भगवंत मान के फ्रांस दौरे को मंजूरी नहीं देने पर पंजाब सरकार हाईकोर्ट पहुंची, केंद्र के फैसले को दी चुनौती
पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान के फ्रांस दौरे को केंद्र सरकार की ओर से राजनीतिक मंजूरी नहीं दिए जाने का मामला पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट पहुंच गया।
पंजाब सरकार ने विदेश मंत्रालय के फैसले को चुनौती देते हुए आरोप लगाया कि आवेदन को बिना कोई कारण बताए खारिज कर दिया गया। राज्य सरकार के मुताबिक, मुख्यमंत्री भगवंत मान, मुख्य सचिव केएपी सिन्हा और मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव रवि भगत को 15 से 21 अक्टूबर 2026 तक फ्रांस जाना है।
इस दौरे का उद्देश्य पंजाब के कृषि उत्पादों और राज्य के कारोबार को अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ावा देना है।
जस्टिस त्रिभुवन दहिया ने मामले की सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार से जवाब मांगा।
पंजाब सरकार की ओर से पेश सीनियर वकील और एडिशनल एडवोकेट जरनल चंचल सिंगला ने आरोप लगाया कि केंद्र पंजाब के साथ भेदभाव कर रहा है।
उन्होंने दलील दी कि हरियाणा के मुख्यमंत्री, जो भाजपा से हैं, को हाल ही में विदेश दौरे की अनुमति दी गई थी, जबकि पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार के प्रतिनिधिमंडल को मंजूरी नहीं दी गई।
पंजाब सरकार की याचिका के अनुसार, यह दौरा पेरिस में आयोजित होने वाले अंतरराष्ट्रीय खाद्य व्यापार मेले 'सियाल पेरिस 2026' के मद्देनजर प्रस्तावित है। यह मेला 17 से 21 अक्टूबर तक पेरिस नॉर्ड विलेपेंट में आयोजित होना है और हर दो साल में होता है।
राज्य की प्रमुख सहकारी विपणन संस्था मार्कफेड को भारत सरकार के वाणिज्य मंत्रालय के अधीन वैधानिक संस्था कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एपीडा) के इंडिया पवेलियन में एक स्टॉल आवंटित किया गया।
याचिका के मुताबिक, एपीडा ने 3 सितंबर 2026 को स्टॉल की पुष्टि की थी और पूरे दौरे का खर्च मार्कफेड को उठाना है।
पंजाब सरकार ने बताया कि राज्य के कार्मिक विभाग ने 2 सितंबर को दोनों अधिकारियों को कैडर संबंधी मंजूरी दी। इसके बाद सहकारिता विभाग ने 3 और 8 सितंबर को विदेश मंत्रालय को पत्र लिखकर दौरे के लिए जल्द अनुमति मांगी। राज्य ने 9 सितंबर को, प्रस्तावित यात्रा से 36 दिन पहले, राजनीतिक मंजूरी के लिए ऑनलाइन आवेदन किया।
याचिका में कहा गया कि आवेदन में दौरे का उद्देश्य 'व्यापार को बढ़ावा देना' बताया गया। इसमें यह भी स्पष्ट किया गया कि भारतीय मिशन से परामर्श किया जा चुका है, लेकिन वह राज्य के विशिष्ट हितों का प्रतिनिधित्व करने के लिए पंजाब सरकार का विकल्प नहीं बन सकता।
प्रस्तावित कार्यक्रम में पंजाबी और भारतीय प्रवासियों से मुलाकात, व्यापार मेले के उद्घाटन में भागीदारी, मार्कफेड के स्टॉल का दौरा, व्यापारिक संगठनों, वाणिज्य मंडलों, आयातकों और निवेशकों के साथ बैठकें तथा फ्रांस में भारतीय राजदूत से मुलाकात शामिल थी।
पंजाब सरकार का आरोप है कि विदेश मंत्रालय ने न तो आवेदन पर कोई स्पष्टीकरण मांगा, न ही किसी कमी की जानकारी दी और न ही राज्य के पत्रों का जवाब दिया। इसके बजाय, मंत्रालय के ई-पॉलिटिकल क्लीयरेंस पोर्टल पर आवेदन के सामने सीधे 'अस्वीकृत' दर्ज कर दिया गया।
याचिका में कहा गया कि राजनीतिक मंजूरी की व्यवस्था का उद्देश्य केंद्र और राज्यों के बीच समन्वय होना चाहिए, लेकिन इसका इस्तेमाल राज्य सरकार के कार्यकारी अधिकारों पर वीटो लगाने के लिए नहीं किया जा सकता।
पंजाब सरकार के अनुसार, राजनीतिक मंजूरी की अनिवार्यता संसद के किसी कानून से नहीं, बल्कि कैबिनेट सचिवालय और विदेश मंत्रालय के कार्यालयी ज्ञापनों तथा निर्देशों से आती है।
राज्य सरकार का तर्क है कि इन निर्देशों में मंजूरी देने या खारिज करने के स्पष्ट मानदंड नहीं हैं। न ही निर्णय लेने की समयसीमा, अस्वीकृति के कारण बताने की बाध्यता या फैसले के खिलाफ अपील और पुनर्विचार की कोई व्यवस्था निर्धारित है।
याचिका में सुप्रीम कोर्ट के मोहिंदर सिंह गिल बनाम मुख्य चुनाव आयुक्त और क्रांति एसोसिएट्स बनाम मसूद अहमद खान के फैसलों का हवाला देते हुए कहा गया है कि किसी व्यक्ति या पक्ष को प्रभावित करने वाले फैसले में कारण स्पष्ट होने चाहिए। बाद में जवाब दाखिल करते समय नए कारण जोड़कर मूल फैसले की कमी दूर नहीं की जा सकती।
पंजाब सरकार ने सतवंत सिंह सावनी बनाम डी. रामारत्नम मामले का उल्लेख करते हुए दलील दी कि किसी व्यक्ति के अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाली कार्यकारी कार्रवाई के पीछे कानूनी अधिकार होना चाहिए।
याचिका में विदेश यात्रा के अधिकार को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का हिस्सा भी बताया गया।
पंजाब सरकार का कहना है कि किसानों की उपज और राज्य की सहकारी संस्था के उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ावा देना राज्य के कार्यकारी अधिकारों के दायरे में आता है। इसके लिए संविधान के अनुच्छेद 162 और राज्य सूची में कृषि, उद्योग, राज्य के भीतर व्यापार-वाणिज्य, वस्तुओं के उत्पादन एवं वितरण तथा सहकारी समितियों से संबंधित विषयों का हवाला दिया गया।
याचिका में तर्क दिया गया कि संविधान का अनुच्छेद 73 केंद्र की कार्यकारी शक्तियों की सीमा तय करता है। राज्य सरकार के मुताबिक, यह दौरा किसी अंतरराष्ट्रीय संधि से संबंधित नहीं था, न ही पंजाब सरकार विदेश नीति संचालित कर रही थी या आयात-निर्यात को नियंत्रित करने का प्रयास कर रही थी। इसलिए केंद्र की विदेश मामलों और विदेशी देशों के साथ व्यापार से जुड़ी शक्तियों के आधार पर इस दौरे को रोकना उचित नहीं है।
संघीय ढांचे के मुद्दे पर याचिका में डॉ. बीआर आंबेडकर के 25 नवंबर 1949 के संविधान सभा में दिए गए भाषण और सुप्रीम कोर्ट के एसआर बोम्मई बनाम भारत संघ तथा दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र सरकार बनाम भारत संघ के 2023 के फैसले का भी उल्लेख किया गया।
पंजाब सरकार का कहना है कि संघीय व्यवस्था संविधान की मूल संरचना का हिस्सा है और केंद्र को राज्यों के संवैधानिक अधिकारों का सम्मान करना चाहिए।
याचिका के अनुसार, यदि केंद्र को दिल्ली की निर्वाचित सरकार के मामले में भी संवैधानिक सीमाओं का पालन करना है, तो पूर्ण राज्य पंजाब के मामले में यह सिद्धांत और अधिक मजबूती से लागू होता है।
राज्य सरकार ने मनेका गांधी बनाम भारत संघ के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि इस मामले में राजनीतिक मंजूरी देने के पक्ष में सभी प्रासंगिक परिस्थितियां मौजूद थीं।
आवेदन विदेश मंत्रालय के निर्देशों में निर्धारित तीन सप्ताह की अवधि से काफी पहले, करीब छह सप्ताह पहले दाखिल किया गया। भारतीय मिशन से परामर्श किया गया, राज्य स्तर की सभी आवश्यक मंजूरियां मिल चुकी थीं और मार्कफेड को केंद्र सरकार की संस्था एपीडा के इंडिया पवेलियन में स्टॉल भी आवंटित किया गया।
याचिका में यह भी आरोप लगाया गया कि विदेश नीति से जुड़े हितों की रक्षा के लिए बनाई गई शक्ति का इस्तेमाल राज्य को अपने किसानों की उपज का प्रचार करने से रोकने के लिए किया गया। पंजाब सरकार ने इसे अधिकारों के अनुचित इस्तेमाल का मामला बताते हुए केंद्र के फैसले को चुनौती दी।
हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार से जवाब मांगा।
अब मामले में केंद्र का पक्ष सामने आने के बाद अदालत आगे की सुनवाई में राजनीतिक मंजूरी खारिज करने के फैसले और राज्य सरकार की दलीलों पर विचार करेगी।