दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग की मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के खिलाफ हुए प्रदर्शनों से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को अहम निर्देश दिए।

कोर्ट ने पुलिस से पिछले दो सप्ताह के दौरान सार्वजनिक सभाओं और प्रदर्शनों पर रोक लगाने के लिए भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 163 के तहत जारी प्रतिबंधात्मक आदेश रिकॉर्ड पर रखने को कहा है।

साथ ही, सभी कानून प्रवर्तन एजेंसियों को प्रदर्शनों से संबंधित CCTV फुटेज और अन्य डिजिटल साक्ष्य सुरक्षित रखने का निर्देश दिया।

चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच के सामने सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील मेनका गुरुस्वामी ने कहा कि दिल्ली पुलिस कमिश्नर की ओर से दाखिल हलफनामे में धारा 163 के तहत जारी आदेशों का उल्लेख नहीं है।

उन्होंने यह भी कहा कि हलफनामे में यह जानकारी नहीं दी गई कि मुख्य चुनाव आयुक्त और SIR के खिलाफ प्रदर्शनों के दौरान कितने लोगों को हिरासत में लिया गया।

इस पर जस्टिस बागची ने टिप्पणी की कि वकील मानो किसी ऐसी चीज के खिलाफ बहस कर रहे हैं, जो रिकॉर्ड पर मौजूद ही नहीं है, क्योंकि मुख्य शिकायत यही है कि धारा 163 के आदेश अदालत के सामने पेश नहीं किए गए।

सीनियर वकील कपिल सिब्बल ने भी कहा कि किसी वकील ने अब तक ये आदेश नहीं देखे हैं। इसके बाद जस्टिस बागची ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से कहा कि अधिकारियों की ओर से दाखिल किए जाने वाले अगले हलफनामों के साथ संबंधित आदेश भी रिकॉर्ड पर रखे जाएं।

BNSS की धारा 163 मजिस्ट्रेट को आपात स्थिति में खतरे, बाधा, नुकसान या सार्वजनिक शांति भंग होने की आशंका रोकने के लिए तत्काल प्रतिबंधात्मक आदेश जारी करने का अधिकार देती है। यह प्रावधान पहले दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 144 के रूप में जाना जाता था।

दिल्ली के नई दिल्ली जिले में 10 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर प्रस्तावित प्रदर्शन से पहले धारा 163 के तहत प्रतिबंध लगाए गए। इन आदेशों के तहत पूर्व लिखित अनुमति के बिना पांच या उससे अधिक लोगों के एकत्र होने, जुलूस निकालने, प्रदर्शन करने, धरना देने और विरोध स्वरूप पिकेटिंग करने पर रोक लगाई गई।

कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) की ओर से आयोजित प्रस्तावित प्रदर्शन को दिल्ली पुलिस ने अनुमति देने से इनकार किया। पुलिस ने आवेदन देर से दिए जाने और पिछले प्रदर्शन के दौरान कथित उल्लंघनों को इसकी वजह बताया।

सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में दिल्ली पुलिस ने प्रतिबंधों का बचाव करते हुए आयोजकों के पिछले आचरण और कानून-व्यवस्था बिगड़ने की आशंका का हवाला दिया।

पुलिस के अनुसार, राष्ट्रीय राजधानी की संवेदनशीलता, उच्चस्तरीय राजनयिक यात्राओं और 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन सहित अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रमों को देखते हुए कई थानों ने जंतर-मंतर के आसपास के क्षेत्रों से आगे तक धारा 163 के आदेश जारी किए।

पुलिस ने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट के 11 अक्टूबर के निर्देशों का पालन करने के लिए बाद में ऐसे आदेश हटाने के निर्देश दिए गए।

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने BNSS की धारा 172 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर भी नोटिस जारी किया।

याचिका में दलील दी गई कि यह प्रावधान पुलिस अधिकारियों को अपने निर्देशों की अवहेलना करने वाले लोगों को हिरासत में लेने या वहां से हटाने की व्यापक शक्ति देता है, लेकिन मनमानी कार्रवाई रोकने के लिए पर्याप्त सुरक्षा उपाय नहीं हैं।

धारा 172(1) के तहत लोगों को BNSS के अध्याय 12 के अंतर्गत अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर रहे पुलिस अधिकारी के वैध निर्देशों का पालन करना होता है। वहीं, धारा 172(2) पुलिस अधिकारी को निर्देश का विरोध करने, इनकार करने या उसकी अनदेखी करने वाले व्यक्ति को हिरासत में लेने अथवा वहां से हटाने का अधिकार देती है। अधिकारी ऐसे व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के सामने पेश कर सकता है या छोटे मामलों में 24 घंटे के भीतर जल्द से जल्द रिहा कर सकता है।

याचिकाकर्ता का तर्क है कि इस प्रावधान के तहत किसी पुलिस अधिकारी के व्यक्तिगत आकलन के आधार पर हिरासत में लिया जा सकता है। इसके लिए संज्ञेय अपराध की आशंका का उचित आधार, लिखित कारण या न्यायिक समीक्षा के पर्याप्त उपाय अनिवार्य नहीं हैं।

याचिका में धारा 172 को संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 के खिलाफ घोषित करने की मांग की गई है। ये अनुच्छेद कानून के समक्ष समानता, मौलिक स्वतंत्रताओं और जीवन तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की गारंटी देते हैं।

यह याचिका 10 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन के दौरान पुलिस की कार्रवाई से जुड़ी है।

याचिका में दावा किया गया कि छात्रों, कार्यकर्ताओं, वकीलों, पत्रकारों और राजनीतिक नेताओं समेत हजारों लोगों को हिरासत में लिया गया या प्रदर्शन स्थल तक पहुंचने से रोका गया। इसमें आरोप है कि कुछ लोगों को प्रदर्शन स्थल से काफी दूर रोक दिया गया, जबकि कुछ को ट्रेनों से भी उतारा गया।

सुप्रीम कोर्ट की बेंच दिल्ली में हुए प्रदर्शनों से संबंधित कई याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई कर रही थी। इनमें प्रदर्शनकारियों, पत्रकारों और वकीलों के खिलाफ पुलिस की कथित ज्यादती, सार्वजनिक परिवहन पर लगाए गए प्रतिबंधों को लेकर अवमानना की कार्यवाही और BNSS के एक प्रावधान की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका शामिल हैं।

सुनवाई के दौरान राहुल गांधी की ओर से मतदाता सूची के SIR को चुनौती देने वाली याचिका पर भी विचार किया गया। इसके अलावा, 12 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट परिसर में विपक्षी नेताओं के जुटने और कथित व्यवधान से संबंधित याचिकाएं भी सुनवाई के लिए सामने आईं।

आरोप है कि राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेता चुनाव आयोग की SIR प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिका दाखिल करने के लिए सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री की ओर मार्च कर रहे थे।

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