पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने हरियाणा के स्कूल शिक्षा विभाग को निर्देश दिया कि राज्य के सभी स्कूलों में चाहे वे किसी भी बोर्ड से संबद्ध हों, सुप्रीम कोर्ट द्वारा सुखदेब साहा बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (2025) मामले में जारी छात्र सुरक्षा संबंधी दिशा-निर्देशों का पालन सुनिश्चित किया जाए।

जस्टिस मनीषा बत्रा ने निर्देश दिया कि प्रत्येक स्कूल की शिकायत निवारण व्यवस्था और आंतरिक समिति में लिंग, लैंगिक पहचान और यौन अभिरुचि के आधार पर होने वाली बदमाशी और उत्पीड़न की शिकायतों को स्पष्ट रूप से शामिल किया जाए।

यह आदेश फरीदाबाद में दसवीं कक्षा के 16 वर्षीय छात्र की मां द्वारा दायर याचिका पर आया। छात्र ने फरवरी 2022 में आत्महत्या कर ली थी। मां ने आरोप लगाया कि उसके बेटे को वर्षों तक उसकी कथित यौन अभिरुचि और लैंगिक अभिव्यक्ति के कारण सहपाठियों द्वारा प्रताड़ित किया गया, उसके साथ यौन उत्पीड़न हुआ और स्कूल ने उनकी शिकायतों पर प्रभावी कार्रवाई नहीं की।

हाईकोर्ट ने LGBTQ+ विद्यार्थियों की सुरक्षा के लिए नए दिशा-निर्देश बनाने से इनकार करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट के सुखदेब साहा मामले में जारी बाध्यकारी दिशा-निर्देश पहले से मौजूद हैं। अदालत के अनुसार, वास्तविक समस्या इन दिशा-निर्देशों के प्रभावी क्रियान्वयन की है।

पीठ ने कहा कि कागजों पर मौजूद दिशा-निर्देश संकट में फंसे बच्चे को बहुत कम सुरक्षा प्रदान करते हैं। वर्ष 2015 का सीबीएसई परिपत्र उस पूरी अवधि में लागू था, जब कथित तौर पर छात्र उत्पीड़न का सामना कर रहा था। रिकॉर्ड के अनुसार, स्कूल को उसकी मां और इलाज कर रहे मनोवैज्ञानिक ने उसकी स्थिति के बारे में जानकारी दी थी।

अदालत ने कहा कि वास्तविक मुद्दा स्कूल स्तर पर मौजूदा दिशा-निर्देशों का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित करना है।

हालांकि, हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार को याचिकाकर्ता के कुछ सुझावों पर विचार करने का निर्देश भी दिया।

पीठ ने कहा कि केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय स्कूल सुरक्षा दिशा-निर्देश तैयार कर सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को भेजे हैं। याचिकाकर्ता के सुझावों में परामर्शदाताओं और विद्यार्थियों का अनुपात, LGBTQ+ समुदाय के बच्चों से संबंधित मामलों में परामर्शदाताओं का प्रशिक्षण और पाठ्यक्रम के माध्यम से संवेदनशीलता विकसित करना शामिल है।

अदालत ने निर्देश दिया कि केंद्र सरकार इन सुझावों पर NCERT के परामर्श से विचार करे।

याचिकाकर्ता मां ने आरोप लगाया कि छठी कक्षा से ही उसके बेटे को अपमानजनक नामों से बुलाया जाता था और सहपाठियों का एक समूह स्कूल परिसर में उसके साथ बदमाशी, शारीरिक और यौन उत्पीड़न करता था। उसके बेटे को फर्जी सोशल मीडिया खातों के माध्यम से भी परेशान किया गया।

मां के अनुसार छात्र चिंता, अवसाद और घबराहट के दौरों का इलाज करा रहा था। सितंबर 2021 में एक नैदानिक मनोवैज्ञानिक ने प्रमाणित किया कि सहपाठियों द्वारा यौन उत्पीड़न और दुर्व्यवहार के कारण वह मानसिक आघात से संबंधित तनाव विकार से पीड़ित था। मनोवैज्ञानिक ने स्कूल को आवश्यक कार्रवाई करने की सलाह भी दी थी।

मां ने आरोप लगाया कि उन्होंने स्कूल की प्रधानाचार्य को ईमेल भेजकर उत्पीड़न में शामिल विद्यार्थियों के नाम बताए, लेकिन कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई।

बता दें, फरवरी 2022 में दसवीं कक्षा की बोर्ड परीक्षाओं के दौरान कथित तौर पर छात्र को पहले प्रश्नपत्र में लेखक की सुविधा उपलब्ध नहीं कराई गई। एक अन्य परीक्षा के दौरान प्रधानाध्यापिका ने कथित तौर पर उससे कहा कि मानसिक बीमारी जैसी कोई चीज नहीं होती और वह तथा उसकी मां अनुचित लाभ उठा रहे हैं।

छात्र ने 24 फरवरी 2022 को आत्महत्या कर ली। उसके द्वारा छोड़े गए नोट में कथित तौर पर स्कूल को उसकी मौत के लिए जिम्मेदार बताया गया था और प्रधानाध्यापिका तथा स्कूल के वरिष्ठ अधिकारियों के नाम लिखे गए थे।



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