ज्यादा कीमत मिलने की उम्मीद में सबसे ऊंची बोली रद्द नहीं कर सकता प्राधिकरण, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने GDA की कार्रवाई को बताया मनमाना
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि यदि किसी सार्वजनिक प्राधिकरण की ओर से विधिवत आयोजित नीलामी में सबसे ऊंची बोली प्राप्त होती है तो केवल भविष्य में इससे अधिक कीमत मिलने की उम्मीद में उसे रद्द नहीं किया जा सकता। ऐसा करने के लिए कोई ठोस और असाधारण कारण होना जरूरी है, जिससे नीलामी की पूरी प्रक्रिया प्रभावित हुई हो।
जस्टिस सिद्धार्थ वर्मा और जस्टिस कुणाल रवि सिंह की खंडपीठ ने गाजियाबाद विकास प्राधिकरण (JDA) की ओर से एक ही भूखंड की बार-बार नीलामी कराने और सबसे ऊंची बोलियां निरस्त करने की कार्रवाई को अधिकारों का रंग बदलकर इस्तेमाल करना और मनमाना करार दिया।
कोर्ट ने स्पष्ट कहा,
"एक बार नीलामी में सबसे ऊंची कीमत प्राप्त हो जाने के बाद संबंधित प्राधिकरण या सार्वजनिक निकाय को उस बोली का सम्मान करना चाहिए, जब तक कि ऐसी असाधारण परिस्थितियां न हों, जिनके कारण पूरी नीलामी प्रक्रिया दूषित हो गई हो।"
मामला गाजियाबाद के कौशांबी योजना स्थित भूखंड संख्या ए-252 की नीलामी से जुड़ा था। याचिकाकर्ता ने 15 अक्टूबर 2025 को आयोजित नीलामी में 93 हजार रुपये प्रति वर्ग मीटर की निर्धारित आरक्षित कीमत के मुकाबले एक लाख 11 हजार रुपये प्रति वर्ग मीटर की सबसे ऊंची बोली लगाई। इसके बावजूद प्राधिकरण ने उसे आवंटन पत्र जारी नहीं किया। याचिकाकर्ता ने दो बार पत्र लिखकर बोली की 25 प्रतिशत धनराशि जमा करने की पेशकश भी की, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई।
इसके बजाय 27 अक्टूबर 2025 को ई-मेल के माध्यम से उसे सूचित किया गया कि उसकी बोली स्वीकार नहीं की गई है। हालांकि, इस फैसले का कोई कारण नहीं बताया गया। याचिकाकर्ता को मौखिक रूप से बताया गया कि प्राधिकरण को इससे अधिक कीमत मिलने की उम्मीद थी। इसके बाद 2 दिसंबर 2025 को भूखंड की दोबारा नीलामी का विज्ञापन जारी कर दिया गया। इस कार्रवाई के खिलाफ याचिकाकर्ता ने 11 दिसंबर 2025 को हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की।
मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने प्राधिकरण से नीलामी से संबंधित रिकॉर्ड तलब किया। रिकॉर्ड से पता चला कि लगभग तीन महीने के भीतर इसी भूखंड की चार बार नीलामी कराई गई। पहली नीलामी 30 जुलाई 2025 को हुई, जिसमें 12 लोगों ने हिस्सा लिया और सबसे ऊंची बोली एक लाख 95 हजार रुपये प्रति वर्ग मीटर लगी थी। प्राधिकरण ने यह कहते हुए बोली स्वीकार नहीं की कि भूखंड की पहली बार नीलामी हो रही है और भविष्य में इससे अधिक कीमत मिल सकती है।
इसके बाद अगली दो नीलामियों में प्राप्त सबसे ऊंची बोलियां भी इसी आधार पर निरस्त कर दी गईं। इनमें एक लाख 56 हजार रुपये और याचिकाकर्ता की एक लाख 11 हजार रुपये प्रति वर्ग मीटर की बोली शामिल थी। अंततः 29 दिसंबर 2025 को हुई चौथी नीलामी में दो लाख छह हजार रुपये प्रति वर्ग मीटर की बोली स्वीकार की गई। हैरानी की बात यह थी कि इन सभी नीलामियों के दौरान आरक्षित कीमत 93 हजार रुपये प्रति वर्ग मीटर ही रखी गई।
कोर्ट ने प्राधिकरण की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा कि रिकॉर्ड से पता चलता है कि प्राधिकरण बार-बार इस उम्मीद में बोली रद्द करता रहा कि भविष्य में उसे इससे अधिक कीमत मिल जाएगी। लेकिन इससे भी ज्यादा आश्चर्यजनक यह है कि इतनी बार नीलामी रद्द करने के बावजूद आरक्षित कीमत में कोई बदलाव नहीं किया गया। रिकॉर्ड में ऐसा कोई आधार भी नहीं है, जिससे यह पता चले कि नीलामी समिति ने किस वजह से भविष्य में अधिक बोली मिलने की उम्मीद जताई। यह केवल बड़ी कीमत मिलने की उम्मीद में किया गया एक काल्पनिक प्रयास प्रतीत होता है।
प्राधिकरण की ओर से दलील दी गई कि बोली दस्तावेज की शर्त संख्या 11 के तहत बोली स्वीकार करने का अधिकार उपाध्यक्ष के पास सुरक्षित था। इसलिए हथौड़ा गिरने के साथ नीलामी पूरी नहीं हुई थी और सक्षम अधिकारी की मंजूरी के बिना बोली लगाने वाले को कोई अधिकार प्राप्त नहीं हुआ था।
इस पर हाईकोर्ट ने कहा कि भले ही सबसे ऊंची बोली लगाने वाले को भूखंड आवंटित कराने का पूर्ण और अटल अधिकार प्राप्त न हो, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि प्राधिकरण को बोली रद्द करने की असीमित छूट मिल गई है। यदि अधिकारों के मनमाने इस्तेमाल का आरोप है तो न्यायिक समीक्षा में निर्णय लेने की प्रक्रिया की जांच की जा सकती है।
कोर्ट ने गोल्डन फूड्स प्रोडक्ट्स इंडिया बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले का भी हवाला दिया। इसमें कहा गया कि यदि नीलामी की प्रक्रिया में कोई गड़बड़ी नहीं है, तो केवल अधिक बोली मिलने की उम्मीद में सबसे ऊंची बोली को खारिज करना उचित नहीं है। मौजूदा मामले में 15 अक्टूबर 2025 की नीलामी में किसी तरह की शिकायत, मिलीभगत या धोखाधड़ी का कोई प्रमाण नहीं मिला। ऐसे में याचिकाकर्ता की बोली रद्द करने की कार्रवाई मनमानी और अधिकारों के दुरुपयोग से प्रभावित थी।
कोर्ट ने यह भी कहा कि याचिका लंबित रहने के दौरान प्राधिकरण ने 29 दिसंबर 2025 को दोबारा नीलामी कराई और 19 जनवरी 2026 को दूसरे बोलीदाता को आवंटन पत्र जारी किया। प्राधिकरण को इस बात की जानकारी थी कि मामला हाईकोर्ट में लंबित है। ऐसे में यह कार्रवाई संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 की धारा 52 के तहत लागू होने वाले लंबित वाद के सिद्धांत से प्रभावित होगी।
दूसरे आवंटनधारी को पक्षकार नहीं बनाए जाने की दलील पर कोर्ट ने कहा कि इस आधार पर याचिका खारिज नहीं की जा सकती। दूसरे आवंटनधारी ने न तो बोली की 25 प्रतिशत धनराशि जमा की थी और न ही भूखंड की रजिस्ट्री कराई थी। इसलिए उसे हुए नुकसान की भरपाई आर्थिक रूप से की जा सकती है।
हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता की बोली स्वीकार न करने संबंधी 27 अक्टूबर 2025 की सूचना और 24 अक्टूबर 2025 का निरस्तीकरण आदेश रद्द किया। कोर्ट ने 15 अक्टूबर 2025 की मूल नीलामी को बहाल करते हुए प्राधिकरण को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता के पक्ष में आवंटन पत्र जारी किया जाए। याचिकाकर्ता को निर्धारित समय-सारणी के अनुसार भुगतान करना होगा।
कोर्ट ने 29 दिसंबर 2025 की बाद की नीलामी और 19 जनवरी 2026 को जारी आवंटन पत्र को कानून की नजर में अमान्य करार दिया। साथ ही दिल्ली विकास प्राधिकरण बनाम कॉर्पोरेशन बैंक के फैसले के आधार पर दूसरे आवंटनधारी को जमा की गई पूरी धनराशि 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ लौटाने का निर्देश दिया। आदेश की प्रमाणित प्रति प्रस्तुत किए जाने के एक महीने के भीतर भुगतान नहीं होने पर ब्याज दर बढ़कर 9 प्रतिशत वार्षिक हो जाएगी।
इन टिप्पणियों और निर्देशों के साथ हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार की।