पति की गला घोंटकर हत्या कर लाश के पास रखा सांप: महिला और प्रेमी ने मौत की सजा को हाईकोर्ट में दी चुनौती
मेरठ कोर्ट से पति की गला घोंटकर हत्या करने और शव के पास ज़िंदा सांप रखकर मौत को सर्पदंश का मामला दिखाने के आरोप में मौत की सजा पाने वाली महिला और उसके कथित प्रेमी ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। दोनों ने अपनी दोषसिद्धि और सजा को चुनौती देते हुए अपील दायर की।
एडिशनल सेशंस जज जयवीर सिंह नागर ने पिछले महीने दोनों आरोपियों को मौत की सजा सुनाई थी। अदालत ने मामले को 'दुर्लभतम से दुर्लभ' श्रेणी का मानते हुए कहा कि हत्या पहले से बनाई गई योजना के तहत की गई। वारदात के समय पीड़ित सो रहा था और असहाय था। आरोपियों ने हत्या को सांप के काटने से हुई मौत दिखाने के लिए शव के पास जिंदा सांप रख दिया था।
अमरदीप और रवीता ने अब मेरठ अदालत के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी। उनकी अपील पर आज जस्टिस सलिल कुमार राय और जस्टिस पदम नारायण मिश्रा की पीठ के समक्ष सुनवाई होनी है।
गौरतलब है कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 407 के तहत सत्र अदालत द्वारा सुनाई गई मौत की सजा को लागू करने से पहले हाईकोर्ट की पुष्टि जरूरी होती है।
मामला 13 अप्रैल, 2025 का है। उस दिन रवीता के पति अमित का शव उनके घर में चारपाई पर मिला। शव के पास एक जिंदा सांप भी पड़ा था। शुरुआत में परिवार को संदेह हुआ कि अमित की मौत सांप के काटने से हुई।
हालांकि, पोस्टमार्टम में अमित की गर्दन और नाक पर चोट के निशान मिले। पुलिस के अनुसार, जांच में सामने आया कि उसकी मौत गला घोंटने से हुई।
मेरठ कोर्ट ने क्यों सुनाई मौत की सजा?
मेरठ सेशंस कोर्ट ने अपने 127 पन्नों के फैसले में परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर दोनों आरोपियों को दोषी ठहराया और मामले को दुर्लभतम से दुर्लभ श्रेणी में रखा। फैसले में अदालत ने न्याय व्यवस्था के कर्तव्यों पर चर्चा करते हुए आत्रेय संहिता के एक श्लोक का भी उल्लेख किया।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, रवीता का अमरदीप के साथ विवाहेतर संबंध था। इसी बात को लेकर रवीता और उसके पति अमित के बीच विवाद होता था। 12 अप्रैल, 2025 को भी दोनों के बीच झगड़ा हुआ था।
अगली सुबह अमित घर में चारपाई पर मृत मिला। उसके शव के पास जिंदा सांप पड़ा था। अमित के भाई ने उसके चेहरे और गर्दन पर चोट के निशान भी देखे। परिवार उसे मेरठ के अस्पताल ले गया, जहां डॉक्टरों ने संकेत दिया कि उसकी मौत सांप के काटने से नहीं हुई। पोस्टमार्टम में भी गला घोंटने से मौत की पुष्टि हुई। मेडिकल जांच में हायॉइड हड्डी और थायरॉयड उपास्थि में फ्रैक्चर पाए गए।
जांच के दौरान रवीता और अमरदीप के कथित संबंधों की जानकारी सामने आई। अभियोजन पक्ष ने यह साक्ष्य भी पेश किया कि अमरदीप ने एक सपेरे से 1,000 रुपये देकर सांप हासिल किया। सपेरे ने अदालत में गवाही दी कि अमरदीप ने धार्मिक आयोजन के लिए 'घोड़ा पछाड़' सांप मांगा था और इसके बदले उसे 1,000 रुपये दिए।
अदालत ने किन साक्ष्यों पर भरोसा किया
मेरठ कोर्ट ने दोनों आरोपियों के संबंधों से जुड़ी गवाही, कॉल डिटेल रिकॉर्ड और उनके बीच बार-बार हुई लंबी फोन बातचीत को महत्वपूर्ण परिस्थितिजन्य साक्ष्य माना। अदालत ने उन लोगों की गवाही पर भी विचार किया, जिन्हें अमित के शव के पास से सांप हटाने के लिए बुलाया गया।
अभियोजन पक्ष ने यह भी बताया कि अमित को अपनी पत्नी के कथित संबंधों की जानकारी हो गई और इसी बात को लेकर उसका रवीता से विवाद हुआ था। अदालत ने माना कि हत्या का मकसद यानी दोनों आरोपियों के बीच संबंध होने की बात संदेह से परे साबित हुई।
मेडिकल साक्ष्यों और अन्य परिस्थितियों के साथ इन तथ्यों पर विचार करने के बाद अदालत ने अभियोजन पक्ष की इस कहानी को स्वीकार किया कि अमित की गला घोंटकर हत्या की गई और घटना को सांप के काटने से हुई मौत दिखाने के लिए शव के पास जिंदा सांप रखा गया।
मुकदमे की पूरी सुनवाई के बाद अदालत ने दोनों आरोपियों को दोषी ठहराया। अदालत ने कहा कि अपराध की गंभीरता केवल सोते हुए व्यक्ति की हत्या तक सीमित नहीं है, बल्कि वास्तविक अपराध को छिपाने के लिए शव के पास सांप रखने की कोशिश भी इसकी गंभीरता बढ़ाती है।
अदालत ने फैसले में टिप्पणी की,
“अपराध की गंभीरता केवल इस तथ्य में नहीं है कि सोते हुए व्यक्ति की हत्या की गई, बल्कि इस बात में भी है कि मृतक के पास सांप रखकर वास्तविक अपराध को छिपाने और उसकी मौत को सांप के काटने से हुई दिखाने का प्रयास किया गया।”
मौत की सजा पर विचार करते हुए अदालत ने कहा कि आरोपियों ने कथित तौर पर हत्या की योजना इस तरह बनाई कि पीड़ित शोर न मचा सके और आसपास सो रहे लोगों को उसकी आवाज सुनाई न दे।
अदालत ने कहा,
“जब व्यक्ति रात में सो रहा था ऐसे समय में जब वह अपने ही घर में खुद को सबसे सुरक्षित महसूस करता है, तब आरोपियों ने उसका गला घोंटा और उसका मुंह इतनी बुरी तरह दबाया कि वह चीख भी नहीं सका। हत्या का यह तरीका अपने आप में अत्यधिक क्रूर और मनमाना प्रतीत होता है।”
अदालत ने यह भी कहा कि हत्या किसी अचानक हुए विवाद या क्षणिक आवेश का परिणाम नहीं थी, बल्कि पहले से बनाई गई योजना के तहत की गई। पीड़ित चारपाई पर सो रहा था और उसे इस बात का कोई अंदेशा नहीं था कि जिस पत्नी पर वह सबसे अधिक भरोसा करता है, वही उसकी हत्या कर सकती है।
अदालत के अनुसार, आरोपियों का कृत्य रिश्तों और सामाजिक मान्यताओं में निहित विश्वास को तोड़ता है। उसने कहा कि जब केवल यौन इच्छा की पूर्ति के लिए हत्या की जाती है, तो यह अत्यंत पतित मानसिकता को दर्शाता है। हत्या बिना किसी उकसावे के की गई और योजना के तहत चारपाई पर सांप छोड़ना आरोपियों की चालाकी और साजिश को दिखाता है। अदालत ने कहा कि ऐसी घटना समाज की सामूहिक अंतरात्मा को झकझोर देती है।
दुर्लभतम से दुर्लभ मामला मानने का आधार
आरोपियों ने दलील दी थी कि मामला दुर्लभतम से दुर्लभ श्रेणी में नहीं आता, क्योंकि मृतक की मौत गला घोंटने से हुई थी और उसके शव को जलाया या विकृत नहीं किया गया।
अदालत ने अपराध की पूरी परिस्थितियों, वारदात को अंजाम देने के तरीके, दोषियों की भूमिका और घटना के बाद उनके आचरण पर विचार करने के बाद इस दलील को खारिज किया। अदालत ने कहा कि क्रूरता का अर्थ केवल किसी व्यक्ति के शरीर को विकृत करना नहीं है, बल्कि ऐसी क्रूरता भी इसमें शामिल है जो व्यक्ति के भरोसे और समाज की अंतरात्मा को नष्ट कर दे।
अदालत ने विशेष रूप से हत्या को सांप के काटने से हुई मौत दिखाने की कोशिश को मामले का अहम पहलू माना। उसने यह भी निष्कर्ष निकाला कि दोषियों के सुधरने और समाज में दोबारा बसने की कोई उचित संभावना नहीं है।
अदालत ने आरोपियों के अपराध करने के तरीके को 'फिल्मी अंदाज' का बताते हुए कहा कि अपराध करने का अनोखा तरीका और उसे छिपाने की असामान्य कोशिश मामले को दुर्लभतम से दुर्लभ श्रेणी की ओर ले जाती है।
अदालत ने टिप्पणी की,
“यह अपराध दुर्लभतम से दुर्लभ श्रेणी में आता है और किसी अन्य संभावना की गुंजाइश नहीं है।”
सजा तय करते समय अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले पुरुषोत्तम दशरथ बोराटे बनाम महाराष्ट्र राज्य (2015) का भी हवाला दिया। इसमें कहा गया था कि सजा नीति का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होना चाहिए कि अपराधी को उसके अपराध की सजा मिले और पीड़ित के साथ-साथ समाज को भी यह संतोष हो कि न्याय हुआ है।
अपराध को गंभीर बनाने वाले और सजा कम करने के पक्ष में मौजूद सभी परिस्थितियों पर विचार करने के बाद मेरठ की अदालत ने निष्कर्ष निकाला था कि आजीवन कारावास पर्याप्त नहीं होगा और दोनों आरोपियों को मौत की सजा सुनाई थी।
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