इस तरह दबाव बनाने की कोशिश हमें स्वीकार नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब के चीफ सेक्रेटरी के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही पर लगाई रोक
सुप्रीम कोर्ट ने महंगाई भत्ते (DA) के भुगतान से जुड़े मामले में पंजाब के चीफ सेक्रेटरी और अन्य सरकारी अधिकारियों के खिलाफ शुरू की गई आपराधिक अवमानना की कार्यवाही पर रोक लगाई। यह कार्यवाही पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट के आदेशों का कथित रूप से पालन नहीं करने के आरोप में शुरू की गई थी।
जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस आर महादेवन की खंडपीठ ने सीनियर एडवोकेट विकास सिंह, शादान फरासत और पीएस पटवालिया को राज्य सरकार और उसके अधिकारियों की ओर से तथा सीनियर एडवोकेट देवदत्त कामत को प्रतिवादियों की ओर से सुनने के बाद आपराधिक अवमानना मामले में आगे की कार्यवाही पर रोक लगाने का निर्देश दिया।
इससे जुड़े दीवानी अवमानना के मामले में खंडपीठ ने कहा कि फिलहाल कोई भी दबावपूर्ण कार्रवाई नहीं की जाए।
सुनवाई के दौरान जस्टिस नागरत्ना ने टिप्पणी की कि खंडपीठ इस तरह दबाव बनाने की कोशिश को पसंद नहीं करती। उन्होंने प्रतिवादियों से पूछा कि क्या वे हाईकोर्ट के आदेश का पालन चाहते हैं या फिर चीफ सेक्रेटरी को जेल भेजना चाहते हैं।
जब खंडपीठ को बताया गया कि राज्य सरकार ने डीए 43 प्रतिशत से बढ़ाकर 53 प्रतिशत कर दिया तो उसने राज्य से यह बताने को कहा कि 31 मार्च, 2027 तक वह कितना बकाया भुगतान करेगा।
यह मामला सरकारी कर्मचारियों को लंबित महंगाई भत्ते के भुगतान से संबंधित हाईकोर्ट के निर्देशों का राज्य सरकार द्वारा कथित तौर पर पालन नहीं किए जाने से जुड़ा है। अगस्त में हाईकोर्ट ने पंजाब सरकार और पंजाब स्टेट पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड (PSPCL) की ओर से दायर कई लेटर्स पेटेंट अपीलें खारिज कर दी थीं। हाईकोर्ट ने कहा था कि जब राज्य सरकार ने महंगाई भत्ता और महंगाई राहत देने के लिए केंद्र सरकार की व्यवस्था अपनाई है, तो उस पर जमा हो चुकी किस्तों का भुगतान करने की बाध्यकारी जिम्मेदारी भी है। वित्तीय कठिनाइयों का हवाला देकर इस भुगतान को अनिश्चितकाल तक टाला नहीं जा सकता।
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार और PSPCL को निर्देश दिया था कि वे पंजाब में कार्यरत अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों को केंद्र सरकार की व्यवस्था के अनुसार जिस दर से डीए दिया जा रहा है, उसी दर से अपने कर्मचारियों और पेंशनभोगियों को DA/DR की सभी लंबित किस्तों का भुगतान दो सप्ताह के भीतर करें। इस आदेश के अनुसार भुगतान की अंतिम तारीख 18 अगस्त 2026 थी।
हाईकोर्ट ने यह भी निर्देश दिया था कि निर्धारित समय सीमा के बाद बकाया राशि पर 6 प्रतिशत सालाना साधारण ब्याज देना होगा। इसके अलावा चीफ सेक्रेटरी को 31 अगस्त 2026 तक अनुपालन हलफनामा दाखिल करना था। कोर्ट ने कहा था कि जब तक बकाया राशि का भुगतान नहीं हो जाता राज्य सरकार को प्रिंट और सोशल मीडिया में बड़े पैमाने पर विज्ञापन अभियानों जैसे अनुत्पादक खर्चों पर धन खर्च नहीं करना चाहिए।
9 अक्टूबर को हाईकोर्ट ने पाया कि अगस्त के आदेश के अनुसार अनुपालन हलफनामा दाखिल नहीं किया गया। इसके बाद अवमानना की कार्रवाई की मांग करते हुए आवेदन दायर किए गए। राज्य सरकार ने हाईकोर्ट को बताया कि उसने 1 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर की। इस आधार पर राज्य को अपील में सुनवाई का अवसर देने के लिए मामले की सुनवाई बार-बार स्थगित की गई।
अवमानना की मांग करने वाले आवेदकों ने हाईकोर्ट में दावा किया कि चीफ सेक्रेटरी ने हलफनामे में कहा था कि सुप्रीम कोर्ट में दाखिल SLP की खामियां दूर कर दी गईं। हालांकि सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री की रिपोर्ट के मुताबिक उस समय राज्य सरकार की एसएलपी में खामियां बरकरार थीं। 9 अक्टूबर को हाईकोर्ट की खंडपीठ ने मामले को रोस्टर बेंच के समक्ष रखने का निर्देश दिया था।
इसके बाद 12 अक्टूबर को हाईकोर्ट ने चीफ सेक्रेटरी और अन्य अधिकारियों के खिलाफ औपचारिक रूप से आपराधिक अवमानना का नोटिस जारी किया।
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में हाईकोर्ट की कार्यवाही से जुड़े तीन मामले विचाराधीन हैं। इनमें मुख्य फैसले को चुनौती देने वाली दो विशेष अनुमति याचिकाएं एक पंजाब सरकार और दूसरी PSPCL की ओर से और आपराधिक अवमानना की कार्यवाही से संबंधित एक मामला शामिल है।