आपराधिक प्रक्रिया को उत्पीड़न का हथियार नहीं बनाया जा सकता: छत्तीसगढ़ हाइकोर्ट ने पूर्व चीफ जस्टिस व जजों के खिलाफ शिकायत रद्द की

Update: 2026-03-09 07:04 GMT

छत्तीसगढ़ हाइकोर्ट ने एक अहम फैसले में पूर्व चीफ जस्टिस, एक वर्तमान हाइकोर्ट जस्टिस और राज्य की उच्च न्यायिक सेवा के कई अधिकारियों के खिलाफ दायर आपराधिक शिकायत रद्द की। अदालत ने कहा कि केवल आशंका और अनुमान के आधार पर न्यायपालिका के सदस्यों के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही चलने देना न्यायिक संस्थाओं की गरिमा को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है।

चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस बिभु दत्त गुरु की खंडपीठ ने कहा कि आपराधिक कानून का इस्तेमाल किसी को परेशान करने, डराने या व्यक्तिगत अथवा सेवा संबंधी शिकायतों को आपराधिक मुकदमे का रूप देने के लिए नहीं किया जा सकता।

खंडपीठ ने कहा,

“आपराधिक कार्यवाही शुरू करना कोई औपचारिक प्रक्रिया नहीं है। संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों और उच्च न्यायिक सेवा के अधिकारियों को तलब करने के गंभीर परिणाम होते हैं। इसलिए आपराधिक कानून को उत्पीड़न या दबाव का साधन नहीं बनने दिया जा सकता।”

पूरा मामला

मामला वर्ष 2015 की एक घटना से जुड़ा है, जिसमें एक टोल प्लाजा पर शिकायतकर्ता के पति के साथ कथित दुर्व्यवहार का आरोप लगाया गया। उस समय शिकायतकर्ता के पति सुकमा में मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के पद पर कार्यरत थे। इस घटना को लेकर एक प्राथमिकी भी दर्ज की गई।

शिकायत में आरोप लगाया गया कि उस FIR में पुलिस ने आरोप पत्र दाखिल नहीं किया, क्योंकि इसमें पुलिस अधिकारियों, न्यायिक अधिकारियों, तत्कालीन चीफ जस्टिस और एक वर्तमान हाइकोर्ट जस्टिस की कथित साजिश शामिल थी।

हाइकोर्ट ने शिकायत की जांच करते हुए पाया कि इसमें साजिश से जुड़ा कोई ठोस तथ्य या साक्ष्य नहीं है। अदालत ने कहा कि भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 120-बी के तहत साजिश सिद्ध करने के लिए यह दिखाना जरूरी होता है कि दो या अधिक व्यक्तियों के बीच किसी अवैध कार्य को करने के लिए स्पष्ट सहमति या योजना बनी थी।

खंडपीठ ने कहा कि शिकायत में ऐसे किसी भी ठोस तथ्य का उल्लेख नहीं है। शिकायतकर्ता ने स्वयं यह कहा कि आरोप पत्र दाखिल न होने के पीछे साजिश होने की आशंका है लेकिन इसके समर्थन में कोई ठोस सामग्री नहीं दी गई।

अदालत ने कहा,

“पूरे आरोप केवल आशंका और संदेह पर आधारित हैं। शिकायत में ऐसा कोई तथ्य नहीं है, जिससे यह साबित हो सके कि संबंधित जजों या अधिकारियों के बीच किसी तरह की साजिश, सहमति या योजना बनी थी।”

मामले में शिकायतकर्ता की ओर से यह भी आरोप लगाए गए कि उनके पति को नक्सल प्रभावित क्षेत्र में स्थानांतरण, वेतन वृद्धि रोकने और सेवा समाप्त करने जैसी प्रशासनिक कार्रवाई का सामना करना पड़ा।

इस पर अदालत ने स्पष्ट कहा कि ऐसे विवाद सेवा कानून के दायरे में आते हैं और इन्हें आपराधिक साजिश का रूप नहीं दिया जा सकता।

हाइकोर्ट ने कहा कि इस तरह की शिकायत को जारी रहने देना कानून की प्रक्रिया का गंभीर दुरुपयोग होगा। इससे संबंधित व्यक्तियों को बिना किसी ठोस आधार के अनावश्यक आपराधिक मुकदमे का सामना करना पड़ेगा।

इसी आधार पर अदालत ने शिकायत रद्द करते हुए कहा कि न्यायपालिका और सार्वजनिक पदों पर बैठे लोगों के खिलाफ केवल अनुमान या आशंका के आधार पर आपराधिक मुकदमे नहीं चलाए जा सकते।

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