बच्चे के सर्वांगीण विकास के लिए मां की देखभाल अनिवार्य: पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने 6 साल की बच्ची की कस्टडी मां को सौंपी
पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने छह साल छह महीने की बच्ची की कस्टडी उसकी मां को सौंपने का आदेश दिया। बच्ची अक्टूबर 2025 से अपने पिता के परिवार के पास रह रही है। हाईकोर्ट ने कहा कि कम उम्र के बच्चे की कस्टडी आम तौर पर मां के पास होनी चाहिए, क्योंकि इस उम्र में बच्चे को उसके स्नेह, पालन-पोषण और देखभाल की विशेष जरूरत होती है।
जस्टिस सुमीत गोयल ने कहा,
“कम उम्र के नाबालिग बच्चे की कस्टडी सामान्यतः मां के पास होनी चाहिए। यह एक स्थापित सिद्धांत है कि इतनी कम उम्र के बच्चों को मां के स्नेह, पालन-पोषण और देखभाल की आवश्यकता होती है, जो उनके सर्वांगीण विकास के लिए अनिवार्य हैं।”
हाईकोर्ट संविधान के अनुच्छेद 226 और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 528 के तहत दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई कर रहा था। याचिकाकर्ता मां ने अपनी नाबालिग बेटी को अदालत के समक्ष पेश करने और अपने ससुराल पक्ष के लोगों से उसकी कस्टडी वापस दिलाने की मांग की थी।
याचिकाकर्ता की शादी दिसंबर 2014 में हुई और मार्च 2020 में बच्ची का जन्म हुआ। उसका पति नौकरी के सिलसिले में कुवैत चला गया और वहीं बस गया, जबकि याचिकाकर्ता अपने ससुराल में रह रही थी।
मां ने आरोप लगाया कि पति की अनुपस्थिति में उसके ससुराल पक्ष के एक रिश्तेदार ने उसे अनुचित मैसेज भेजे, उसके साथ अवांछित नजदीकियां बढ़ाने की कोशिश की और एक बार उसके साथ छेड़छाड़ करने का प्रयास भी किया। याचिका के अनुसार, जब उसने इस बारे में ससुराल वालों को बताया तो उन्होंने उसे चुप रहने के लिए कहा।
याचिकाकर्ता 4 अक्टूबर 2025 को अपनी बेटी के साथ ससुराल से निकल गई। उसने आरोप लगाया कि रास्ते में निजी प्रतिवादियों ने उससे बच्ची छीन ली, जिसके बाद उसे अकेले अपने मायके जाना पड़ा। उसका कहना था कि पुलिस में शिकायत देने के बावजूद कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई। उसके माता-पिता की ओर से बुलाई गई पंचायत भी बच्ची को वापस दिलाने में नाकाम रही।
मां ने आगे आरोप लगाया कि प्रतिवादियों में शामिल एक विवाहित महिला, जिसने पहले ही अपने भाई के बच्चे को गोद लिया हुआ था ने प्रभावी रूप से उसकी बेटी की कस्टडी अपने पास रख ली। याचिका लंबित रहने के दौरान पक्षकारों को हाईकोर्ट के मध्यस्थता एवं सुलह केंद्र भेजा गया, लेकिन मध्यस्थता की कोशिशें सफल नहीं हुईं।
याचिकाकर्ता की ओर से पेश सीनियर वकील ने दलील दी कि बच्ची को उसके विकास के महत्वपूर्ण चरण में मां की देखभाल से वंचित किया जा रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि प्रतिवादियों का आचरण हिंदू अल्पसंख्यकता और संरक्षकता अधिनियम, 1956 के प्रावधानों के विपरीत है, जो नाबालिग बच्चे की कस्टडी के मामले में मां को प्राथमिकता देने का आधार प्रदान करता है।
निजी प्रतिवादियों ने याचिका को गलत आधार पर दायर बताते हुए आरोपों को झूठा और बाद में गढ़ा गया करार दिया। उनका कहना था कि याचिकाकर्ता ने स्वेच्छा से ससुराल छोड़ा था और बच्ची की देखभाल उसके दादा-दादी उचित तरीके से कर रहे हैं। उनके अनुसार, इसे अवैध हिरासत नहीं कहा जा सकता। उन्होंने यह भी दलील दी कि पुलिस जांच में संबंधित रिश्तेदार के खिलाफ लगाए गए आरोप झूठे और निराधार पाए गए। राज्य सरकार ने कहा कि बच्ची की कस्टडी के विवाद में वह किसी पक्ष की भूमिका में नहीं है।
जस्टिस गोयल ने हाईकोर्ट के पिछले फैसले वीरपाल कौर बनाम पंजाब राज्य (2025:PHHC:113490) पर भरोसा किया। इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न निर्णयों का हवाला देते हुए कहा गया था कि बच्चों की कस्टडी से जुड़े मामलों में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर राहत देने के लिए सामान्यतः यह दिखाना जरूरी है कि हिरासत स्पष्ट रूप से अवैध है। हालांकि, बच्चे के हित में इस शर्त में छूट दी जा सकती है।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि बंदी प्रत्यक्षीकरण की कार्यवाही संरक्षकता संबंधी कानूनों के तहत होने वाली नियमित कार्यवाही का विकल्प नहीं है।
हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में बच्चे का कल्याण सर्वोपरि होता है और अदालत उसके हितों की रक्षा के लिए पैरेंस पैट्रिए यानी अभिभावक-संरक्षक के रूप में अपनी भूमिका निभा सकती है।
अदालत ने रिकॉर्ड पर मौजूद जन्म प्रमाणपत्र का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रथम दृष्टया इससे याचिकाकर्ता का बच्ची की मां होना स्थापित होता है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि निजी प्रतिवादियों के खिलाफ लगाए गए आरोपों को इस स्तर पर साबित हुआ नहीं माना जा रहा है। हालांकि, इन आरोपों और बच्ची को उसकी मां से अलग किए जाने की परिस्थितियों ने ऐसी चिंता पैदा की, जिसे फिलहाल नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
पीठ ने कहा कि कस्टडी के विवाद का फैसला केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि संबंधित व्यक्ति माता-पिता है या कोई रिश्तेदार। इसमें बच्चे की सुरक्षा, उसके और संभावित अभिभावक के बीच संबंध तथा उसे स्थिर और स्नेहपूर्ण वातावरण देने की क्षमता जैसे पहलुओं पर विचार करना जरूरी है।
अदालत ने यह भी कहा कि स्थायी कस्टडी का फैसला करने के लिए सक्षम अदालत द्वारा अधिक व्यापक जांच और मूल्यांकन की आवश्यकता होती है। हालांकि, वैकल्पिक कानूनी उपाय उपलब्ध होने मात्र से हाईकोर्ट के असाधारण अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल अपने आप प्रतिबंधित नहीं हो जाता।
हाईकोर्ट ने ध्यान दिया कि बच्ची की उम्र छह साल छह महीने है। याचिकाकर्ता मां के सामने कोई स्पष्ट आर्थिक अभाव दिखाई नहीं देता और निजी प्रतिवादी भी ऐसा कोई तथ्य पेश नहीं कर सके, जिससे यह साबित हो कि मां बच्ची की उचित देखभाल करने में सक्षम नहीं है।
इन परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने कहा कि फिलहाल बच्ची की कस्टडी मां के पास ही होनी चाहिए। हाईकोर्ट ने याचिका का निपटारा करते हुए निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता मां अपनी बेटी की कस्टडी पाने की हकदार है।