पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने ट्रेन से गिरकर हुई यात्री की मौत के मामले में उसके परिवार को 8 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया। कोर्ट ने इस राशि पर दावा दायर करने की तारीख से भुगतान होने तक 9 प्रतिशत सालाना ब्याज देने का निर्देश दिया। रेलवे दावा अधिकरण ने पहले परिवार का दावा खारिज कर दिया था।

जस्टिस हरकेश मनुजा ने परिवार की अपील स्वीकार करते हुए कहा कि दावेदार 8 लाख रुपये मुआवजे और 9 प्रतिशत सालाना ब्याज के हकदार हैं। रेलवे प्रशासन को फैसले की प्रमाणित प्रति मिलने के दो महीने के भीतर राशि जमा करने या भुगतान करने का निर्देश दिया गया। तय समय में भुगतान नहीं होने पर रेलवे को 12 प्रतिशत सालाना ब्याज देना होगा।

हाईकोर्ट ने कहा कि दुर्घटना 3 जुलाई 2019 को हुई। इसलिए रेलवे दुर्घटना और अप्रिय घटनाओं के मुआवजा नियम, 1990 के नियम 3 और 1 जनवरी 2017 से लागू संशोधित अनुसूची के तहत मुआवजा तय किया जाएगा। अनुसूची के अनुसार, मृत्यु होने पर 8 लाख रुपये मुआवजा निर्धारित है।

ब्याज के मुद्दे पर कोर्ट ने यूनियन ऑफ इंडिया बनाम रीना देवी (2019) के फैसले का हवाला दिया। हाईकोर्ट ने कहा कि रेलवे प्रशासन की देनदारी उत्पन्न होने के समय से भुगतान होने तक ब्याज देय रहता है।

मृतक की दो विवाहित बेटियों को मुआवजे में हिस्सा नहीं दिया गया। कोर्ट ने कहा कि ऐसा कोई प्रमाण नहीं है, जिससे साबित हो कि वे मृतक पर निर्भर थीं। इसलिए मुआवजा मृतक की पत्नी, बेटे और माता-पिता के बीच 50:30:10:10 के अनुपात में बांटा जाएगा।

अपील लंबित रहने के दौरान अपीलकर्ता की मौत हो गई। हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि उस अपीलकर्ता के हिस्से की राशि उसकी मां को जारी की जाए, बशर्ते उत्तराधिकार कानून के अनुसार उनका अधिकार साबित हो जाए।

दावेदारों के मुताबिक, दीपक कुमार जुलाई 2019 में ऋषिकेश के पास नीलकंठ महादेव मंदिर से अपने तीन साथियों के साथ लौट रहे थे। उन्होंने ऋषिकेश से अंबाला कैंट तक अपने और दो साथियों के लिए संयुक्त टिकट खरीदा था और टिकट मनप्रीत सिंह को सौंप दिया था। चौथा साथी बाबा ईश्वर गिरि टिकट नहीं खरीद सके थे।

ट्रेन में भारी भीड़ होने के कारण सभी अलग-अलग डिब्बों में चढ़े। परिवार का आरोप था कि यात्रियों की भीड़ और अचानक झटके के कारण दीपक केसरी और बराड़ा स्टेशन के बीच ट्रेन से गिर गए। अगली सुबह उनका शव रेलवे पटरी के पास मिला। साथियों ने शव की पहचान की और टिकट राजकीय रेलवे पुलिस को सौंप दिया।

रेलवे दावा अधिकरण ने दावा खारिज करते हुए कहा था कि मृतक वास्तविक यात्री नहीं था, क्योंकि उसके पास से टिकट नहीं मिला और टिकट केवल तीन लोगों के लिए था। अधिकरण ने यह भी माना था कि मृतक ट्रेन से गिरने के बजाय ट्रेन से कुचला गया था।

हाईकोर्ट ने रीना देवी फैसले का हवाला देते हुए कहा कि मृतक के शव से रेलवे टिकट बरामद न होना अपने आप में यह मानने का पर्याप्त आधार नहीं है कि वह वास्तविक यात्री नहीं था। कोर्ट ने पाया कि टिकट 4 जुलाई 2019 को राजकीय रेलवे पुलिस के सामने पेश किया गया था और उसी दिन जब्त भी कर लिया गया। हाईकोर्ट के मुताबिक, घटना के तत्काल बाद तैयार रिकॉर्ड दावेदारों के पक्ष का समर्थन करता है और यह संभावना खारिज करता है कि टिकट बाद में कहानी बनाने के लिए पेश किया गया हो।

अधिकरण की इस टिप्पणी पर कि चार लोग एक साथ यात्रा करते हुए अलग-अलग डिब्बों में क्यों चढ़ेंगे, हाईकोर्ट ने कहा कि यह केवल अनुमान पर आधारित है। भीड़भाड़ वाली ट्रेन में जगह की कमी के कारण साथ यात्रा करने वाले लोगों का अलग-अलग डिब्बों में चढ़ना स्वाभाविक है। कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी एक साथी के पास टिकट न होने के आधार पर मृतक का दावा खारिज नहीं किया जा सकता, जब तक यह साबित न हो कि मृतक स्वयं वास्तविक यात्री नहीं था।

हाईकोर्ट ने कहा कि रेलवे अधिनियम, 1989 की धारा 124-ए के तहत देनदारी बिना गलती साबित किए लागू होती है। यह एक कल्याणकारी प्रावधान है, जिसकी व्याख्या उसके उद्देश्य को आगे बढ़ाने के तरीके से की जानी चाहिए।

हाईकोर्ट ने मृतक के ट्रेन से कुचले जाने संबंधी अधिकरण के निष्कर्ष को भी स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि मेडिकल अधिकारी ने रेलवे दुर्घटना की संभावना से इनकार नहीं किया था। ऐसे में अधिकरण मेडिकल अधिकारी की राय के स्थान पर अपनी राय नहीं रख सकता था।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ट्रेन से अचानक गिरने का अर्थ केवल मामूली चोट लगना नहीं है। चलती ट्रेन से गिरने वाले व्यक्ति को गंभीर या कुचलने जैसी चोटें भी आ सकती हैं, खासकर जब उसका शरीर पहियों या रेलवे पटरी के संपर्क में आए।

हाईकोर्ट ने यह भी ध्यान दिया कि रेलवे ने उस ट्रेन की पहचान नहीं की, जिससे कथित तौर पर मृतक कुचला गया। रेलवे ने न तो लोको पायलट, न गार्ड और न ही किसी अन्य अधिकारी को गवाही के लिए पेश किया। डिवीजनल रेलवे मैनेजर की जांच रिपोर्ट में गार्ड के इस बयान पर कि उसने किसी को गिरते नहीं देखा, कोर्ट ने कहा कि इससे केवल यह पता चलता है कि गार्ड को घटना की जानकारी नहीं थी। इससे यह साबित नहीं होता कि दुर्घटना हुई ही नहीं।

मृतक का घर केसरी में होने और शव उसी इलाके में मिलने के आधार पर अधिकरण ने जो प्रतिकूल निष्कर्ष निकाला था, उसे भी हाईकोर्ट ने गलत बताया। कोर्ट ने कहा कि रेलवे की जांच रिपोर्ट में घटनास्थल को ऐसा क्षेत्र बताया गया, जहां न तो आमतौर पर लोग रेलवे पटरी पार करते हैं और न ही वह आवासीय इलाका था।

हाईकोर्ट ने अधिकरण की इस दलील को भी अनुमान आधारित बताया कि रेलवे कर्मचारियों को रात में शव दिखाई देना चाहिए था। कोर्ट ने कहा कि यदि मृतक ट्रेन से कुचला गया होता, तो यही तर्क उस ट्रेन के चालक दल पर भी लागू होता।

अंततः हाईकोर्ट ने कहा कि अधिकरण के निष्कर्ष अनुमान और अटकलों पर आधारित थे और उन्हें कायम नहीं रखा जा सकता। कोर्ट ने माना कि दीपक कुमार की मौत रेलवे अधिनियम, 1989 की धारा 123(सी)(2) के साथ धारा 124-ए के तहत एक अप्रिय घटना में हुई।


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