बहुत विशेष कारण न हों तो हाईकोर्ट भरण पोषण के आदेश पर रोक न लगाएं, सुप्रीम कोर्ट ने कहा

"एक पति / पिता अपनी पत्नी और बच्चे के भरण पोषण के लिए बाध्य होता है। जब तक कि बहुत विशेष कारण न हों, हाईकोर्ट को आमतौर पर इस तरह के आदेश पर रोक नहीं लगानी चाहिए।"

Update: 2019-09-26 03:12 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि हाईकोर्ट को तब तक भरण-पोषण के आदेश पर रोक नहीं लगानी चाहिए जब तक कि ऐसा करने के पीछे बहुत विशेष कारण न हों।

सुप्रीम कोर्ट के सामने आए इस मामले में, एक पत्नी और नाबालिग बच्चे ने पारिवारिक न्यायालय के समक्ष दंड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 125  (Section 125 CrPC) के तहत एक याचिका दायर की। परिवार न्यायालय द्वारा एक पूर्व पक्षीय आदेश (ex parte order) में रु .20,000 का भरण पोषण प्रदान किया गया था।

पति ने इस आदेश को रोकने के लिए आवेदन दिया जिसे खारिज कर दिया गया था। बाद में, हाईकोर्ट ने पति के द्वारा दायर आपराधिक पुनरीक्षण याचिका में बिना कोई कारण बताए भरण पोषण के आदेश पर रोक लगा दी।

पत्नी द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दायर अपील में न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता और न्यायमूर्ति अनिरुद्ध बोस की पीठ ने हाईकोर्ट के इस दृष्टिकोण को अस्वीकार कर दिया और कहा,

"हम यह मानने के लिए विवश हैं कि इस आदेश में उच्च न्यायालय की ओर से दिमाग का इस्तेमाल नहीं किया गया। यह एक ऐसा मामला था, जिसमें पत्नी और नाबालिग बेटे को भरण पोषण देने का आदेश दिया गया था। उच्च न्यायालय ने कारण दर्ज किए बिना, पत्नी और नाबालिग बेटे दोनों के भरण पोषण के अनुदान पर रोक लगा दी है। ऐसा नहीं करना चाहिए। एक पति / पिता अपनी पत्नी और बच्चे का भरण पोषण देने के लिए बाध्य होता है। जब तक बहुत विशेष कारण नहीं हों, तब तक उच्च न्यायालय को आम तौर पर इस तरह के आदेश पर रोक नहीं लगानी चाहिए। वर्तमान मामले में स्टे ऑर्डर देने के औचित्य का कोई कारण नहीं बताया गया है।"

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश को दरकिनार करते हुए पति को निर्देश दिया कि वह परिवार न्यायालय द्वारा मंज़ूर की गई भरण पोषण की राशि का भुगतान करे। उच्च न्यायालय को निर्देश दिया गया कि वह पक्षकारों की सुनवाई करे और एक उचित तर्कपूर्ण आदेश पारित करे। 



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