कम उम्र का अंतर, सहमति के संकेत और अपील में देरी: POCSO में दोषी नाबालिग की सजा पर पंजाब-हरियाणा हाइकोर्ट की रोक
पंजाब एंड हरियाणा हाइकोर्ट ने POCSO Act के तहत दोषी ठहराए गए नाबालिग आरोपी की सजा पर अपील लंबित रहने तक रोक लगाई।
हाइकोर्ट ने यह अहम टिप्पणी की कि मामले में आरोपी और पीड़िता दोनों ही नाबालिग थे उनके बीच उम्र का अंतर बहुत अधिक नहीं था और अपील की सुनवाई निकट भविष्य में होने की संभावना नहीं है।
जस्टिस अनूप चितकारा और जस्टिस सुखविंदर कौर शामिल की डिवीजन बेंच ने कहा,
“आरोपों के विश्लेषण से यह संकेत मिलता है कि यदि सहवास हुआ भी तो वह सहमति से था, ऐसा कोई आरोप नहीं है कि आरोपी ने क्रूरता बरती हो, पीड़िता के शरीर पर चोटों का अभाव है ये सभी ऐसे पहलू हैं, जिनका साक्ष्यों के गहन विश्लेषण के साथ मूल्यांकन किया जाना आवश्यक है। हालांकि आरोपी के लिए मूल कानूनी बाधा यह है कि लड़की 18 वर्ष से कम आयु की थी और कानूनन सहमति नहीं दे सकती। भले ही सहमति दी गई हो यह कृत्य BNS 2023 की धारा 63 तथा POCSO Act 2012 की धाराओं 3 और/या 5 के तहत वैधानिक बलात्कार माना जाएगा। संभव है कि न तो लड़का और न ही लड़की इन संप्रभु प्रतिबंधों से अवगत रहे हों।”
हाइकोर्ट ने आगे स्पष्ट किया,
“जब लड़के और लड़की के बीच उम्र का अंतर बहुत कम हो और सहवास के सभी संकेत सहमति की ओर इशारा करते हों तो न्याय का विशाल तराजू कानून और जमीनी हकीकत के बीच संतुलन बनाने की ओर झुकता है।”
बेंच ने इस तथ्य पर भी ध्यान दिलाया कि कथित घटना फरवरी 2023 की, जबकि FIR मार्च 2023 के दूसरे पखवाड़े में दर्ज की गई।
पीड़िता के अनुसार उसने उस समय घटना की रिपोर्ट नहीं की थी। शिकायत तब सामने आई जब पीड़िता के मामा ने उसे आरोपी और सह-आरोपी के साथ देखा।
अदालत ने कहा कि यदि मामा ने उन्हें साथ न देखा होता तो संभवतः पुलिस में शिकायत दर्ज ही नहीं होती।
हाइकोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि आरोपी स्वयं नाबालिग था और उसके खिलाफ कोई पूर्व आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है।
बेंच ने कहा,
“आवेदक प्रथम अपराधी है और उसके वकील के माध्यम से यह आश्वासन दिया गया कि वह पीड़िता को कोई नुकसान नहीं पहुंचाएगा। यद्यपि अपराध गंभीर श्रेणी में आता है। फिर भी अदालत इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं कर सकती कि आवेदक के आपराधिक पूर्ववृत्त साफ हैं।”
अदालत ने माना कि आरोपी एक युवा लड़का है जो कौशल विकास के प्रारंभिक वर्षों में है और इन परिस्थितियों में उसे रोजगारोन्मुखी शिक्षा से वंचित नहीं किया जाना चाहिए।
यह आदेश BNSS की धारा 430 के तहत दायर उस आवेदन पर पारित किया गया जिसमें अपील लंबित रहने तक सजा निलंबित करने की मांग की गई थी। सेशन कोर्ट पटियाला ने आरोपी को IPC की धाराओं 363, 366, 120बी और POCSO Act की धारा 4 के तहत दोषी ठहराते हुए 20 वर्ष की सजा सुनाई थी। सह-आरोपी को साजिश के लिए पांच वर्ष की सजा दी गई। घटना के समय आरोपी की उम्र 17 वर्ष 5 माह और पीड़िता की उम्र लगभग 13 वर्ष 10 माह थी यानी दोनों के बीच करीब चार वर्ष का अंतर था। आरोपी लगभग छह माह तक हिरासत में रह चुका था।
हाइकोर्ट ने सजा निलंबन के लिए सह-आरोपी के आधार पर समानता (पैरिटी) के तर्क को खारिज करते हुए कहा कि जब सजा की प्रकृति और अवधि में बड़ा अंतर हो तो समानता का दावा नहीं किया जा सकता।
अदालत ने यह भी कहा कि उसके समक्ष हत्या और डकैती जैसे गंभीर मामलों की बड़ी संख्या लंबित है, जिन्हें प्राथमिकता दी जाती है। ऐसे में इस मामले की अपील के शीघ्र सुनवाई की संभावना नहीं है। बेंच ने टिप्पणी की कि निर्णय में देरी भी सजा में राहत या कम्यूटेशन का आधार बन सकती है।
इन सभी परिस्थितियों को देखते हुए और मामले के गुण-दोष पर कोई अंतिम टिप्पणी किए बिना हाइकोर्ट ने आरोपी की सजा को अपील लंबित रहने तक निलंबित कर दिया। यह राहत 25,000 के जमानती बॉन्ड और एक जमानतदार की शर्त पर दी गई।
सजा निलंबन को कड़ी शर्तों से जोड़ा गया। आरोपी को पीड़िता या उसके परिवार से किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप करने से रोका गया। उसे अपना पता और संपर्क विवरण नियमित रूप से अपडेट रखना होगा तथा यदि उसके पास कोई हथियार या लाइसेंस है तो उसे तुरंत समर्पित करना होगा।
अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी नए गंभीर गैर-जमानती अपराध की स्थिति में सजा निलंबन स्वतः रद्द हो जाएगा।