दिल्ली हाईकोर्ट ने दिल्ली दंगों की बड़ी साजिश से जुड़े मामले में आरोपी नताशा नरवाल को अकादमिक कॉन्फ्रेंस और शोध कार्य के लिए ब्रिटेन जाने की अनुमति दी।

जस्टिस अमित बंसल ने उन्हें 2 नवंबर से 1 दिसंबर तक ब्रिटेन की यात्रा करने की इजाजत दी। कोर्ट ने इसके लिए एक लाख रुपये का निजी मुचलका और हरियाणा में रहने वाले उनके भाई की जमानत सुनिश्चित करने की शर्त रखी है।

कोर्ट ने नताशा नरवाल और उनके भाई को ट्रायल कोर्ट के समक्ष यह हलफनामा देने का निर्देश दिया कि वह भारत लौट आएंगी और ब्रिटेन में शरण लेने के लिए आवेदन नहीं करेंगी।

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि ब्रिटेन में रहने के दौरान नताशा अपने खिलाफ चल रहे मामले के गुण-दोष पर कोई बयान नहीं देंगी।

कोर्ट ने आदेश दिया कि इसकी प्रति उनके वीजा आवेदन के साथ संलग्न की जाए। ट्रायल कोर्ट को उनका पासपोर्ट जारी करने का निर्देश दिया गया। साथ ही, उनके खिलाफ जारी किसी भी लुकआउट सर्कुलर (LOC) को यात्रा अवधि के दौरान निलंबित रखा जाएगा।

हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि भारत लौटने के 48 घंटे के भीतर नताशा नरवाल अपना पासपोर्ट ट्रायल कोर्ट में जमा कर दें।

कोर्ट ने इस बात पर भी गौर किया कि वह पिछले तीन वर्षों से एक विदेशी विश्वविद्यालय में पीएचडी कर रही हैं और 2023 में दाखिला लेने के बाद से उन्होंने विदेश जाने की अनुमति नहीं मांगी थी।

नताशा के सुपरवाइजर की ओर से जारी पत्र के अनुसार, उन्हें विश्वविद्यालय में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर सुपरविजन मीटिंग में हिस्सा लेना है, अकादमिक स्टाफ और शोधकर्ताओं के सामने अपना काम प्रस्तुत करना है और कैंपस में आयोजित डॉक्टोरल ट्रेनिंग में भाग लेना है।

पत्र में यह भी कहा गया कि उनकी शैक्षणिक यात्रा शोध के उद्देश्य से आवश्यक है और पीएचडी प्राप्त करने के लिए जमा किए जाने वाले शोध-प्रबंध की योग्यता संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करने में मदद करेगी।

दिल्ली पुलिस की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एस.वी. राजू ने याचिका का विरोध किया। उन्होंने दलील दी कि ब्रिटेन में प्रत्यर्पण से जुड़े कानून सख्त हैं और यदि नताशा नरवाल भारत वापस नहीं लौटती हैं, तो उन्हें वापस लाना मुश्किल हो सकता है। उन्होंने विश्वविद्यालय से प्राप्त एक ईमेल का हवाला देते हुए कहा कि शोधपत्र को उनका सह-लेखक भी प्रस्तुत कर सकता है।

इस पर नताशा नरवाल की ओर से पेश एडवोकेट अदित पुजारी ने कहा कि शोधपत्र का कोई सह-लेखक नहीं है और इसलिए उसे प्रस्तुत करने के लिए नताशा का व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होना जरूरी है।

एस.वी. राजू ने आगे कहा कि उनकी शारीरिक उपस्थिति आवश्यक नहीं है, क्योंकि वह पिछले तीन वर्षों से ऑनलाइन माध्यम से पाठ्यक्रम पूरा कर रही हैं।

इस दलील पर पुजारी ने कहा,

“स्थिति 'बेटी भगाओ' जैसी है। हम कह रहे हैं, 'बेटी पढ़ाओ।'”

दिल्ली पुलिस की आपत्ति पर हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत विदेश यात्रा के अधिकार को सीमित नहीं किया जा सकता।

पीठ ने कहा,

“हम विदेश यात्रा के अधिकार को प्रतिबंधित नहीं कर सकते। आपके हाथ बंधे नहीं हैं। आप भारत सरकार हैं। ट्रायल में 20 साल लग सकते हैं। आप किसी व्यक्ति को यहां रोककर नहीं रख सकते। यह एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय है और वह अकादमिक उद्देश्य से यात्रा करना चाहती हैं।”

नताशा नरवाल ने ट्रायल कोर्ट के उन आदेशों को हाईकोर्ट में चुनौती दी, जिनमें दंगों से जुड़े दो मामलों में उन्हें विदेश जाने की अनुमति देने से इनकार कर दिया गया।

ट्रायल कोर्ट ने कहा कि विदेश यात्रा का अधिकार पूर्ण नहीं है और गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत कार्यवाही लंबित होना इस पर विचार करते समय प्रासंगिक है।

नताशा ने ट्रायल कोर्ट से ब्रिटेन जाने की अनुमति मांगी थी, ताकि वह लंदन विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ ओरिएंटल एंड अफ्रीकन स्टडीज (SOAS) में 5 से 8 नवंबर तक आयोजित होने वाले 23वें वार्षिक हिस्टोरिकल मैटेरियलिज्म कॉन्फ्रेंस में अपना शोधपत्र प्रस्तुत कर सकें। उनके शोधपत्र का शीर्षक “जेंडर्ड कार्सरल लेबर ऐज़ सोशल रिप्रोडक्शन” है। हाईकोर्ट ने अकादमिक उद्देश्य से उनकी यात्रा को अनुमति देते हुए निर्धारित शर्तों के साथ ब्रिटेन जाने का रास्ता साफ किया।

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