सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पंजाब में नगर निकाय चुनाव के दौरान जिन वार्डों में तथ्य जांच आयोग ने हिंसा होने की पुष्टि की, उन सभी वार्डों में दोबारा चुनाव कराया जाना चाहिए।

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ पंजाब में नगर निगमों, नगर परिषदों और नगर पंचायतों के पार्षदों एवं सदस्यों के चुनाव से जुड़े विवादों पर सुनवाई कर रही थी। अलग-अलग राजनीतिक दलों के सदस्यों ने चुनाव प्रक्रिया में गड़बड़ी और हिंसा के आरोप लगाते हुए याचिकाएं दायर की थीं।

याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी के सदस्यों, पुलिस अधिकारियों और अन्य लोगों ने उन्हें नामांकन पत्र दाखिल करने से रोका। आरोप लगाया गया कि उनके साथ मारपीट की गई, कपड़े फाड़े गए और नामांकन पत्र छीन लिए गए। यह भी कहा गया कि अदालत के निर्देश के बावजूद नामांकन प्रक्रिया की दृश्य-श्रव्य रिकॉर्डिंग नहीं कराई गई।

याचिकाकर्ताओं ने कुछ पदों, जिनमें महापौर और वरिष्ठ उपमहापौर के पद भी शामिल हैं, के चुनाव में पर्याप्त संख्या में सदस्यों के मौजूद नहीं होने का मुद्दा भी उठाया। उनका कहना था कि जिन उम्मीदवारों को नामांकन दाखिल करने से रोका गया, उनके निर्विरोध निर्वाचित होने के बावजूद संबंधित उम्मीदवारों को पद की शपथ दिलाने पर रोक लगाई जानी चाहिए।

मामले की पिछली सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने माना कि विवाद में ऐसे तथ्यात्मक प्रश्न शामिल हैं, जिनका निर्धारण हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट की रिट अधिकारिता में सीधे करना उचित नहीं होगा। साथ ही चुनाव से जुड़े विवादों के कारण निर्वाचित नगर निकायों के सुचारू कामकाज को लेकर भी अनिश्चितता पैदा हो रही थी।

इसके बाद पक्षकारों की सहमति से सुप्रीम कोर्ट ने तथ्यों की जांच के लिए एक तथ्य जांच आयोग गठित किया। आयोग की अध्यक्षता पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट की पूर्व जज जस्टिस निर्मलजीत कौर को सौंपी गई। आयोग को उम्मीदवारों की ओर से चुनाव प्रक्रिया के संचालन को लेकर उठाए गए आरोपों की जांच करनी थी।

अब सुप्रीम कोर्ट ने आयोग की जांच में जहां चुनाव के दौरान हिंसा पाई गई, उन सभी वार्डों में दोबारा चुनाव कराने की बात कही।

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