गंभीर बीमारी से जूझ रहे कैदी की पैरोल पर जल्द फैसला करें अधिकारी: छत्तीसगढ़ हाइकोर्ट, कहा- जीवन के अधिकार में समय पर इलाज भी शामिल

Update: 2026-03-10 09:36 GMT

हाइकोर्ट ने गंभीर बीमारी से पीड़ित 68 वर्षीय कैदी की पैरोल अर्जी पर जल्द निर्णय लेने का निर्देश दिया।

अदालत ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार में समय पर और उचित मेडिकल ट्रीटमेंट का अधिकार भी शामिल है।

चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसे जेल में सजा काट रहे एक कैदी ने दायर किया। याचिका में बताया गया कि वह गैंग्रीन नामक गंभीर बीमारी से पीड़ित है।

मामले में प्रस्तुत मेडिकल दस्तावेजों के अनुसार कैदी के पैर की एक उंगली पहले ही काटी जा चुकी है। सरकारी अस्पताल के डॉक्टरों ने बताया कि संक्रमण और फैल गया और आगे चलकर उसके पैरों को भी काटने की नौबत आ सकती है।

कैदी ने कहा कि सरकारी अस्पताल में इलाज को लेकर उसे भरोसा नहीं रहा, इसलिए वह किसी निजी अस्पताल में उपचार कराना चाहता है। इसी उद्देश्य से उसने पैरोल के लिए आवेदन किया था।

जेल प्रशासन ने यह आवेदन जिला मजिस्ट्रेट को भेज दिया लेकिन उस पर कोई निर्णय नहीं लिया गया। इसके बाद उसने हाइकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

अदालत ने कहा कि उपलब्ध दस्तावेजों से स्पष्ट है कि याचिकाकर्ता गंभीर मेडिकल स्थिति से गुजर रहा है और उसे तत्काल उपचार की आवश्यकता है।

अदालत ने अपने आदेश में कहा,

“संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार में समय पर और पर्याप्त मेडिकल ट्रीटमेंट का अधिकार भी शामिल है। भले ही पैरोल पूर्ण अधिकार के रूप में नहीं दी जा सकती लेकिन सक्षम प्राधिकारी का दायित्व है कि ऐसे आवेदन पर उचित समय में निर्णय ले खासकर जब मामला गंभीर चिकित्सा आधार पर हो।”

याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका में कहा था कि अधिकारियों द्वारा उसकी पैरोल अर्जी पर निर्णय न लेना मनमाना और अवैध है तथा यह उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।

उसने यह भी कहा कि उसे अपने पसंद के अस्पताल में उचित इलाज कराने का अधिकार है, खासकर तब जब उसके पैरों के काटे जाने का खतरा बना हुआ है।

वहीं राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि याचिकाकर्ता एक दोषसिद्ध कैदी है और पैरोल अधिकार के रूप में नहीं दी जा सकती।

राज्य ने यह भी कहा कि प्रशासन की ओर से कोई जानबूझकर लापरवाही नहीं की गई और जेल के भीतर ही उसे आवश्यक मेडिकल सुविधा उपलब्ध कराई जा रही है।

मामले की गंभीरता को देखते हुए हाइकोर्ट ने याचिका का निस्तारण करते हुए संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे कैदी की लंबित पैरोल अर्जी पर 10 दिनों के भीतर निर्णय लें।

Tags:    

Similar News