14 दिनों की क्वारंटीन अवधि प्रत्येक मामले में अनिवार्य नहीं, यह एक सामान्य दिशानिर्देश बनाने का साधन : दिल्ली हाईकोर्ट

Update: 2020-05-13 03:00 GMT

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा है कि 14 मार्च की होम क्वारंटाइन दिशानिर्देश और COVID19 Regulations of 2020 में निर्धारित 14 दिनों की अवधि अनिवार्य नहीं है, लेकिन एक सामान्य दिशानिर्देश बनाने का साधन है।

न्यायमूर्ति हरि शंकर की एकल पीठ ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सार्वजनिक स्वास्थ्य के सिद्धांतों को संतुलित करने के लिए यह भी कहा कि यदि कोई भी व्यक्ति, जिसमें COVID-19 के लक्षण नहीं आए हैं और उसका COVID-19 वायरस का टेस्ट भी नेगेटिव आया है। उसके बावजूद भी अगर उसे 14 दिन के लिए घर में क्वारंटीन किया है तो उसे ऐसे निरंतर क्वारंटीनके खिलाफ अधिकारियों के समक्ष अपना पक्ष रखने का अधिकार होगा। यदि वह ऐसा प्रतिनिधित्व रखता है, तो अधिकारी या तो उसके क्वारंटीनको हटाने के लिए बाध्य होंगे या संबंधित व्यक्ति को जल्दी से जल्दी बिना किसी अनुचित देरी के यह बताना या समझाना होगा कि उसे 14 दिनों के घर में क्वारंटीनमें क्यों रखा गया है।

पीठ ने कहा कि COVID-19 वायरस के लिए वर्तमान में यह ज्ञात नहीं है कि वह अंकगणित या तर्क में से किसके तहत प्रमाणित हो रहा है।

यह आदेश उस जनहित याचिका पर सुनवाई के बाद आया है,जिसमें कहा गया था कि दिल्ली सरकार द्वारा तय घरेलू  क्वारंटीन की अवधि मनमानी और अनुचित है।

याचिकाकर्ता का दावा

याचिकाकर्ता उन 72 लोगों में से एक है, जो 14 अप्रैल 2020 को COVID-19 पाॅजिटिव पाए गए एक खाद्य वितरण व्यक्ति के सपंर्क में आया था। याचिकाकर्ता ने यह भी स्वीकार किया है कि वह संक्रमित व्यक्ति के साथ संपर्क में केवल एक बार आया था अर्थात् 24 मार्च 2020/25 मार्च 2020 की आधी रात को।

याचिकाकर्ता ने कहा कि जब वह पहली बार संपर्क में आया था ,उससे लेकर अब तक 30 दिन से अधिक का समय हो गया है। फिर भी, याचिकाकर्ता को घर में  क्वारंटीन किया हुआ है। जबकि संपर्क में आने के बाद से भी 14 दिनों की निर्धारित अवधि खत्म हो चुकी है।

याचिकाकर्ता इस तथ्य से और अधिक दुखी था कि अधिकारियों ने मनमाने ढंग से उसके घर पर दो क्वारंटीन नोटिस लगाए। जिनमें क्रमशः 15 अप्रैल और 17 अप्रैल से 14 दिन की क्वारंटीन अवधि की गणना की गई है।

याचिकाकर्ता ने दलील दी कि यह दोनों नोटिस स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय और विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा जारी किए गए दिशा निर्देशों के खिलाफ हैं, इसलिए याचिकाकर्ता चाहता है कि अदालत जिला मजिस्ट्रेट (दक्षिण), दिल्ली सरकार द्वारा 20 अप्रैल 2020 को जारी चेतावनी नोटिस को रद्द कर दे। चूंकि यह नोटिस प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत और ऑडी अल्टर्म पार्टम के सिद्धांत का उल्लंघन करता है।

इसके अलावा याचिकाकर्ता ने यह भी मांग की थी कि दिल्ली सरकार को निर्देश दिया जाए कि वह अपने होम  क्वारंटीन नोटिस के प्रारूप में उचित संशोधन करें, जिसमें उस तारीख का जिक्र किया जाए, जिस दिन वह व्यक्ति किसी संक्रमित व्यक्ति के साथ संपर्क में आया था/क्वारंटीन करने के कारण, क्वारंटीन की तारीख व समय और संगरोध खत्म होने की अवधि आदि को शामिल किया जाए।

सरकार ने दिया प्रति-शपथपत्र

24 मार्च, 2020 को, जब संक्रमित पिज्जा डिलीवरी बॉय ने याचिकाकर्ता को पिज्जा दिया, तो पूरा देश लॉकडाउन था, इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि याचिकाकर्ता को उस समय व उक्त तारीख से घरेलू क्वारंटीन के तहत रखा गया था।

इस प्रकार लागू दिशानिर्देशों में होम क्वारंटीन के लिए निर्धारित 14 दिन की अवधि का कोई उल्लंघन नहीं किया गया था। 15 अप्रैल, 2020 को लगाए गए पहले स्टिकर का उद्देश्य लोगों में जागरूकता पैदा करना था ताकि याचिकाकर्ता के संपर्क में आए लोग खुद अपनी जांच करवा लें।

याचिकाकर्ता की वास्तविक घरेलू क्वारंटीन निर्धारित दिशा-निर्देशों के अनुसार 17 अप्रैल 2020 को लगाए गए दूसरे नोटिस से शुरू हुआ था। यानी केवल 14 दिनों के लिए। याचिकाकर्ता द्वारा इससे पूर्व में लॉकडाउन में बिताई गई अवधि एक राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन थी, जो विशेष रूप से याचिकाकर्ता पर नहीं लगाया गया था।

न्यायालय ने क्या कहा, 

अदालत ने याचिकाकर्ता के उस दावे को खारिज कर दिया है जिसमें कहा गया था कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन हुआ है। अदालत ने कहा कि 20 अप्रैल को जिला मजिस्ट्रेट द्वारा जारी नोटिस सिर्फ याचिकाकर्ता के खिलाफ आई शिकायतों के चलते जारी किया गया था, जिसमें उसे निर्देश दिया गया था कि वह क्वारंटीन को भंग न करें। उसमें याचिकाकर्ता के खिलाफ किसी भी तरह की सिविल या आपराधिक कार्यवाही करने के लिए नहीं कहा गया था।

अदालत ने भी यह उचित नहीं समझा कि उस तारीख का उल्लेख किया जाए,जिस तारीख को क्वारंटीन में रखा गया व्यक्ति किसी संक्रमित व्यक्ति के साथ संपर्क में आया था।

संपर्क की तारीख को इस तरह सार्वजनिक करने में किसी भी सार्वजनिक हित और व्यवहार्यता की कमी को देखते हुए, अदालत ने कहा कि ऐसे कई आधार या कारण हैं जिनके तहत एक व्यक्ति को घरेलू क्वारंटीन
 के तहत रखा जा सकता है। जरूरी नहीं है कि सभी उस व्यक्ति के सापेक्ष में हो जो किसी ऐसे व्यक्ति के संपर्क में आया था जिसका COVID-19 वायरस का टेस्ट पाॅजिटिव आया है।

कोर्ट ने कहा कि

"हालांकि वह सभी नोटिस जो किसी व्यक्ति को होम क्वारंटीन में रखने के संबंध में जारी किए गए हों,उनमें हो  क्वारंटीन की अवधि के साथ-साथ क्वारंटीन शुरू होने की तारीख भी लिखी जानी चाहिए।"

क्वारंटीन में रखे गए व्यक्ति का एक अतिआवश्यक स्थिति में अधिकारियों के संपर्क में रहने की आवश्यकता के मुद्दे पर, अदालत ने सरकार द्वारा प्रस्तुत जवाब पर विचार किया। जिसमें कहा गया है कि एक हेल्पलाइन नंबर दिया गया है,जिस पर अतिआवश्यकता की स्थिति में संपर्क किया जा सकता है। उक्त नंबर को आधिकारिक वेबसाइट पर भी प्रदर्शित किया गया है।  

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