आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि संपत्ति के कब्जे को लेकर प्रथमदृष्टया संतुष्टि दर्ज किए बिना अदालत यथास्थिति बनाए रखने का आदेश नहीं दे सकती। अस्थायी निषेधाज्ञा देते समय निचली अदालत को यह बताना होगा कि प्रथमदृष्टया मामला किसके पक्ष में है सुविधा का संतुलन किसके पक्ष में है और राहत नहीं मिलने पर किस पक्ष को अपूरणीय क्षति हो सकती है।

जस्टिस डी. रमेश और जस्टिस अलापति गिरिधर की खंडपीठ ने संपत्ति पर वादी के कथित कब्जे की रक्षा करने वाले अस्थायी निषेधाज्ञा आदेश रद्द किया। हाईकोर्ट ने कहा कि निचली अदालत ने पक्षकारों की दलीलों और दस्तावेजों का उल्लेख तो किया, लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया कि वादी का प्रथमदृष्टया मामला कैसे बनता है और संपत्ति पर मुकदमा दायर होने से ठीक पहले किसका कब्जा था।

अदालत ने कहा कि अस्थायी निषेधाज्ञा के आवेदन पर सुनवाई करते समय पूरे मुकदमे की तरह विस्तृत सुनवाई करना जरूरी नहीं है लेकिन अदालत को तीन आवश्यक पहलुओं पर संतुष्टि दर्ज करनी होती है। इनमें प्रथमदृष्टया मामला, सुविधा का संतुलन और अपूरणीय क्षति शामिल हैं।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह कब्जे के संबंध में निष्कर्ष दर्ज किए बिना यथास्थिति का आदेश नहीं दे सकता। इसलिए उसने मामले को नए सिरे से विचार करने के लिए निचली अदालत के पास भेज दिया।

यह मामला अक्टूबर 2009 में कथित रूप से हुए एक बिक्री समझौते से जुड़ा था। वादी ने संपत्ति की बिक्री का समझौता लागू कराने के लिए मुकदमा दायर किया। उसका दावा था कि उसने प्रतिवादियों को डेढ़ करोड़ रुपये दिए और समझौते के तहत संपत्ति का कब्जा भी उसे सौंप दिया गया।

प्रतिवादियों ने बिक्री समझौते पर हस्ताक्षर करने से इनकार किया। उनका आरोप था कि वादी ने तीन लाख रुपये के ऋण की सुरक्षा के लिए कथित तौर पर लिए गए हस्ताक्षरित खाली स्टांप पत्रों का दुरुपयोग करके समझौता तैयार किया। उन्होंने वादी के कब्जे के दावे को भी चुनौती दी और एक सर्वेक्षक की रिपोर्ट का हवाला दिया, जिसके अनुसार संपत्ति पर प्रतिवादियों में से एक का कब्जा है।

मुकदमे की सुनवाई के दौरान वादी ने निचली अदालत में अस्थायी निषेधाज्ञा के लिए आवेदन दिया। उसने मांग की कि प्रतिवादियों को उसके कथित कब्जे में हस्तक्षेप करने और संपत्ति किसी अन्य व्यक्ति को हस्तांतरित करने से रोका जाए।

निचली अदालत ने दोनों आवेदन स्वीकार कर लिए। इसके बाद प्रतिवादियों ने हाईकोर्ट में अपील दायर की।

मामले के दस्तावेजों की जांच करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि वादपत्र और कथित बिक्री समझौते के अलावा वादी ने ऐसा कोई अन्य साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया, जिससे संपत्ति पर उसके कब्जे की पुष्टि होती हो।

खंडपीठ ने कहा कि निचली अदालत ने वादी से पहले उसका प्रारंभिक भार पूरा करने की अपेक्षा करने के बजाय प्रतिवादियों पर यह साबित करने का भार डाल दिया कि संपत्ति पर उनका कब्जा था। इसके लिए प्रतिवादियों से राजस्व अभिलेख और स्वामित्व संबंधी दस्तावेज पेश करने को कहा गया, जबकि वादी के कब्जे के दावे पर पहले प्रथमदृष्टया संतुष्टि दर्ज करना जरूरी था।

हाईकोर्ट ने यह भी ध्यान दिया कि कथित बिक्री समझौता अक्टूबर 2009 का था, लेकिन वादी ने मुकदमा दायर करने के लिए करीब 12 वर्ष इंतजार किया। उसने यह भी स्पष्ट नहीं किया कि संपत्ति का पंजीकरण कराने के लिए इतने लंबे समय तक इंतजार क्यों किया गया।

अदालत ने कहा कि मुकदमा दायर होने से ठीक पहले संपत्ति पर किसका कब्जा था इस संबंध में निचली अदालत के आदेश में कारणों सहित कोई प्रथमदृष्टया निष्कर्ष नहीं था। ऐसी स्थिति में यथास्थिति का आदेश देना उचित नहीं होगा।

इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने वादी के कथित कब्जे की रक्षा करने वाली निषेधाज्ञा रद्द की और संबंधित आवेदन पर नए सिरे से विचार करने के लिए मामला निचली अदालत को वापस भेज दिया।

संपत्ति को किसी अन्य व्यक्ति को हस्तांतरित करने से रोकने वाली निषेधाज्ञा से संबंधित दूसरी अपील में हाईकोर्ट ने प्रतिवादियों के इस आश्वासन को दर्ज किया कि वे निचली अदालत की अनुमति के बिना संपत्ति का हस्तांतरण नहीं करेंगे। इसके बाद इस अपील का निपटारा कर दिया गया।

हाईकोर्ट ने संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 की धारा 52 का भी उल्लेख किया, जो किसी संपत्ति के अधिकारों से संबंधित मुकदमा लंबित रहने के दौरान उस संपत्ति के हस्तांतरण से जुड़े प्रावधानों से संबंधित है।

अदालत ने पक्षकारों को कथित डेढ़ करोड़ रुपये के भुगतान और आयकर अधिनियम के तहत उसके प्रभाव के संबंध में उचित मंच के समक्ष अपनी दलीलें रखने की स्वतंत्रता भी दी।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसने विवाद के गुण-दोष पर कोई अंतिम राय व्यक्त नहीं की। निचली अदालत को निर्देश दिया गया कि वह हाईकोर्ट की टिप्पणियों से प्रभावित हुए बिना मामले का निर्णय कानून के अनुसार करे।

अदालत ने मुकदमे का निपटारा फैसले की प्रति प्राप्त होने के चार महीने के भीतर, जहां तक संभव हो, करने का निर्देश दिया। दोनों पक्षों को कार्यवाही में सहयोग करने को कहा गया। यदि कोई पक्ष कार्यवाही में देरी करता है या सहयोग नहीं करता है, तो निचली अदालत परिस्थितियों के अनुसार आगे की कार्रवाई कर सकती है या उचित हर्जाना लगा सकती है।

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