हमले के दोषियों को प्रोबेशन पर छोड़ने पर सुप्रीम कोर्ट की इलाहाबाद हाईकोर्ट को फटकार, कहा- पीड़ित आज भी भुगत रहा है सजा
सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर हमले के मामले में दोषी ठहराए गए दो लोगों को प्रोबेशन पर रिहा करने के इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर कड़ी टिप्पणी की।
कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट ने अपराध की गंभीरता और दोषियों के आपराधिक इतिहास को नजरअंदाज करते हुए उन्हें अच्छे आचरण की शर्त पर रिहा किया, जबकि प्रोबेशन अधिकारी की रिपोर्ट भी उनके खिलाफ थी। हमले में पीड़ित को गंभीर चोटें आई थीं और दो दशक से अधिक समय बीतने के बाद भी वह इसके दुष्परिणाम झेल रहा है।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने कहा कि मामले में ऐसा कोई आधार नहीं था, जिसके चलते दोषियों को प्रोबेशन का लाभ दिया जाना चाहिए। कोर्ट ने टिप्पणी की कि हमले की क्रूरता और पीड़ित की गंभीर चोटों के बावजूद आरोपियों को एक दिन भी जेल में नहीं बिताना पड़ा।
मामला वर्ष 2003 का है। पड़ोसी दुकानों से जुड़े विवाद के बाद दो आरोपियों ने कथित तौर पर पीड़ित पर धारदार हथियार और आग्नेयास्त्र से हमला किया। पीड़ित को धारदार हथियार से चोटें आईं और गोली भी लगी।
निचली अदालत ने दोनों आरोपियों को भारतीय दंड संहिता की धारा 308 के तहत दोषी ठहराते हुए पांच-पांच साल के कठोर कारावास और 20-20 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दोषसिद्धि बरकरार रखी, लेकिन अपराधी परिवीक्षा अधिनियम, 1958 की धारा 4 का लाभ देते हुए दोनों को प्रोबेशन पर छोड़ दिया। हाईकोर्ट ने उन्हें 20-20 हजार रुपये के निजी मुचलके भरने और एक वर्ष तक शांति एवं सदाचार बनाए रखने का निर्देश दिया।
इस राहत के लिए हाईकोर्ट ने घटना के बाद लगभग 22 वर्ष बीतने और आरोपियों के पहले किसी अपराध में दोषी न ठहराए जाने को आधार बनाया। इस आदेश को पीड़ित के भाई और मामले के शिकायतकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अपराधी परिवीक्षा अधिनियम की धारा 4 के तहत किसी दोषी को प्रोबेशन का लाभ देने का निर्णय लेते समय अपराध की प्रकृति और अपराधी के चरित्र पर विचार करना जरूरी है।
अदालत ने पाया कि हाईकोर्ट ने इन दोनों पहलुओं को पर्याप्त महत्व नहीं दिया।
बेंच ने कहा कि पीड़ित को लगी चोटें प्रथम दृष्टया भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 320 के तहत गंभीर चोट की श्रेणी में आती थीं। कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि मामले में धारा 308 के बजाय धारा 307 के तहत आरोप लगाया जाना चाहिए था। हालांकि, मुकदमा धारा 308 के तहत चला था और इस चरण पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस संबंध में उसके पास बहुत सीमित विकल्प थे।
सुप्रीम कोर्ट ने आरोपियों के आपराधिक इतिहास पर भी ध्यान दिया। अभियोजन पक्ष ने बताया था कि दोनों के खिलाफ पहले से कई आपराधिक मामले दर्ज थे और उनके खिलाफ निवारक कार्रवाई का प्रस्ताव भी दिया गया।
कोर्ट ने प्रोबेशन अधिकारी से रिपोर्ट मंगाई, जिसमें दोनों आरोपियों के खिलाफ कई मामलों का उल्लेख था। इनमें कुछ मामले ऐसे भी थे, जिनका मुकदमा अभी लंबित था।
अदालत ने कहा कि राज्य सरकार ने हाईकोर्ट के समक्ष दाखिल जवाबी हलफनामे में आरोपियों के आपराधिक इतिहास की जानकारी दी थी। रिकॉर्ड में उत्तर प्रदेश गुंडा नियंत्रण अधिनियम, 1970 के तहत निवारक कार्रवाई के प्रस्ताव का भी उल्लेख था। इसके बावजूद हाईकोर्ट ने प्रोबेशन का लाभ दिया।
बेंच ने यह भी रेखांकित किया कि अपराधी परिवीक्षा अधिनियम की धारा 4(2) के अनुसार, यदि प्रोबेशन अधिकारी की रिपोर्ट उपलब्ध हो, तो आदेश पारित करने से पहले अदालत को उस पर विचार करना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने रिपोर्ट का उल्लेख करते हुए कहा कि हमले के दो दशक से अधिक समय बाद भी पीड़ित की शारीरिक स्थिति गंभीर बनी हुई।
रिपोर्ट के अनुसार, पीड़ित का दायां अंगूठा हथेली से लगभग पूरी तरह अलग हो गया। उसके दोनों हाथों, कलाई, पेट, गर्दन, कंधे और चेहरे पर गहरे घावों के निशान मौजूद थे।
रिपोर्ट में बताया गया कि पीड़ित को चलने, बैठने और खड़े होने के दौरान तेज दर्द होता है। उसे कमर को सहारा देने वाली बेल्ट पहननी पड़ती है और वह काफी कठिनाई से चल पाता है। दोनों हाथों की कार्यक्षमता काफी हद तक प्रभावित हुई और उसका दायां हाथ लगभग निष्क्रिय हो चुका है। पीड़ित का इलाज लखनऊ के एक अस्पताल में अब भी जारी है।
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के इस तर्क पर भी सवाल उठाया कि आरोपियों को 22 साल तक मुकदमे की प्रक्रिया से गुजरना पड़ा, इसलिए उन्हें राहत दी जानी चाहिए।
बेंच ने कहा कि लंबे समय तक मुकदमा चलना कष्टदायक हो सकता है, लेकिन इस मामले में आरोपी जमानत पर बाहर रहे और उन्होंने एक दिन भी कारावास नहीं भुगता।
दूसरी ओर, पीड़ित हर दिन हमले के गंभीर और स्थायी दुष्परिणाम झेलता रहा। कोर्ट के मुताबिक, प्रोबेशन देने के निर्णय में अपराध की प्रकृति और दोषी के चरित्र को सबसे अधिक महत्व मिलना चाहिए, लेकिन इस मामले में अच्छे आचरण के आधार पर राहत देने के लिए जरूरी परिस्थितियां मौजूद नहीं थीं।
सुप्रीम कोर्ट ने शिकायतकर्ता की अपील स्वीकार करते हुए दोनों दोषियों को आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया। साथ ही, आपराधिक अपील को दोबारा इलाहाबाद हाईकोर्ट के समक्ष बहाल कर दिया।
हाईकोर्ट से कहा गया कि वह अपील पर सुनवाई तभी करे, जब यह सुनिश्चित हो जाए कि दोनों दोषियों को हिरासत में ले लिया गया। इस तरह सुप्रीम कोर्ट ने प्रोबेशन पर रिहाई से संबंधित हाईकोर्ट का आदेश रद्द करते हुए मामले को आगे की सुनवाई के लिए वापस भेज दिया।