वकील के भरोसे बैठना काफी नहीं, मुकदमे की स्थिति जानना भी पक्षकार की जिम्मेदारी: दिल्ली हाईकोर्ट
दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि पक्षकार अपने अदालत में पेश न होने की पूरी जिम्मेदारी वकील पर नहीं डाल सकते। वकील की कथित लापरवाही के बावजूद पक्षकारों को अपने मुकदमे की स्थिति पर नजर रखनी चाहिए और वकील से संपर्क नहीं होने पर अदालत से जानकारी लेने का प्रयास करना चाहिए।
जस्टिस दिनेश मेहता और जस्टिस अदिति चौधरी की खंडपीठ ने यह टिप्पणी एक अपील खारिज करते हुए की।
अपीलकर्ता ने व्यावसायिक वसूली के मुकदमे में उसके खिलाफ पारित एकपक्षीय फैसले और डिक्री को रद्द करने की मांग की थी।
हाईकोर्ट ने पाया कि अपीलकर्ता अपनी अनुपस्थिति का कोई ठोस और संतोषजनक कारण बताने में विफल रहा।
अदालत ने कहा कि आज इंटरनेट के दौर में मुकदमों की स्थिति, अदालतों के आदेश और फैसले ऑनलाइन उपलब्ध हैं। इसके अलावा, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से अदालत में पेश होने की सुविधा भी मौजूद है। ऐसे में पक्षकारों के लिए अपने मुकदमे की जानकारी रखना पहले की तुलना में आसान हो गया।
पीठ ने कहा कि अपीलकर्ता का यह दावा कि उसकी वकील ने उसके फोन का जवाब देना बंद कर दिया था, पर्याप्त नहीं है। उसने यह स्पष्ट नहीं किया कि उसने कब अपनी वकील से संपर्क करने का प्रयास किया और संपर्क नहीं होने पर उनसे व्यक्तिगत रूप से मिलने की कोशिश क्यों नहीं की।
अदालत ने यह भी गौर किया कि 23 नवंबर 2024 को मामले में अंतिम दलीलें सुनी गई थीं और 26 नवंबर 2024 को एकपक्षीय फैसला सुनाया गया। इन दोनों तारीखों पर न तो अपीलकर्ता अदालत में उपस्थित हुआ और न ही उसकी वकील। अपीलकर्ता ने इन तारीखों पर अनुपस्थित रहने का कोई संतोषजनक कारण भी नहीं बताया।
पीठ ने कहा कि जब अपीलकर्ता अपनी वकील से संपर्क नहीं कर पा रहा था तो उसे निचली अदालत में जाकर अपने मुकदमे की स्थिति का पता लगाना चाहिए।
अदालत के अनुसार, अपीलकर्ता यह साबित नहीं कर सका कि उसने सुनवाई में उपस्थित रहने के लिए ईमानदारी से प्रयास किए या अपनी ओर से उचित कदम उठाए।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि दीवानी प्रक्रिया संहिता के आदेश 9, नियम 13 के तहत एकपक्षीय फैसले और डिक्री रद्द करने के लिए अनुपस्थिति का पर्याप्त कारण बताना जरूरी है। पर्याप्त कारण का आकलन मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर किया जाना चाहिए, ताकि न्याय सुनिश्चित हो सके। हालांकि, इस मामले में अपीलकर्ता की दलीलें इस कसौटी पर खरी नहीं उतरीं।
पीठ ने यह भी कहा कि मामले को व्यावसायिक अदालत में चलाए जाने के तथ्य को ध्यान में रखना जरूरी है, क्योंकि व्यावसायिक विवादों का निपटारा कानून के तहत निर्धारित समय-सीमा में किया जाना अपेक्षित है।
अदालत ने माना कि अपीलकर्ता की ओर से अपनी अनुपस्थिति को लेकर कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दिया गया।
इन परिस्थितियों में दिल्ली हाईकोर्ट ने एकपक्षीय डिक्री को रद्द करने से इनकार करने वाले निचली अदालत के आदेश में कोई खामी नहीं पाई और अपील खारिज की।