति के किसी अन्य पद पर प्राप्त अनुभव भी मान्य होगा। विज्ञापन में पदनाम के संबंध में भी कोई स्पष्टता नहीं थी।

जस्टिस श्री चंद्रशेखर द्वारा लिखे गए फैसले में कहा गया कि विज्ञापन में निर्धारित योग्यता स्पष्ट नहीं थी, बल्कि उसमें काफी अस्पष्टता थी। कोर्ट ने कहा कि लाइब्रेरी असिस्टेंट के पद के लिए स्नातक और बी.लिब की योग्यता आवश्यक होती है। ऐसे में कोई उम्मीदवार इस पद पर काम करते हुए आवश्यक अनुभव प्राप्त कर सकता है और बाद में लाइब्रेरियन के पद के लिए पात्र बन सकता है। इसके बावजूद, भर्ती अधिकारियों ने विज्ञापन में मौजूद अस्पष्टता दूर करने का कोई प्रयास नहीं किया।

कोर्ट ने यह भी कहा कि अधिकारियों ने अपीलकर्ता के अनुभव को लेकर कोई विवाद नहीं उठाया, फिर भी हाईकोर्ट ने उसके सामने आए विवाद का दायरा बढ़ा दिया और हकाक को नियुक्ति के लिए अयोग्य ठहरा दिया। सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, हाईकोर्ट इस निष्कर्ष पर पहुंचने में गलती कर गया, जबकि हकाक लाइब्रेरियन के पद पर नियुक्ति पाने के हकदार है।

इन टिप्पणियों के साथ सुप्रीम कोर्ट ने हकाक की अपील स्वीकार कर हाईकोर्ट का फैसला रद्द किया। कोर्ट ने संबंधित अधिकारियों को हकाक को लाइब्रेरियन के पद पर नियुक्ति का प्रस्ताव देने और उससे जुड़े सभी परिणामी लाभ प्रदान करने का निर्देश दिया।

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