केवल बंगाल के जजों से 80 दिन लगेंगे : सुप्रीम कोर्ट ने ओडिशा व झारखंड के न्यायिक अधिकारियों की तैनाती को दी अनुमति

Update: 2026-02-24 07:13 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल में विशेष गहन पुनर्विचार प्रक्रिया (SIR) के तहत दावों और आपत्तियों के निपटारे के लिए ओडिशा और झारखंड के न्यायिक अधिकारियों की तैनाती की अनुमति दी।

अदालत ने कहा कि केवल पश्चिम बंगाल के उपलब्ध जजों के भरोसे समयबद्ध तरीके से प्रक्रिया पूरी करना संभव नहीं है।

चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की पीठ ने यह आदेश पारित किया।

सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस ने 22 फरवरी को कलकत्ता हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस का पत्र पढ़कर सुनाया, जिसमें बताया गया कि लगभग 50 लाख मामलों में तार्किक विसंगतियों अथवा असंगत श्रेणियों से संबंधित आपत्तियों का निपटारा होना है, जबकि केवल 250 न्यायिक अधिकारी उपलब्ध हैं। यदि एक अधिकारी प्रतिदिन 250 मामलों का निपटारा भी करे तो पूरी प्रक्रिया में कम से कम 80 दिन लगेंगे।

इस स्थिति को देखते हुए पीठ ने न्यायिक अधिकारियों के दायरे का विस्तार किया।

अदालत ने कहा कि जिला जजों के अलावा सिविल जज (सीनियर कैटेगरी) और सिविल जज (जूनियर कैटेगरी), जिनके पास कम से कम तीन वर्ष का अनुभव हो, उन्हें भी इस कार्य में लगाया जा सकता है।

अदालत ने आगे निर्देश दिया कि यदि कलकत्ता हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस को अतिरिक्त मानव संसाधन की आवश्यकता महसूस हो तो वे झारखंड हाइकोर्ट और उड़ीसा हाइकोर्ट व के चीफ जस्टिस से समान पद के सेवारत या सेवानिवृत्त न्यायिक अधिकारियों की उपलब्धता का अनुरोध कर सकते हैं। ऐसे अधिकारियों के यात्रा व्यय, मानदेय और अन्य खर्च का वहन इलेक्शन कमीशन करेगा।

भाषा संबंधी आपत्ति पर जब एक सीनियर एडवोकेट ने कहा कि अन्य राज्यों के अधिकारी बंगाली भाषा से परिचित नहीं होंगे तो पीठ ने टिप्पणी की कि इतिहास में झारखंड और ओडिशा के कुछ क्षेत्र पहले बंगाल का हिस्सा रहे हैं, इस तथ्य को ध्यान में रखा गया।

दस्तावेजों के सत्यापन को लेकर अदालत ने स्पष्ट किया कि 24 अक्तूबर की अधिसूचना तथा जून की अधिसूचना में उल्लिखित दस्तावेज, साथ ही 8 सितंबर, 2025 और 19 जनवरी, 2026 के आदेशों के तहत स्वीकार किए गए आधार कार्ड, माध्यमिक प्रवेश पत्र और माध्यमिक उत्तीर्ण प्रमाणपत्र को मान्य माना जाएगा, बशर्ते वे 14 फरवरी 2026 की अंतिम तिथि तक प्रस्तुत किए गए हों।

अदालत ने कहा,

“इन दस्तावेजों से न्यायिक अधिकारियों को संतुष्ट करना निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों की पूर्ण जिम्मेदारी होगी।”

अंतिम मतदाता सूची के प्रकाशन की तिथि 28 फरवरी, 2026 निर्धारित है। यदि तब तक सभी आपत्तियों का निपटारा नहीं हो पाता है तो आयोग अंतिम सूची प्रकाशित कर सकता है और बाद में अनुपूरक सूचियां जारी कर सकता है।

अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्ति का उपयोग करते हुए स्पष्ट किया कि अनुपूरक सूची में शामिल मतदाताओं को भी 28 फरवरी, 2026 को प्रकाशित अंतिम सूची का ही हिस्सा माना जाएगा।

इस मामले में राज्य सरकार और अन्य याचिकाकर्ताओं की ओर से सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल सहित अन्य अधिवक्ता उपस्थित हुए, जबकि आयोग की ओर से सीनियर एडवोकेट दामा शेषाद्रि नायडू ने पक्ष रखा।

पृष्ठभूमि

अदालत पहले ही राज्य और आयोग के बीच विश्वास की कमी को देखते हुए न्यायिक अधिकारियों की तैनाती का निर्देश दे चुकी है तथा राज्य के पुलिस महानिदेशक को भी विशेष पुनरीक्षण से जुड़े अधिकारियों को मिल रही धमकियों पर शपथपत्र दाखिल करने को कहा था।

अब ताजा आदेश के साथ अदालत ने यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया है कि व्यापक दावों और आपत्तियों का निपटारा समयसीमा के भीतर निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से हो सके।

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