मुकदमे की सुनवाई में धारा 161 के बयानों पर भरोसा नहीं, लेकिन संज्ञान लेने के स्तर पर विचार कर सकती है अदालत: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 161 के तहत पुलिस द्वारा दर्ज किए गए गवाहों के बयानों पर मुकदमे की सुनवाई के दौरान ठोस साक्ष्य के रूप में भरोसा नहीं किया जा सकता लेकिन अपराध का संज्ञान लेने के चरण में अदालत इन बयानों पर विचार कर सकती है। अदालत ने कहा कि पुलिस की ओर से अंतिम रिपोर्ट में मामला नहीं बनने की बात कहने यानी क्लोजर रिपोर्ट दाखिल करने के बावजूद मजिस्ट्रेट अपराध का संज्ञान ले सकता है।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की खंडपीठ ने यह टिप्पणी करते हुए पटना हाईकोर्ट का फैसला रद्द किया। हाईकोर्ट ने मजिस्ट्रेट द्वारा अपराध का संज्ञान लेने के आदेश में हस्तक्षेप किया था। सुप्रीम कोर्ट ने मजिस्ट्रेट के संज्ञान आदेश बहाल किया।
खंडपीठ ने कहा,
“CrPC की धारा 161 के तहत दर्ज बयानों पर मुकदमे की सुनवाई के दौरान भरोसा नहीं किया जा सकता, लेकिन संज्ञान लेने के समय उन पर निश्चित रूप से विचार किया जा सकता है, क्योंकि पुलिस अंतिम रिपोर्ट के साथ यही सामग्री अदालत के समक्ष प्रस्तुत करती है।”
मामला डूबने से हुई एक युवक की मौत से जुड़ा था। मृतक की मां ने आरोप लगाया कि प्रतिवादी संख्या दो ने उसके बेटे की मौत में सक्रिय भूमिका निभाई। मामले में कुछ परिस्थितिजन्य साक्ष्य भी मौजूद थे। इसके अलावा, ऐसे गवाह भी थे जिन्होंने आरोपी को घटनास्थल से भागते हुए देखने की बात कही थी।
घटना के बाद FIR दर्ज की गई और पुलिस ने जांच की। जांच पूरी होने पर पुलिस ने अंतिम रिपोर्ट दाखिल करते हुए कहा कि मामला नहीं बनता। मृतक की मां ने इस रिपोर्ट का विरोध किया और विरोध याचिका दाखिल की जिसे बाद में परिवाद मामले के रूप में दर्ज किया गया।
मजिस्ट्रेट ने क्लोजर रिपोर्ट दाखिल होने के बाद अपराध का संज्ञान लेने से इनकार किया। इसके खिलाफ मृतक की मां ने सेशंस कोर्ट में पुनरीक्षण याचिका दायर की। एडिशनल सेशंस कोर्ट ने मामले पर दोबारा विचार करने के लिए मजिस्ट्रेट को अंतिम रिपोर्ट पर नए सिरे से विचार करने का निर्देश दिया।
इसके बाद मजिस्ट्रेट ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302 और 201 के तहत अपराधों का संज्ञान लिया। आरोपी ने इस आदेश को पटना हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट ने मजिस्ट्रेट के संज्ञान आदेश को रद्द कर दिया, जिसके बाद मृतक की मां ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि हाईकोर्ट ने मामले में मौजूद परिस्थितियों और धारा 161 के तहत दर्ज बयानों पर पर्याप्त विचार किए बिना मजिस्ट्रेट के आदेश को खारिज किया था। खंडपीठ ने कहा कि एडिशनल सेशंस जज ने अपने पुनरीक्षण आदेश में पुलिस के बयानों और अन्य सामग्री पर विस्तार से विचार किया तथा प्रथमदृष्टया यह माना था कि मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त सामग्री मौजूद है।
अदालत ने यह भी कहा कि क्लोजर रिपोर्ट दाखिल होने मात्र से मजिस्ट्रेट के अपराध का संज्ञान लेने के अधिकार पर कोई रोक नहीं लगती। यदि पुलिस जांच के बाद मामला नहीं बनने की रिपोर्ट देती है, तब भी अदालत उपलब्ध सामग्री के आधार पर स्वतंत्र रूप से संज्ञान लेने का निर्णय कर सकती है।
खंडपीठ ने कहा कि एडिशनल सेशंस जज ने अपने आदेश में उन कानूनी फैसलों का भी उल्लेख किया, जिनमें क्लोजर रिपोर्ट के बावजूद संज्ञान लेने के अधिकार को स्वीकार किया गया। हाईकोर्ट ने इन पहलुओं को नजरअंदाज किया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए मजिस्ट्रेट द्वारा संज्ञान लेने के आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं है। हालांकि, खंडपीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि एडिशनल सेशंस जज, मजिस्ट्रेट या सुप्रीम कोर्ट की ओर से संज्ञान के चरण में व्यक्त किए गए विचार मुकदमे की सुनवाई को किसी भी तरह प्रभावित नहीं करेंगे।
इस टिप्पणी के साथ सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार की और मजिस्ट्रेट का संज्ञान आदेश बहाल किया। प्रतिवादी संख्या दो को संबंधित मजिस्ट्रेट के समक्ष उपस्थित होने का निर्देश दिया गया। मजिस्ट्रेट को कानून के अनुसार मामले को सेशंस कोर्ट के ट्रायल के लिए भेजने की प्रक्रिया पूरी करने को कहा गया।
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