राहुल गांधी के सिखों पर दिए बयान को अनुच्छेद 19 का संरक्षण, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा- अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर सवाल उठाना अपराध नहीं
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी को बड़ी राहत देते हुए सितंबर 2024 में अमेरिका यात्रा के दौरान सिख समुदाय को लेकर दिए गए उनके बयान को संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत अभिव्यक्ति की आजादी से संरक्षित माना।
कोर्ट ने कहा कि किसी निर्वाचित जनप्रतिनिधि द्वारा अल्पसंख्यकों के अधिकारों और उनकी सुरक्षा को लेकर चिंता जताना अपने आप में अपराध नहीं हो सकता। लोकतंत्र में जनप्रतिनिधियों का यह प्रमुख दायित्व है कि वे समाज के कमजोर वर्गों की आवाज उठाएं।
जस्टिस विक्रम डी. चौहान की पीठ ने राहुल गांधी के खिलाफ FIR दर्ज करने की मांग वाली याचिका खारिज करते हुए कहा कि कथित बयान से न तो हिंसा भड़कती दिखाई देती है और न ही सार्वजनिक व्यवस्था बिगाड़ने की कोई आशंका साबित हुई। याचिकाकर्ताओं की ओर से ऐसा कोई ठोस साक्ष्य भी पेश नहीं किया गया, जिससे यह साबित हो सके कि राहुल गांधी का बयान भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 152 के तहत अपराध की श्रेणी में आता है।
कोर्ट ने कहा,
"निर्वाचित जनप्रतिनिधि द्वारा अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर सवाल उठाना अपने आप में अपराध नहीं हो सकता। राहुल गांधी के इस भाषण को संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का संरक्षण प्राप्त है।"
यह मामला नागेश्वर मिश्रा और एक अन्य की ओर से दायर याचिका से जुड़ा था। याचिकाकर्ताओं ने वाराणसी की अदालतों के उन आदेशों को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, जिनमें राहुल गांधी के खिलाफ FIR दर्ज करने का निर्देश देने से इनकार कर दिया गया।
याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि सितंबर 2024 में अमेरिका यात्रा के दौरान राहुल गांधी ने सिख समुदाय की सुरक्षा को लेकर सवाल उठाए। उन्होंने पूछा था कि क्या भारत में सिख समुदाय के लोग सुरक्षित रूप से पगड़ी पहन सकते हैं और गुरुद्वारों में जा सकते हैं?
याचिकाकर्ताओं का दावा था कि खालिस्तानी आतंकी गुरपतवंत सिंह पन्नू ने राहुल गांधी के बयान का समर्थन किया। इससे आतंकियों को अपने प्रचार और हिंसक गतिविधियों को बढ़ावा देने का अवसर मिल सकता है। उन्होंने आरोप लगाया कि इस बयान का इस्तेमाल भारत के खिलाफ दुष्प्रचार और देश में अशांति फैलाने के लिए किया जा सकता है।
हालांकि, हाईकोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि जनप्रतिनिधि जनता की आवाज को शासन और संस्थाओं तक पहुंचाने के लिए चुने जाते हैं। समाज के कमजोर वर्गों की चिंताओं को सार्वजनिक चर्चा में शामिल करना उनकी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। जनप्रतिनिधियों द्वारा उठाए गए सवाल सरकारी नीतियों और कार्यों की समीक्षा का अवसर देते हैं। इससे नागरिकों को जानकारी मिलती है और लोकतांत्रिक व्यवस्था में सार्वजनिक विमर्श जीवंत बना रहता है।
कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति को राहुल गांधी के विचारों से असहमति हो सकती है, लेकिन केवल असहमति के आधार पर किसी बयान को अपराध नहीं माना जा सकता। पीठ ने स्पष्ट किया कि यदि कोई तीसरा व्यक्ति किसी भाषण की गलत व्याख्या करता है या अपने उद्देश्य के लिए उसका इस्तेमाल करता है तो उसके कृत्यों की जिम्मेदारी उसी व्यक्ति की होगी। उसके आधार पर मूल वक्ता को आपराधिक रूप से जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
हाईकोर्ट ने BNS की धारा 152 का भी परीक्षण किया। यह धारा भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता को खतरे में डालने वाले कृत्यों, अलगाववाद को बढ़ावा देने, सशस्त्र विद्रोह या विध्वंसकारी गतिविधियों को उकसाने जैसे अपराधों से संबंधित है।
पीठ ने कहा कि राहुल गांधी के कथित बयान में हिंसा भड़काने या सार्वजनिक व्यवस्था को बाधित करने की प्रवृत्ति नहीं दिखाई देती। यह केवल समाज के एक वर्ग की चिंताओं को सामने रखने वाला बयान था। याचिकाकर्ताओं ने ऐसा कोई ठोस विवरण या सामग्री पेश नहीं की, जिससे यह साबित हो कि राहुल गांधी के बयान से अलगाववाद, सशस्त्र विद्रोह या देश की संप्रभुता और अखंडता को खतरा पैदा हुआ।
कोर्ट ने इस बात पर भी गौर किया कि याचिकाकर्ताओं ने कथित भाषण की तारीख, समय और स्थान का स्पष्ट विवरण नहीं दिया। भाषण का पूरा अंश भी अदालत के सामने नहीं रखा गया था। उनकी दलीलें मुख्य रूप से समाचार पत्रों में प्रकाशित खबरों पर आधारित थीं। अदालत ने कहा कि इतने समय बाद भी ऐसा कोई साक्ष्य पेश नहीं किया गया, जिससे धारा 152 के तहत अपराध के आवश्यक तत्व साबित हो सकें।
हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी में कहा कि यदि किसी निर्वाचित जनप्रतिनिधि द्वारा किसी व्यक्ति के संबंध में दिया गया बयान गलत या अपुष्ट पाया जाता है, तब भी उसका उचित जवाब संसदीय बहस और सार्वजनिक चर्चा के माध्यम से दिया जाना चाहिए। विचारों का स्वतंत्र आदान-प्रदान ही सच्चाई सामने लाने का लोकतांत्रिक तरीका है। कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी जनप्रतिनिधि द्वारा विदेश की धरती पर चिंता जताना, भले ही कुछ लोग इसे संसदीय परंपरा के विरुद्ध मानें, अपने आप में आपराधिक कृत्य नहीं बन जाता।
हाईकोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति के खिलाफ FIR दर्ज होने के गंभीर परिणाम हो सकते हैं। इससे उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता प्रभावित होती है। इसलिए कथित आपत्तिजनक भाषण या अभिव्यक्ति के आधार पर आपराधिक कार्रवाई की मांग करने वाले मामलों में अदालतों को विशेष सावधानी बरतनी चाहिए।
पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के चर्चित फैसले श्रेय सिंघल बनाम भारत संघ का हवाला देते हुए कहा कि किसी विचार या मुद्दे पर केवल चर्चा करना या उसका समर्थन करना, भले ही वह विचार कितना ही अलोकप्रिय क्यों न हो, संविधान के अनुच्छेद 19(1)(क) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का महत्वपूर्ण हिस्सा है। आपराधिक कार्रवाई की स्थिति तभी बनती है, जब चर्चा या समर्थन उकसावे के स्तर तक पहुंच जाए और अनुच्छेद 19(2) के तहत निर्धारित प्रतिबंध लागू हों।
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के इमरान प्रतापगढ़ी बनाम गुजरात राज्य और अपने ही फैसले सिमरन गुप्ता बनाम उत्तर प्रदेश राज्य का भी उल्लेख किया। पीठ ने कहा कि किसी बयान के आधार पर आपराधिक कार्रवाई करने से पहले यह देखना जरूरी है कि प्रथम दृष्टया अपराध बनता है या नहीं और संबंधित अभिव्यक्ति संविधान के तहत संरक्षित है या नहीं। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी बयान को अपराध साबित करने की जिम्मेदारी उस व्यक्ति की, जो उसके आधार पर आपराधिक कार्रवाई की मांग कर रहा है। केवल गंभीर संदेह, चाहे वह कितना भी मजबूत क्यों न हो, सबूत की जगह नहीं ले सकता।
इस मामले में याचिकाकर्ताओं ने सबसे पहले 28 नवंबर 2024 को राहुल गांधी के खिलाफ FIR दर्ज कराने के लिए आवेदन दिया था। हालांकि, मजिस्ट्रेट ने केंद्र सरकार से पूर्व अनुमति नहीं लिए जाने के आधार पर आवेदन खारिज किया था। इसके बाद 21 जुलाई 2025 को पुनरीक्षण अदालत ने उस आदेश को निरस्त करते हुए मामले पर दोबारा विचार करने का निर्देश दिया।
राहुल गांधी ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, लेकिन 26 सितंबर 2025 को हाईकोर्ट ने उनकी याचिका खारिज की थी। इसके बाद 17 अक्टूबर 2025 को अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, वाराणसी ने दोबारा विचार करते हुए FIR दर्ज करने की मांग खारिज की। याचिकाकर्ताओं की पुनरीक्षण याचिका भी 9 जुलाई 2026 को खारिज की गई। इसके बाद उन्होंने दोनों आदेशों को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
अब हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं की मौजूदा याचिका खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और अधिकारों से जुड़े सवाल उठाना लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति का हिस्सा है और केवल असहमति या किसी तीसरे पक्ष के समर्थन के आधार पर उसे अपराध नहीं बनाया जा सकता।