सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में स्पष्ट किया कि सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) के आदेश VI नियम 17 के तहत ट्रायल शुरू होने के बाद वाद-पत्र (Plaint) में कब संशोधन किया जा सकता है। कोर्ट ने 25,000 रुपये के खर्च (Costs) की शर्त के साथ इस संशोधन की अनुमति दी।

जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की खंडपीठ ने ट्रायल कोर्ट और उड़ीसा हाईकोर्ट के उन आदेशों को रद्द करते हुए यह कानून स्पष्ट किया, जिनमें संशोधन की अनुमति देने से इनकार कर दिया गया।

आदेश VI नियम 17 के अनुसार, कोर्ट कार्यवाही के किसी भी चरण में किसी भी पक्ष को अपने अभिवचनों (Pleadings) में बदलाव या संशोधन करने की अनुमति दे सकता है। यह अनुमति उचित शर्तों पर दी जा सकती है। ऐसे सभी संशोधन किए जा सकते हैं जो पक्षों के बीच विवाद के वास्तविक मुद्दों को तय करने के लिए आवश्यक हों। हालांकि, इसमें एक शर्त यह भी है कि ट्रायल शुरू होने के बाद संशोधन के लिए कोई आवेदन तब तक स्वीकार नहीं किया जाएगा, जब तक कि कोर्ट इस निष्कर्ष पर न पहुंचे कि पूरी सावधानी बरतने के बावजूद, संबंधित पक्ष ट्रायल शुरू होने से पहले इस मुद्दे को नहीं उठा सका था।

आदेश VI नियम 17 का विश्लेषण करते हुए खंडपीठ ने कहा कि यह नियम कोर्ट को विवेकाधीन शक्ति (Discretionary Power) देता है, जिससे वह ऐसे संशोधनों की अनुमति दे सकता है, जो पक्षों के बीच विवाद के वास्तविक मुद्दों को तय करने के लिए जरूरी हों।

खंडपीठ ने आगे कहा,

"इस प्रावधान का उद्देश्य कोर्ट को पक्षों के बीच विवाद का प्रभावी और पूर्ण रूप से निपटारा करने में सक्षम बनाना है। साथ ही यह सुनिश्चित करना भी है कि कोई पक्ष बहुत देर से ऐसे मुद्दे न उठाए, जिन्हें पूरी सावधानी बरतने पर पहले ही उठाया जा सकता था।"

खंडपीठ ने यह भी कहा कि यदि ट्रायल शुरू होने के बाद संशोधन के लिए आवेदन किया जाता है तो आदेश VI नियम 17 की शर्त (Proviso) लागू होती है, जिसके तहत संबंधित पक्ष को यह दिखाना होगा कि उसने पूरी सावधानी बरती थी।

हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया,

"केवल इस आधार पर संशोधन को खारिज नहीं किया जा सकता कि इसके लिए बहुत देर से आवेदन किया गया। मुख्य सवाल यह है कि क्या अपीलकर्ताओं ने यह साबित किया कि पूरी सावधानी बरतने के बावजूद, वे उन मुद्दों को ट्रायल शुरू होने से पहले नहीं उठा सके थे, जिन्हें अब वे शामिल करना चाहते हैं।"

अदालत ने आगे स्पष्ट किया कि बाद में हुई किसी खोज के आधार पर दी गई व्याख्या को केवल चूक, असावधानी या लापरवाही नहीं माना जा सकता।

'एके गुप्ता एंड संस लिमिटेड बनाम दामोदर वैली कॉर्पोरेशन' मामले का हवाला देते हुए खंडपीठ ने उस संशोधन के बीच अंतर स्पष्ट किया, जो एक नया मामला या 'कॉज़ ऑफ़ एक्शन' (मुकदमे का आधार) खड़ा करता है। उस संशोधन के बीच जो उन्हीं तथ्यों को देखने का एक अलग या अतिरिक्त नज़रिया पेश करता है।

'अब्दुल रहमान बनाम मो. रुल्डू' मामले को दोहराते हुए खंडपीठ ने कहा,

"मांगी गई राहत (रिलीफ) के स्वरूप में बदलाव को पूरे मुकदमे के स्वरूप में बदलाव नहीं माना जाना चाहिए। संशोधन की शक्ति का इस्तेमाल पक्षों के बीच पूर्ण और उचित न्याय सुनिश्चित करने के व्यापक हित में किया जाना चाहिए।"

'रवाजीतू बिल्डर्स एंड डेवलपर्स बनाम नारायणस्वामी एंड संस' मामले का ज़िक्र करते हुए खंडपीठ ने फिर दोहराया कि अदालतें यह देखती हैं कि क्या उचित और प्रभावी न्याय के लिए संशोधन ज़रूरी है, क्या आवेदन नेक नीयती (बोना फ़ाइड) से दिया गया है या दुर्भावना (माला फ़ाइड) से, और क्या इससे दूसरे पक्ष को ऐसा नुकसान पहुंचता है, जिसकी भरपाई पैसों से नहीं की जा सकती।

अदालतें यह भी देखती हैं कि क्या संशोधन को ठुकराने से अन्याय होगा या कई मुक़दमे खड़े हो जाएंगे, और क्या इससे मामले का मूल स्वरूप और चरित्र पूरी तरह बदल जाएगा। आम तौर पर अगर संशोधित दावों पर नया मुक़दमा दायर करने की अनुमति दी जाए और वह 'लिमिटेशन' (समय-सीमा) के कारण वर्जित (बार) हो, तो अदालत को ऐसे संशोधन की अनुमति नहीं देनी चाहिए।

'लाइफ इंश्योरेंस कॉर्पोरेशन बनाम संजीव बिल्डर्स' और 'अक्कीराजू पांडुरंगा राव बनाम गुनलापल्ली रंगा राव' मामलों का भी हवाला दिया गया। इसमें दोहराया गया कि संशोधनों को लेकर अदालत का नज़रिया उदार होना चाहिए। अदालत को "अत्यधिक तकनीकी (हाइपर-टेक्निकल) दृष्टिकोण से बचना चाहिए और आमतौर पर उदार होना चाहिए, ख़ासकर तब जब दूसरे पक्ष को हर्जाने या खर्च (कॉस्ट) के ज़रिए मुआवज़ा दिया जा सकता हो।"

'लिमिटेशन' (समय-सीमा) के संबंध में अदालत ने कहा कि अगर कोई दावा स्पष्ट रूप से समय-सीमा के कारण वर्जित है—विशेषकर ऐसा दावा जिसे शामिल करने से दूसरे पक्ष को मिला कोई अधिकार छिन जाए—तो यह एक महत्वपूर्ण पहलू है। लेकिन, जहां 'लिमिटेशन' का सवाल "अपने आप में बहस का विषय हो और विवादित तथ्यों पर निर्भर करता हो" (जैसे कि वादी को किसी दस्तावेज़ या लेन-देन के बारे में कब और कैसे पता चला), तो ऐसे मामले में संशोधन के आवेदन को शुरुआत में ही खारिज करना ज़रूरी नहीं है।

इसमें 'संपत कुमार बनाम अय्याकन्नु' मामले का भी हवाला दिया गया, जिसमें यह तय किया गया कि केवल देरी होना ही किसी अनुरोध को अस्वीकार करने का आधार नहीं हो सकता। साथ ही 'पंकजा बनाम येल्लप्पा' मामले का भी जिक्र किया गया, जिसमें यह माना गया कि ऐसा कोई कठोर नियम नहीं है कि किसी संशोधन (Amendment) को केवल इसलिए खारिज कर दिया जाए, क्योंकि मांगी गई राहत 'टाइम-बार्ड' (समय सीमा से बाहर) होने का दावा किया गया।

अदालत ने यह भी कहा कि संशोधन के चरण में उसका मुख्य सरोकार "संशोधन की अनुमति देने" से है, न कि उन राहतों के गुण-दोष या उनकी कानूनी स्वीकार्यता (Maintainability) से, जिन्हें शामिल करने की मांग की गई है। ऐसे आपत्तियों पर तब तक अंतिम फैसला नहीं लिया जा सकता, जब तक कि प्रस्तावित दावा कानूनन स्पष्ट रूप से वर्जित (Barred) न हो। प्रतिवादी पक्ष के पास यह छूट बनी रहती है कि वह ट्रायल कोर्ट के समक्ष इन आपत्तियों को उठा सके।

अदालत ने स्पष्ट किया कि नए तथ्य या दलीलें (Pleadings) पेश करना संशोधन को अस्वीकार करने का आधार नहीं हो सकता। प्रतिवादियों को मुख्य रूप से उन अतिरिक्त तथ्यात्मक और कानूनी मुद्दों का सामना करना पड़ सकता है जो इस संशोधन से पैदा होंगे।

अदालत ने कहा,

"प्रतिवादियों को एक अतिरिक्त लिखित बयान (Written Statement) दाखिल करने की अनुमति देकर और जरूरत पड़ने पर उचित हर्जाना (Costs) लगाकर इस समस्या का समाधान किया जा सकता है।"

उपरोक्त बातों को ध्यान में रखते हुए अदालत ने कहा कि यदि संशोधन को अस्वीकार कर दिया जाता है, तो एक ही संपत्ति से जुड़ा विवाद अलग-अलग कानूनी कार्यवाही में बंट सकता है। इससे "एक ही जमीन के टुकड़े को लेकर अलग-अलग फैसलों (Inconsistent Findings) के आने की संभावना" बन सकती है। इस तरह की जटिलता से बचना और साथ ही प्रतिवादियों को यह अधिकार देना कि वे संशोधित दलीलों का हर आधार पर विरोध कर सकें, एक महत्वपूर्ण विचार था। काफी देरी होने के बावजूद, अदालत ने हर्जाने (Costs) की शर्त के साथ संशोधन की अनुमति देना ही उचित समझा।

अदालत ने कहा,

"साथ ही संशोधन की मांग करने में हुई काफी देरी और इससे प्रतिवादियों को होने वाली असुविधा को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसलिए उचित कदम यह है कि हर्जाने (Costs) की शर्त के साथ संशोधन की अनुमति दी जाए। साथ ही प्रतिवादियों को यह अधिकार दिया जाए कि वे अपनी अतिरिक्त दलीलें (Pleadings) दाखिल कर सकें और कानून के तहत उपलब्ध सभी आपत्तियां उठा सकें।"

हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि संशोधन की अनुमति देने का मतलब यह नहीं है कि उसमें शामिल किए गए दावों को स्वीकार कर लिया गया। न ही इससे अपीलकर्ताओं को कोई कानूनी अधिकार या घोषणा (Substantive Right) मिल जाती है। मामले की स्वीकार्यता (Maintainability), समय सीमा (Limitation) और दावों के गुण-दोष पर कानून के अनुसार फैसला लेने का अधिकार ट्रायल कोर्ट के पास ही सुरक्षित रहता है।

उपर्युक्त मामले में ट्रायल कोर्ट और उड़ीसा हाईकोर्ट के उन आदेशों को रद्द कर दिया गया, जिनमें संशोधन की अनुमति देने से इनकार किया गया, और 25,000 रुपये के खर्च (कॉस्ट) की शर्त पर संशोधन की अनुमति दी गई।

Case Title : Haramani Sahoo & Others v Lalita Nayak & Others

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