दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा है कि केवल स्त्रीधन की बरामदगी के लिए आरोपी से हिरासत में पूछताछ जरूरी नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि स्त्रीधन की बरामदगी का मुद्दा जमानत देने वाली अदालत के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता और इसके लिए शिकायतकर्ता को कानून के तहत उचित कार्यवाही करनी होगी।

जस्टिस गिरीश कथपालिया ने वैवाहिक विवाद से जुड़े मामले में 80 वर्षीय आरोपी को अग्रिम जमानत देते हुए यह टिप्पणी की। आरोपी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धाराओं 354, 354ए, 376, 498ए और 406 तथा भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 74 के तहत आरोप लगाए गए।

अभियोजन ने अग्रिम जमानत का विरोध करते हुए कहा कि आरोपी से हिरासत में पूछताछ जरूरी है। हालांकि, हिरासत में पूछताछ की जरूरत के पीछे जांच अधिकारी ने मुख्य रूप से स्त्रीधन की बरामदगी का कारण बताया।

इस पर हाईकोर्ट ने कहा,

“स्त्रीधन की बरामदगी के लिए हिरासत में पूछताछ निश्चित रूप से आवश्यक नहीं है।”

अदालत ने यह भी कहा कि स्त्रीधन वापस नहीं किए जाने का आरोप जमानत अदालत के जरिए उसकी बरामदगी कराने का विषय नहीं है। अदालत के अनुसार, शिकायतकर्ता ने अब तक स्त्रीधन की बरामदगी के लिए कानून के तहत कोई उचित कार्यवाही भी शुरू नहीं की थी।

जांच में आरोपी के शामिल होने को लेकर भी हाईकोर्ट ने अभियोजन की दलील पर सवाल उठाया। राज्य ने कहा कि नोटिस दिए जाने के बावजूद आरोपी जांच में शामिल नहीं हुआ। लेकिन अदालत के पूछने पर जांच अधिकारी ने बताया कि नोटिस केवल मौखिक रूप से दिए गए।

हाईकोर्ट ने कहा कि जांच अधिकारी की यह कार्रवाई “विश्वास पैदा नहीं करती” और कथित मौखिक नोटिस से संबंधित कोई केस डायरी भी अदालत के सामने पेश नहीं की गई।

मामले में शुरू में IPC की धाराओं 498ए, 406 और 34 के तहत FIR दर्ज की गई। बाद में 354, 354ए और 376 तथा BNS की धारा 74 जोड़ी गईं। यौन दुर्व्यवहार के आरोप आरोपी ससुर के खिलाफ लगाए गए।

अदालत ने ध्यान दिया कि कथित घटनाएं मई 2022 या उससे पहले की बताई गई हैं, जबकि FIR अप्रैल में दर्ज हुई। FIR में घटनाओं की कोई निश्चित तारीख भी नहीं बताई गई।

अदालत के समक्ष पेश पारिवारिक तस्वीरों पर भी विचार किया गया। हाईकोर्ट ने कहा कि तस्वीरों में आरोपी, शिकायतकर्ता और उनका बच्चा एक खुशहाल परिवार की तरह दिखाई दे रहे है। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि इन परिस्थितियों पर केवल अग्रिम जमानत के सीमित उद्देश्य से विचार किया गया है और मामले का अंतिम फैसला विचारण अदालत साक्ष्यों के आधार पर करेगी।

जस्टिस कथपालिया ने साथ ही यह भी कहा कि वैवाहिक मामलों में यौन दुर्व्यवहार के आरोपों को लेकर अदालतें यह सामान्य धारणा नहीं बना सकतीं कि आरोप झूठे हैं।

उन्होंने कहा,

“यौन दुर्व्यवहार के आरोप वाले सभी वैवाहिक मामले झूठे नहीं होते और ऐसे सभी मामले सच भी नहीं होते। इसी समझ के साथ मैंने वर्तमान मामले की जांच की।”

अदालत ने शिकायतकर्ता और उसके पति के बीच उनके तीन वर्षीय बच्चे की अभिरक्षा को लेकर चल रहे विवाद पर भी विचार किया। अदालत ने कहा कि बच्चे की अभिरक्षा का मूल आधार माता-पिता के बीच अधिकारों का विवाद नहीं, बल्कि बच्चे का कल्याण होना चाहिए।

हाईकोर्ट ने कहा कि बच्चे का दोनों माता-पिता के साथ सह-पालन का अधिकार है।

इन परिस्थितियों में अदालत ने आरोपी को उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित रखने का कोई पर्याप्त आधार नहीं पाया और अग्रिम जमानत मंजूर की। गिरफ्तारी की स्थिति में आरोपी को 25 हजार रुपये के निजी मुचलके और इतनी ही राशि के एक जमानती के आधार पर जमानत पर रिहा करने का निर्देश दिया गया।

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