पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने हरियाणा में लीगल एड डिफेंस काउंसिल (LADC) के वकीलों की ओर से दायर दो याचिकाएं खारिज कीं। याचिकाओं में 30 सितंबर 2026 से उनकी संविदात्मक नियुक्तियां समाप्त करने के फैसले को चुनौती दी गई, जबकि उनके अनुबंधों की अवधि 31 मार्च 2027 तक बढ़ाई गई।

जस्टिस निधि गुप्ता ने कहा कि याचिकाकर्ताओं की नियुक्तियां पूरी तरह संविदात्मक थीं और उन्हें सेवा में बने रहने की मांग करने का कोई निहित अधिकार प्राप्त नहीं था। अदालत ने गौर किया कि नियुक्ति पत्र और सेवा विस्तार पत्र, दोनों में यह शर्त थी कि एक महीने का नोटिस देकर या नोटिस अवधि के बदले एक महीने का मानदेय देकर अनुबंध कभी भी समाप्त किया जा सकता है।

हाईकोर्ट ने दोनों याचिकाओं का निपटारा एक साझा आदेश से किया। दूसरी याचिका में याचिकाकर्ता रोहतक जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA) में चीफ और डिप्टी चीफ लीगल एड डिफेंस काउंसिल के रूप में कार्यरत थे।

याचिकाकर्ताओं की नियुक्तियां संबंधित जिला विधिक सेवा प्राधिकरणों ने संशोधित लीगल एड डिफेंस काउंसिल योजना, 2022 के तहत अनुबंध के आधार पर की थीं। नियुक्ति की शर्तों के खंड (एफ) के अनुसार, दोनों पक्षों में से कोई भी एक महीने का नोटिस देकर या उसके बदले एक महीने का रिटेनरशिप शुल्क अदा करके अनुबंध समाप्त कर सकता था।

याचिकाकर्ताओं के अनुबंध 31 मार्च 2027 तक बढ़ा दिए गए। इस बीच, राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) ने निर्देश दिया कि पंजाब, हरियाणा और केंद्र शासित प्रदेश चंडीगढ़ में LADC के अनुबंध सितंबर 2026 से आगे न बढ़ाए जाएं।

इसके बाद याचिकाकर्ताओं की नियुक्तियां 30 सितंबर 2026 से समाप्त करने के नोटिस जारी किए गए। बाद में इन नोटिसों को वापस ले लिया गया। हालांकि, 24 सितंबर 2026 को नोटिस वापस लेने के फैसले को भी वापस ले लिया गया, जिससे पहले जारी किए गए समाप्ति नोटिस फिर प्रभावी हो गए।

याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि 27 अगस्त 2026 का नोटिस वापस लिए जाने के बाद खंड (एफ) के तहत नए सिरे से एक महीने का नोटिस देना अनिवार्य है। उनका कहना था कि NALSA के अनुबंधों का नवीनीकरण नहीं करने संबंधी निर्देश को किसी अलग कानूनी कार्रवाई के बिना मार्च 2027 तक पहले ही दिए गए सेवा विस्तार को पिछली तारीख से रद्द करने का आधार नहीं बनाया जा सकता। उन्होंने तर्क दिया कि अनुबंध की अवधि पूरी होने पर उसका नवीनीकरण न करना और अवधि समाप्त होने से पहले उसे खत्म करना दो अलग-अलग कार्रवाइयां हैं।

याचिकाकर्ताओं ने प्राधिकरण के रुख को असंगत बताते हुए कहा कि इससे संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन हुआ। उनके अनुसार, पहले अनुबंध बढ़ाए गए, फिर समाप्ति के नोटिस जारी किए गए, उसके बाद काउंसिल को काम जारी रखने का भरोसा देते हुए नोटिस वापस लिए गए और महज पांच दिन बाद उन्हें फिर प्रभावी कर दिया गया।

उन्होंने यह भी दलील दी कि केवल उन्हीं काउंसिल की सेवाएं समाप्त की जा सकती थीं, जिनके अनुबंध सितंबर 2026 में समाप्त हो रहे थे। जिनकी नियुक्ति मार्च 2027 तक थी, उन्हें बीच में हटाना उचित नहीं था।

राज्य सरकार ने अग्रिम नोटिस पर पेश होकर कहा कि नियुक्तियां पूरी तरह संविदात्मक थीं। उसने यह भी तर्क दिया कि 2022 की योजना के तहत उनकी सेवाएं बिना पूर्व नोटिस के किसी भी समय समाप्त की जा सकती हैं।

हाईकोर्ट ने इस दलील को खारिज कर दिया कि नियुक्ति की शर्तों के खंड (एफ) का पालन नहीं किया गया। अदालत ने कहा कि 27 अगस्त 2026 का नोटिस स्पष्ट रूप से इसी खंड के अनुपालन में जारी किया गया और इसमें एक महीने का अग्रिम नोटिस दिया गया।

नए नोटिस की आवश्यकता संबंधी दलील पर अदालत ने 19 सितंबर 2026 के पत्र की भाषा पर भरोसा किया। उस पत्र में नोटिस को फिलहाल वापस लेने और सक्षम प्राधिकारी के अगले आदेश तक अस्थायी रूप से स्थगित रखने की बात कही गई।

हाईकोर्ट ने कहा,

“उपरोक्त पत्र को पढ़ने से यह स्पष्ट है कि 27 अगस्त 2026 के नोटिस को केवल फिलहाल के लिए अस्थायी रूप से वापस लिया गया, ताकि इस संबंध में सक्षम प्राधिकारी के आगे के निर्देश या आदेश प्राप्त होने तक उसे स्थगित रखा जा सके।”

अदालत के अनुसार, 24 सितंबर 2026 का पत्र प्राप्त होने के बाद मूल समाप्ति नोटिस फिर प्रभावी हो गया। इसलिए एक महीने का अग्रिम नोटिस विधिवत दिया जा चुका था और नए नोटिस की कोई आवश्यकता नहीं थी।

हाईकोर्ट ने इस दलील को भी स्वीकार नहीं किया कि 31 मार्च 2027 तक निर्धारित कार्यकाल को बीच में समाप्त नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि नियुक्ति पत्र में ही नोटिस देकर अनुबंध समाप्त करने का प्रावधान था और संबंधित काउंसिल को आवश्यक नोटिस पहले ही दिया जा चुका था।

अदालत ने याचिकाकर्ताओं की अपनी याचिका में किए गए एक स्वीकारोक्ति संबंधी कथन का भी उल्लेख किया। याचिका के आधार 19(बी) में उन्होंने स्वयं स्वीकार किया था कि खंड (एफ) के तहत 31 मार्च 2027 से पहले भी अनुबंध समाप्त किया जा सकता है। उनकी शिकायत मुख्य रूप से इस प्रावधान का इस्तेमाल किए जाने के तरीके को लेकर थी।

इन निष्कर्षों के आधार पर हाईकोर्ट ने दोनों याचिकाओं में कोई दम नहीं पाया और उन्हें खारिज किया।

गौरतलब है कि अदालत ने मामले का फैसला खंड (एफ) के अनुपालन के आधार पर किया। उसने राज्य सरकार की इस व्यापक दलील पर कोई निर्णय नहीं दिया कि 2022 की योजना के तहत बिना किसी नोटिस के भी सेवाएं समाप्त की जा सकती हैं।

अदालत ने इस प्रश्न पर भी कोई फैसला नहीं दिया कि क्या NALSA का अनुबंधों का नवीनीकरण नहीं करने संबंधी निर्देश अपने आप में पहले से जारी और प्रभावी नियुक्तियों को समाप्त करने के लिए पर्याप्त है।

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