राजस्थान हाईकोर्ट ने पहले खुले कारागार शिविर में रात के निरीक्षण के दौरान बिना अनुमति अनुपस्थित पाए जाने के कारण जेल वापस भेजे गए कैदी को तीसरी नियमित पैरोल मंजूर की। कोर्ट ने कैदी की लंबे समय से हिरासत, पहली और दूसरी पैरोल के दौरान संतोषजनक आचरण, तय समय पर जेल लौटने और संबंधित विभागों की अनुकूल रिपोर्टों को ध्यान में रखते हुए यह राहत दी।

जस्टिस विनीत कुमार माथुर और जस्टिस चंद्रशेखर शर्मा की खंडपीठ ने कैदी की याचिका स्वीकार करते हुए जिला पैरोल सलाहकार समिति का वह आदेश रद्द किया, जिसके तहत उसकी तीसरी पैरोल की मांग खारिज कर दी गई।

मामले के अनुसार, याचिकाकर्ता जोधपुर केंद्रीय जेल में बंद है। उसने 40 दिनों की तीसरी नियमित पैरोल के लिए आवेदन किया। जिला पैरोल सलाहकार समिति ने पूर्व में खुले कारागार शिविर में रात के निरीक्षण के दौरान उसकी अनधिकृत अनुपस्थिति को आधार बनाकर आवेदन खारिज किया। इस घटना के बाद उसे वापस जेल भेज दिया गया।

याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि पहली और दूसरी नियमित पैरोल के दौरान उसने निर्धारित समय सीमा के भीतर आत्मसमर्पण किया और उसका आचरण भी संतोषजनक पाया गया। इसके अतिरिक्त, जिला परिवीक्षा एवं कारागार कल्याण अधिकारी तथा सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग ने भी पैरोल देने के पक्ष में रिपोर्ट दी थी। कोटा के पुलिस अधीक्षक की ओर से भी कोई आपत्ति नहीं जताई गई।

मामले के रिकॉर्ड और दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने परिस्थितियों की समग्रता को ध्यान में रखते हुए पैरोल देने का फैसला किया। कोर्ट ने निर्देश दिया कि कैदी को व्यक्तिगत मुचलका और जमानतदारों की जमानत प्रस्तुत करने पर पैरोल पर रिहा किया जाए।

हाईकोर्ट ने संबंधित जेल प्राधिकरण को यह स्वतंत्रता भी दी कि वह पैरोल की अवधि समाप्त होने के बाद कैदी की जेल वापसी सुनिश्चित करने के लिए उचित और तर्कसंगत अतिरिक्त शर्तें लगा सकता है।


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