स्वैच्छिक रिटायरमेंट की तारीख बढ़ाने का आवेदन नजरअंदाज नहीं कर सकते, रिटायरमेंट प्रभावी होने से पहले मांग करना जरूरी: राजस्थान हाईकोर्ट
राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि यदि कोई कर्मचारी स्वैच्छिक रिटायरमेंट प्रभावी होने से पहले उसकी तारीख बढ़ाने का आवेदन देता है, तो उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। ऐसा तब भी लागू होगा, जब संबंधित सेवा नियमों में रिटायरमेंट की तारीख बढ़ाने की स्पष्ट व्यवस्था न हो।
चीफ जस्टिस संजय के. अग्रवाल और जस्टिस इंद्रजीत सिंह की खंडपीठ ने कहा कि राजस्थान सिविल सेवा (पेंशन) नियम, 1996 में स्वैच्छिक रिटायरमेंट की तारीख बढ़ाने की प्रक्रिया का स्पष्ट उल्लेख नहीं है।
लेकिन केवल इस आधार पर कर्मचारी को तारीख बढ़ाने का अनुरोध करने से नहीं रोका जा सकता, खासकर तब जब उसकी रिटायरमेंट अभी प्रभावी नहीं हुई हो।
मामले में याचिकाकर्ता राजस्थान सरकार के वाणिज्यिक कर विभाग में सहायक वाणिज्यिक कर अधिकारी के पद पर कार्यरत था। खराब स्वास्थ्य के कारण उसने स्वैच्छिक रिटायरमेंट के लिए आवेदन किया। रिटायरमेंट की निर्धारित तारीख आने से पहले उसने तारीख बढ़ाने का अनुरोध किया, जिसे स्वीकार कर लिया गया।
इसके बाद उसने एक बार फिर तारीख बढ़ाने के लिए आवेदन दिया, लेकिन इस बार उसे खारिज कर दिया गया। परिणामस्वरूप, उसे 31 अक्टूबर 2014 को रिटायर कर दिया गया।
कर्मचारी ने रिटायरमेंट के आदेश को चुनौती दी। जनवरी 2017 में हाईकोर्ट सिंगल जज ने रिटायरमेंट का आदेश रद्द करते हुए उसे दोबारा सेवा में बहाल करने का निर्देश दिया। हालांकि, रिटायरमेंट से बहाली तक की अवधि को केवल पेंशन संबंधी लाभों के लिए मान्य किया गया और इसे सेवा में निरंतरता नहीं माना गया। इस आदेश को कर्मचारी और राज्य सरकार, दोनों ने चुनौती दी।
कर्मचारी की ओर से दलील दी गई कि सेवानिवृत्ति और बहाली के बीच की अवधि को भी उसकी निरंतर सेवा का हिस्सा माना जाना चाहिए।
वहीं, राज्य सरकार ने एकल जज के उस आदेश को चुनौती दी, जिसके तहत सेवानिवृत्ति रद्द की गई। सरकार ने यह भी कहा कि कर्मचारी ने सिंगल जज के समक्ष दायर याचिका में रिटायरमेंट और बहाली के बीच सेवा में निरंतरता देने की मांग नहीं की, इसलिए अब उसे यह राहत नहीं दी जा सकती।
मामले की सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने स्वैच्छिक रिटायरमेंट की प्रक्रिया से संबंधित नियम 50 का अध्ययन किया।
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के यूनियन ऑफ इंडिया बनाम गोपाल चंद्र मिश्रा एवं अन्य मामले का भी उल्लेख किया। उस मामले में कहा गया था कि यदि कोई व्यक्ति भविष्य की किसी तारीख से अपना पद छोड़ने का निर्णय लेता है, तो निर्धारित तारीख आने से पहले पद छोड़ने की प्रक्रिया पूरी नहीं होती। इसलिए किसी कानूनी, संविदात्मक या संवैधानिक रोक के अभाव में वह प्रभावी तारीख आने से पहले अपना निर्णय वापस ले सकता है।
हाईकोर्ट ने कहा कि वर्तमान मामले में कर्मचारी ने स्वैच्छिक रिटायरमेंट की तारीख आने से पहले उसे बढ़ाने का आवेदन दिया था और इसके बाद स्वैच्छिक रिटायरमेंट वापस लेने का अनुरोध भी किया। ऐसे में उसे रिटायर नहीं किया जाना चाहिए।
अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल इसलिए कर्मचारी के आवेदन को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि उसने अपने पत्र में स्पष्ट रूप से 'वापस लेने' शब्द का इस्तेमाल नहीं किया। जब उसके पत्र से साफ था कि वह पहले से तय तारीख पर रिटायर नहीं होना चाहता, तो उसके अनुरोध पर विचार करना जरूरी है।
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने माना कि सिंगल जज ने रिटायरमेंट आदेश रद्द करके सही किया। हालांकि, रिटायरमेंट और बहाली के बीच की अवधि को सेवा में निरंतरता देने की मांग पर अदालत ने राज्य सरकार की दलील स्वीकार की।
पीठ ने कहा कि कर्मचारी ने एकल जज के समक्ष अपनी याचिका में ऐसी राहत नहीं मांगी थी। इसके बाद अदालत ने मामले का निपटारा किया।