सेल डीड में पूरी रकम न मिलने से सौदा अमान्य नहीं होता, बाकी रकम के लिए वसूली का मुकदमा ही रास्ता: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि सेल डीड के रजिस्ट्रेशन के समय पूरी बिक्री कीमत का भुगतान होना बिक्री को वैध बनाने के लिए अनिवार्य नहीं है। यदि बिक्री विलेख पंजीकृत हो चुका है और बिक्री मूल्य का कुछ हिस्सा चुका दिया गया है तो केवल बाकी रकम का भुगतान नहीं होने के आधार पर बिक्री विलेख को रद्द या अमान्य नहीं किया जा सकता।
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की खंडपीठ ने कहा कि बाकी बिक्री मूल्य की राशि वसूलने के लिए अलग से रकम की वसूली का मुकदमा दायर किया जा सकता है, लेकिन केवल भुगतान न होने के आधार पर बिक्री विलेख रद्द करने की मांग नहीं की जा सकती।
अदालत ने कहा,
"जब सेल डीड पंजीकृत हो जाता है भले ही बिक्री मूल्य का कुछ हिस्सा ही चुकाया गया हो तब भी संपत्ति का स्वामित्व खरीदार को हस्तांतरित हो जाता है। बिक्री मूल्य के शेष हिस्से का भुगतान न होने से बिक्री अमान्य नहीं होती। ऐसी स्थिति में उपाय शेष बिक्री मूल्य की वसूली है, न कि बिक्री विलेख को रद्द कराना।"
मामला दो सेल डीड से जुड़ा था, जिन्हें मूल वादियों ने मूल प्रतिवादी के पक्ष में निष्पादित किया था। प्रत्येक संपत्ति की बिक्री कीमत 7,000 रुपये तय हुई। डीड के निष्पादन के समय 2,500 रुपये दिए गए, जबकि प्रत्येक संपत्ति के लिए शेष 4,500 रुपये खरीदार के पास इस उद्देश्य से रखे गए कि वह विभिन्न वित्तीय संस्थानों और सरकारी विभागों में विक्रेताओं की बकाया देनदारियां चुका सके।
इसके बाद विक्रेताओं ने अदालत में मुकदमा दायर कर सेल डीड को शून्य और निष्प्रभावी घोषित करने, उन्हें रद्द करने और संपत्ति पर अपना स्वामित्व घोषित करने की मांग की। उन्होंने खरीदार के खिलाफ स्थायी निषेधाज्ञा की भी मांग की।
ट्रायल कोर्ट ने उनका मुकदमा खारिज किया। प्रथम अपीलीय अदालत ने भी ट्रायल कोर्ट का फैसला बरकरार रखा।
इसके बाद वादी हाईकोर्ट पहुंचे। बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर पीठ ने द्वितीय अपील में निचली अदालतों के समवर्ती निष्कर्षों में हस्तक्षेप करते हुए सेल डीड को लेकर अलग निष्कर्ष दिया। इसके खिलाफ प्रतिवादियों ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट का फैसला रद्द कर दिया और ट्रायल कोर्ट का फैसला बहाल किया।
जस्टिस के. विनोद चंद्रन द्वारा लिखे गए फैसले में अदालत ने कहा कि विक्रेताओं को यह पूरी जानकारी थी कि सेल डीड के समय केवल बिक्री मूल्य का कुछ हिस्सा प्राप्त हुआ है और बाकी राशि के भुगतान की शर्त स्वयं सेल डीड में दर्ज थी। इसलिए बाद में शेष रकम का भुगतान न होने से सेल डीड को शून्य या निष्प्रभावी नहीं माना जा सकता।
अदालत ने कहा,
"जब सेल डीड इस पूरी जानकारी के साथ निष्पादित किया गया कि केवल आंशिक बिक्री मूल्य प्राप्त हुआ है तो केवल इसलिए डीड को शून्य या निष्प्रभावी नहीं बनाया जा सकता कि सेल डीड में किए गए शेष रकम के भुगतान के वादे का पालन नहीं हुआ।"
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि विक्रेताओं का उचित कानूनी उपाय शेष बिक्री मूल्य की वसूली के लिए मुकदमा दायर करना था, न कि बिक्री विलेख को शून्य घोषित कराने की मांग करना।
हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि अपीलकर्ता-प्रतिवादियों को शेष बिक्री मूल्य ब्याज सहित चुकाना होगा और यदि वे संपत्ति का कब्जा चाहते हैं तो उसके लिए कानून के अनुसार कदम उठाना होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि ट्रायल कोर्ट और प्रथम अपीलीय अदालत ने संपत्ति के कब्जे में वादियों के पक्ष में जो स्थिति बनाए रखी थी, उसमें हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं है।